दुर्गाबाड़ी में महिलाएं पहले एक घंटे ही करती थीं मां दुर्गा के दर्शन, अब हर विधान में होती है भागीदारी

Durga Puja News Ranchi News रांची के दुर्गाबाड़ी में 1883 से पूजा प्रारंभ हुई। 1921 के बाद महिलाओं को दर्शन की पूरी छूट मिली। 1927 में यहां बलि प्रथा भी बंद कर दी गई। दुर्गाबाड़ी के सामने पांच दिनों तक मेला चलता था।

Sujeet Kumar SumanTue, 12 Oct 2021 07:43 PM (IST)
Durga Puja News, Ranchi News रांची के दुर्गाबाड़ी में 1883 से पूजा प्रारंभ हुई।

रांची, [संजय कृष्ण]। रांची के दुर्गाबाड़ी में 1883 से पूजा की शुरुआत हुई, जो आज तक निर्बाध चली आ रही है। रांची में बांग्ला समाज के ऐतिहासिक अवदानों पर रोशनी डालने वाले डा. रामरंजन सेन बताते हैं कि महिलाओं को पहले नवमी के दिन सिर्फ एक घंटे रात्रि आठ से नौ बजे तक ही मां का दर्शन करने की छूट थी। उस समय मंदिर से पुरुष बाहर निकल जाते थे। बाद में इसका विरोध शुरू हुआ। सवाल उठा कि आखिर मातृशक्ति मां का दर्शन केवल एक घंटे ही क्यों करेगी?

इसके बाद 1921 में महिलाओं का अबाध प्रवेश का द्वार खुल गया। अब मां का शृंगार भी महिलाएं ही करती हैं। सिंदूरखेला के साथ मां की विदाई में भी इनकी ही मुख्य भूमिका होती है। यहां पूजा की शुरुआत जिला स्कूल के संस्कृत शिक्षक पंडित गंगा चरण बागीश ने कुछ धर्म परायण व्यक्तियों के साथ मिलकर की थी। आज दुर्गाबाड़ी का जो भव्य रूप दिखता है, यह पहले खपरैल का था।

रातू घराने से पूजा की शुरुआत

कहा जाता है कि रांची में दुर्गापूजा की शुरुआत रातू राज घराने से 1870 से हुई। रांची का यह प्रथम दुर्गोत्सव था। रातू किले के मुख्य द्वार से थोड़ा हटकर यहां मां का मंदिर है। किले के भीतर बलि स्थान भी है। यह राजा का उत्सव था। इसके लगभग 13 साल बाद श्री श्री हरिसभा और दुर्गाबाड़ी संस्था स्थापित हुई, जहां आम जनता ने मिलकर पूजा की शुरुआत की।

वीरभूम के मूर्तिकार गढ़ते हैं प्रतिमा

जब से दुर्गाबाड़ी में पूजा प्रारंभ हुई, तब से वीरभूम के मूर्तिकार ही एकचाला प्रतिमा गढ़ते हैं। बंगाल के वीरभूम जिले के देवेंद्र नाथ सूत्रधार इसके पहले मूर्तिकार थे। आज भी उनके वंशज ही प्रतिमा गढ़ते हैं। जन्माष्टमी के दिन प्रतिमा का निर्माण कार्य प्रारंभ होता है।

बलि प्रथा का था प्रचलन

प्रारंभ में यहां तांत्रिक विधि से पूजा होती थी। तंत्र विधान के अनुसार ही यहां बलि प्रदान किया जाता था। बलिदान के बाद बकरे के खून का टीका लगाकर कुछ भक्त नृत्य भी करते थे। बाद में कुछ लोगों ने इस प्रथा का विरोध किया और बंद कर दिया गया। डा. पूर्ण चंद्र मित्र इस प्रथा के कट्टर विरोधी रहे। डा. रामरंजन सेन बताते हैं कि ऐसी प्रथा को बंद करवाने के लिए उन्होंने लोगों को अपना अभिमत लिखकर दिया और दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित किया कि वे इसका विरोध करें। इसके बाद 1927 में यह प्रथा बंद कर दी गई। इसी साल मंदिर का निर्माण भी किया गया। इसके बाद यहां एक प्रेक्षागृह भी बना।

पांच दिनों का मेला, विजया सम्मेलन का आयोजन भी

दुर्गाबाड़ी के सामने, जहां आज शास्त्री मार्केट है, वहां मेला लगता था। 1926 में मेले में आए दुकानदारों से शुल्क भी लिया जाने लगा। पांच दिनों तक मेला चलता था। मेले में लोगों की काफी भीड़ उमड़ती थी। तब शहर छोटा था और दुर्गोत्सव में आस-पास के गांवों से भी लोग आते थे। सन् 1926 से दुर्गा पूजा के बाद यहां विजया सम्मेलन का भी आयोजन होने लगा। पूजा के बाद किसी निर्धारित तिथि को बंग समाज के लोग यहां मिलते हैं। इस मौके पर सांस्कृतिक कार्यक्रम का भी आयोजन होता है।

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