Jagran Dialogues: कोविड-19 वायरस के दुनियाभर में कितने वैरिएंट अब तक आ चुके हैं और कितनी वैक्सीन उपलब्ध हैं?

Jagran Dialogues कोविड-19 के अब तक के वैरिएंट्स और इसकी वैक्सीन के बारे में विस्तार से बात करने के लिए जागरण न्यू मीडिया के सीनीयर एडिटर Pratyush Ranjan ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रायल के नैशनल सेंटर फॉर डिज़ीज़ कंट्रोल के डायरेक्टर डॉ. सुजीत कुमार सिंह से बातचीत की।

Ruhee ParvezMon, 26 Jul 2021 05:23 PM (IST)
कोविड-19 वायरस के दुनियाभर में कितने वैरिएंट अब तक आ चुके हैं और कितनी वैक्सीन उपलब्ध हैं?

नई दिल्ली, प्रत्यूष रंजन। सबसे पहले चीन के वुहान शहर में पाए गए कोरोना वायरस के अब कई वेरिएंट्स विकसित हो गए हैं। अभी तक दुनियाभर के करीब 19 करोड़ लोग कोविड-19 से संक्रमित हो चुके हैं और करीब 41 लाख इसकी चपेट में आकर अपनी जान गंवा चुके हैं। इसी बारे में विस्तार से बात करने के लिए जागरण न्यू मीडिया के सीनीयर एडिटर Pratyush Ranjan ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रायल के नैशनल सेंटर फॉर डिज़ीज़ कंट्रोल के डायरेक्टर डॉ. सुजीत कुमार सिंह से बातचीत की।

पेश हैं बातचीत के कुछ अंश:

SARS-CoV-2 वायरस क्या है जिसकी वजह से कोविड-19 होता है? क्या सभी वायरस म्यूटेट करते हैं? म्यूटेशन की प्रक्रिया क्या है और जब हम वेरिएंट शब्द का प्रयोग करते हैं तो इसका क्या अर्थ होता है?

डॉ. सुजीत कुमार सिंह: हम पिछले डेढ़ साल से SARS-CoV-2 से कई तरह का संघर्ष कर रहे हैं। इस दौरान हमने देखा कि कभी कोविड आम बीमारी की तरह हो रहा है, कभी इसने गंभीर रूप ले लिया, तो कभी इसके मामले तेज़ी से बढ़े। जिनोमिक म्यूटेशन वायरस में एक सामान्य प्रक्रिया होती है। इंफ्लूएंज़ा वायरस में अलग-अलग तरह के म्यूटेशन आते रहते हैं। वायरस का स्ट्रक्चर या तो RNA या DNA प्रकार का होता है। RNA ट्रेंड में विभन्न प्रकार की एमीनो एसिड्स एक सीक्वेन्स में रहती हैं। इस सीक्वेन्स में रहने के कारण उसका एक स्ट्रक्चर बनता है, जिसको हम जिनोम स्ट्रेक्चर के तौर पर जानते हैं। हमारे शरीर में न्यूकलियस होता है और उससे निकलती हुई स्पाइक प्रोटीन होती हैं, जिसकी मदद से वायरस हमारे शरीर के सेल्स में ACE2 रिसेप्टर में खुद को बाइन्ड करता है। अंदर जाकर वायरस अपनी और कॉपीज़ बनाता है, यानी अपने आपको रेप्लकेट करता है।

दुनियाभर में अभी तक कोविड-19 के कितने वेरिएंट्स हैं? इनमें से सबसे ख़तरनाक किस वेरिएंट को बताया जा रहा है और क्यों? हमें अल्फा, बीटा, गामा, डेल्टा और कप्पा वेरिएंट के बारे में बताएं?

डॉ. सुजीत कुमार सिंह: म्यूटेशन के एक समुह को हम वैरिएंट का नाम दे देते हैं। वो सिंगल म्यूटेशन भी हो सकती है, डबल म्यूटेशन भी हो सकती है। जीसेट दुनिया का एक ग्लोबल प्लेटफॉर्म है, जिसमें वैज्ञानिक जो खोज करते रहते हैं, उसे जमा किया जाता है। उसके अनुसार अभी तक करीब 1309 तरह-तरह के वैरिएंट्स दुनिया के अलग-अलग देशों में पाए गए हैं। वैसे को वायरस के कई म्यूटेशन होते हैं, इन सबसे हमें ख़तरा नहीं होता है, लेकिन अल्फा, बीटा, गामा, डेल्टा और कप्पा वैरिएंट ऐसे हैं, जो पब्लिक हेल्थ को प्रभावित कर सकते हैं या कर रहे हैं। वायरस अगर पहले से ज़्यादा तेज़ी से फैलता है, पहले से ज़्यादा मौतें हो रही हैं या पहले से ज़्यादा गंभीर स्थिति पैदा कर रहा है, तो फिर यह वैरिएंट ऑफ कंसर्न बन जाता है। इनमें से कप्पा वेरिएंट वैरिएंट ऑफ कंसर्न नहीं है वैरिएंट ऑफ इंट्रेस्ट है।

