पंचगव्य के दीये से इस बार घरों में आएंगी लक्ष्मी

हर कोई प्रकृति के अनुकूल दीपावली मनाने की बात कहता है लेकिन धनबाद की महिलाएं मिसाल पेश कर रही है।

JagranFri, 22 Oct 2021 07:30 AM (IST)
पंचगव्य के दीये से इस बार घरों में आएंगी 'लक्ष्मी'

मनोज सिंह, राची : हर कोई प्रकृति के अनुकूल दीपावली मनाने की बात कहता है, लेकिन धनबाद की तीन गावों की रहने वाली महिलाएं इस बात को सच साबित कर रही हैं। महिलाओं का समूह पंचगव्य का दीया बना रहा है, जो दिखने में सुंदर होने के साथ-साथ पर्यावरण के अनुकूल हैं। इसके लिए टाटा स्टील की सीएसआर की टीम ने धनबाद जिले के पेटिया, बेलाटाड़ और बासकपुरिया गाव की महिलाओं को पंचगव्य दीया बनाने की ट्रेनिंग दी है। इन्हें दीया बनाने वाली एक मशीन और इस्तेमाल होने वाली मुल्तानी मिट्टी भी दी है। पंचगव्य दीया बनाने में मुल्तानी मिट्टी का भी थोड़ा इस्तेमाल किया जाता है। जबकि, अन्य सामग्री गाव में ही मिल जाती है। ग्रामीण विकास महिला समिति, बासकपुरिया की भवानी देवी ने बताया कि टाटा स्टील की सीएसआर टीम ने उन्हें इसकी ट्रेनिंग दी है। इसके बाद 25 महिलाओं ने सितंबर में इसकी ट्रेनिंग ली। दीया बनाना शुरू कर दिया है। गाव के लोगों को दीया पसंद आ रहा है। सभी इस बार इसे इस्तेमाल करने की बात कह रहे हैं। उन्होंने बताया कि अब तक करीब तीन हजार से ज्यादा पंचगव्य का दीया बनकर तैयार हो गया है। कुछ दिनों में स्टॉल लगा कर बेचने की योजना है। फिलहाल बिना रंग का दीया तीन रुपये प्रति पीस और रंग रोगन के बाद पाच रुपये में बेचने की योजना है। दीये के अलावा शुभ-लाभ, स्वास्तिक और भगवान गणेश की मूर्ति भी बनाई जा रही है। सीएसआर टीम के एक सदस्य ने बताया कि इन गावों में देसी गाय की अधिकता है, लेकिन दूध कम देने की वजह से लोग इन्हें खुला छोड़ देते हैं। इस कारण इस क्षेत्र में फसल को नुकसान होता है। टीम ने इंटरनेट की मदद लेकर गाव की महिलाओं को पंचगव्य दीया बनाने की यह ट्रेनिंग दी। कई रूपों में फायदेमंद है पंचगव्य दीया

यह दीया गाय के दूध, घी, दही, गाय गोबर, गो मूत्र से बनाता है। इसको बनाने में पानी का उपयोग नहीं होता है, जिससे पानी की बचत होती है। यह बहुत हल्का होता है। गिरने से भी नहीं टूटता है। यह शत प्रतिशत प्राकृतिक, जैविक और स्वत: नष्ट होकर खाद में परिवर्तित हो जाता है। उक्त दीया न केवल आक्सीजन उत्पादन को बढ़ावा देता हैं, बल्कि वातावरण में मौजूद कार्बन और जहरीली हवा के कारण होने वाले प्रदूषण को भी दूर करते है। दीपावली के बाद इसके राख का उपयोग पौधों के लिए जैविक खाद के रूप में और मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में किया जा सकता है। इसमें तेल या घी का इस्तेमाल कर जलाने से मच्छरों के प्रकोप से बचा जा सकता है।

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