वैज्ञानिक कैसे निर्णय लेते हैं, पुष्टि करते हैं और दावा करते हैं कि एक नया वेरिएंट आ गया है? इसकी क्या प्रक्रिया होती है?

डॉ. सुजीत कुमार सिंह: इसकी दो प्रक्रिया होती हैं। पहली पहले वायरस को लैब में लाते हैं। जो मामले पॉज़ीटिव निकलते हैं, उसकी जीनोमिक स्टडी करते हैं। दूसरा यह कि अगर हमें किसी शहर या किसी जगह पर हाई रेट ऑफ ट्रांसफर मिल रहा है, जो सामान्य से काफी तेज़ है, या हमें कोई सुपर स्प्रेडिंग ईवेंट मिला यानी एक संक्रमित व्यक्ति ने बहुत सारे लोगों को संक्रमित कर दिया। या किसी शहर में हमें दूसरे शहरों की तुलना हाई डेथ रेट मिल रहा है या काफी ज़्यादा मरीज़ गंभीर स्थिति में जा रहे हैं, ऑक्सीजन की डिमांड बढ़ रही है। ऐसी जगहों से सैम्पल उठाते हैं और फिर उनकी जिनोम सीक्वेंसिंग करते हैं। इससे हमें दो तरह के नज़रिए मिलते हैं। एक तो जिनोमिक स्ट्रक्चर मिलता है। वैज्ञानिक देखते हैं कि नया स्ट्रक्चर पुराने से किस तरह अलग है। ये विभन्नता इसके डेट रेट, संक्रमण के रेट या सीरियस मामलों को किस तरह बढ़ा रही है।

अमेरिकी सरकार के SARS-CoV-2 इंटरएजेंसी ग्रुप (SIG) ने एक वेरिएंट वर्गीकरण योजना विकसित की है, जो SARS- CoV-2 वेरिएंट के तीन वर्गों में बांटती है:

- वेरिएंट ऑफ इंटरेस्ट

- वेरिएंट ऑफ कंसर्न

- वेरिएंट ऑफ हाई कॉन्सीक्वेंस

इन वर्गीकरणों का क्या अर्थ है?

डॉ. सुजीत कुमार सिंह: वेरिएंट ऑफ हाई कॉन्सीक्वेंस, अटलांटा के सीडीसी ने बनाई है, इसमें अगर असाधारण तरीके से डेथ रेट बढ़े, अस्पताल में भर्ती हो रहे लोग बढ़ें, या RT-PCR और बाकी टेस्ट पूरी तरह से फेल होने लगें, सबको वैक्सीन लगने के बाद भी संक्रमण के फैलने में कोई बदलाव नहीं आ रहा, तो यह वैरिएंट ऑफ हाई कॉन्सीक्वेंस में आता है। अभी तक SARS-CoV-2 का एक भी ऐसा वैरिएंट नहीं है, जिसे वैरिएंट ऑफ हाई कॉन्सीक्वेंस कहा गया हो।

WHO और वैज्ञानिक कोविड-19 वैक्सीन्स की प्रभाविकता पर वायरस के रूपों के प्रभाव को समझने और उस पर निगरानी रखने के लिए क्या कर रहे हैं?

डॉ. सुजीत कुमार सिंह: यूनाइटेड किंगडम के दक्षिणी हिस्से में वायरस से संक्रमण बहुत तेज़ी से बढ़ा। हमें जैसे से ही पता चला कि संक्रमण तेज़ी से आगे बढ़ रहा है और साथ कि ये महामारी भी कॉम्पलेक्स तरीके से आगे की ओर बढ़ रही है, तो हम सभी को इस बात की चिंता थी कि दूसरी लहर कैसे आएगी, तीसरी लहर आएगी तो क्या होगा। या हमें कोविड-19 से कब पूरी तरह निजात मिल पाएगी। कितने वैरिएंट और आते रहेंगे, तो सरकार से इस बात का संज्ञान लेते हुए दिसंबर 2020 में INSA.Corp बनाया। जिसमें सभी लैब्ज़ को इकट्ठा किया गया। देश की टॉप 10 लैब्ज़ को ज़िम्मेदारी दी गई, कि हम खुद अपने देश और दुनिया को नए वैरिएंट के बारे में बता सकें।

वायरस के नए-नए रूप आने के बावजूद वैक्सीनेशन क्यों महत्वपूर्ण है?

डॉ. सुजीत कुमार सिंह: एक तरफ है वैक्सीन्स और दूसरी तरफ हैं वैरिएंट्स। कई बीमारियों से बचने के लिए वैक्सीन का प्रयोग होता है। पोलियो, मीज़ल्स, येलो फीवर आदि जैसी कई बीमारियां हैं। तो वैक्सीन्स ने हमें सुरक्षित वातावरण और जीवन दिया है। जब भी कोई कीटाणु, वायरस या बैक्टीरिया हमारे शरीर में जाता है, तो हमारा इम्यून सिस्टम उससे लड़ने की हमारे अंदर एक क्षमता पैदा करता है, जिसको हम इम्यून रिसपॉन्स कहते हैं। इस दौरान एंटीबॉडीज़ बनती हैं, जो हमारे शरीर के मेमोरी सेल याद कर लेते हैं। यानी मेमोरी सेल एक बीमारी को पहचान लेते हैं ताकि दूसरी बार जब यही वायरस दोबारा अटैक करें तो शरीर इससे बेहतर तरीके से लड़ पाए। वैक्सीन हमारे शरीर में एक आर्टिफिशियल वातावरण पैदा करती है, जिससे इंफेक्शन हुए बिना हमारा इम्यून सिस्टम एक्टिवेट हो जाता है, जिससे एंटीबॉडीज़ बनती हैं और मेमोरी सेल्स को भी पता चल जाता है।

नए डेल्टा प्लस वेरिएंट के मुकाबले भारत में मौजूद टीके कितने प्रभावशाली हैं? क्या हमें कोविड -19 के भविष्य के रूपों से सुरक्षित रहने के लिए एक और बूस्टर खुराक की आवश्यकता होगी?

डॉ. सुजीत कुमार सिंह: एक तरफ हम कोशिश करते हैं कि वायरस को फैलने से रोकने की, उसे दबाने की या उससे गंभीर बीमारी को रोकने की, वहीं दूसरी तरफ वायरस भी ज़िंदा रहने के लिए प्रयास करता है। अपने रूप बदलता है। इसलिए लगातार इसके नए-नए वैरिएंट आ रहे हैं। वायरस को लेकर कल्चर किया जाता है, और वैक्सीन के ऊपर उसका असर लैब में देखा जाता है। हमारे यहां कई अच्छी लैब हैं। इसके अलावा यह भी देखा जाता है कि कहीं व्यक्ति को दोनों वैक्सीन लगने के 20-25 दिन बाद भी हो गया। डेल्टा प्लस वायरस को भी कल्चर किया जा चुका है, यानी वैक्सीन का उस वायरस पर असर देखा जा चुका है। इसमें हमें अभी तक ऐसे कोई संकेत नहीं मिले हैं, जिससे यह साबित हो सके कि हमारी वैक्सीन्स इससे लड़ने में सक्षम नहीं है।

भारत में बच्चों के लिए टीकों की क्या स्थिति है? हम बच्चों के लिए टीकाकरण कब शुरू करने की उम्मीद कर सकते हैं?

डॉ. सुजीत कुमार सिंह: बच्चों के लिए वैक्सीन का ट्रायल जारी है। न सिर्फ वैक्सीन के ट्रायल बल्कि सीरो-सर्वे भी होते हैं। सीरो-सर्वे में हमने देखा कि बच्चे भी वायरस की चपेट में आए हैं। साथ ही बच्चों में गंभीर संक्रमण अभी तक देखने को नहीं मिला है। लेकिन बच्चों की सुरक्षा को लेकर सभी चिंतित हैं। जैसे ही यह स्टडी पूरी होगी बच्चों के लिए भी वैक्सीन उपलब्ध हो जाएगी।

आप पूरी बातचीत यहां सुन सकते हैं:

 

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