पुरबियों के जीवन की परिवर्तन कथा है अग्निलीक

जागरण संवाददाता, रांची :

शुक्रवार की शाम चाणक्या बीएनआर में अक्षरों की यात्रा में हिदी के जाने-माने लेखक हृषिकेश सुलभ अपने ताजा तरीन उपन्यास 'अग्निलीक' को लेकर उपस्थित थे। इसे राजकमल ने प्रकाशित किया है। 'कलम' के सारस्वत आयोजन में प्रभा खेतान फाउंडेशन, दैनिक जागरण और श्री अल्ट्रा सिमेंट की सहभागिता रही। सुलभ से बातचीत की महत्वपूर्ण कहानीकार पंकज मित्र ने। रचनात्मकता धैर्य की मांग करती है

सुलभ ने बताया कि रचनात्मकता धैर्य की मांग करती है। लेखक को लिखते वक्त यह सोचना चाहिए वह जो कल्पना या सत्य लिख रहा है, वह किसी ने कभी नहीं लिखा। जो पाठक उसे पढ़ने वाला है, वह पढ़ने से पहले उस सत्य से अंजान है। अपनी लेखनी से उससे हर कार्य को भावनात्मक रूप में होता हुआ दिखाना है। तभी लेखक की कोई रचना सार्थक हो सकती है। फिर अच्छी कहानी का जन्म संभव है। आज सोशल मीडिया के इस युग में हर किसी को जल्दी है। लिखने की, कुछ पाने की। फिर रचनात्मकता कैसे आएगी? कुछ लोग जिसे नए युग की हिदी कह रहे हैं, वे मेरे दो-तीन प्रतिशत से ज्यादा भाषाई आशा पर नहीं खड़ा नहीं हो सकते। मैं नई चीजों का हमेशा स्वागत करता हूं। मगर इस शर्त पर कि वो सुबह जागने के बाद भी मुझे याद रहे। चार पीढि़यों की कहानी

उपन्यास अग्निलीक में चार पीढि़यों की कहानी है। आजादी के पहले और बाद घाघरा और गंडक नदी के आसपास के इलाकों में आए परिवर्तन की कहानी है। इसके साथ ही सामंती सामाजिक संरचना में हो रहे बदलाव पर भी कुछ बिंदु केंद्रित है। दरअसल, यह उपन्यास पुरबियों के जीवन की परिवर्तन कथा है। हालांकि इस उपन्यास की शुरुआत एक हत्या से होती है और कहानी खत्म भी एक हत्या पर होती है, मगर मुस्लिम परिवेश की बात होते हुए भी इसमें सांप्रदायिकता का भाव आ जाता है। मगर मैं ऐसी पृष्ठभूमि से हूं, जहां आज भी 300 से ज्यादा परिवार मुस्लिम हैं। मैने अपने हाथों से ताजियों पर रंगीन कागज लगाया है। मैं कैसे मान सकता हूं कि कोई भी धर्म एक दूसरे के खिलाफ है। मेरे उपन्यास में स्त्री प्रेम को दिखाया है। सृष्टि में कोई ऐसा व्यक्ति नहीं जो प्रेम के बिना जीवित हो। हमने आज तक जीतना भी लिखा है वह स्त्रियों के लिए केवल एक प्रतिशत है। इससे कहीं अधिक अभी बाकी है। कहानी बनाम उपन्यास

एक सवाल के जवाब में सुलभ कहते हैं, ऐसा नहीं है कि इससे पहले उन्होंने उपन्यास लिखने की कोशिश नहीं की। मगर हर बार वह बीच में छूट गई। कहानी लिखने में जो सुख है, वह मेरे लिए ज्यादा प्रिय है। मेरे कई मित्र और पाठक मुझसे ये शिकायत करते हैं कि तुम्हारी कहानी में उपन्यास की झलक मिलती है। कुछ कहते हैं कि उपन्यास के विषय को मैंने कहानी बना दी। मगर मुझे लगता है कि कहानी के कम शब्दों में पाठक को ज्यादा भाव देना और सैकड़ों वर्षो के पार चले जाना एक बड़ा चैलेंज है। हर कहानी पहली कहानी

मैं कोई भी रचना शुरू करने से पहले डरता हूं। मेरे लिए हर कहानी पहली कहानी है, जिसे मैं लिखने जा रहा होता हूं। उसके पहले का लिखा पढ़ा मेरे सामने नहीं होता। किसी कहानी में प्रवेश का कोई एक रास्ता और कोई एक राग मेरे पास कभी नहीं रहा। कई बार पात्रों के माध्यम से स्थित तक पहुंचा हूं। कई बार स्थितियों के माध्यम से पात्र तक पहुंचा हूं। कई बार कोई विचार का पौधा मेरे लिए संसार के बड़े द्वार खोल दिए। एक कहानी को इसी रांची में मैंने सन 1981 में लिखना शुरू किया था। मगर वह कहानी 2000 के आसपास पूरी हुई। इतने सालों में एक दिन भी ऐसा नहीं गया, जब उसके नायक प्रत्यूष ने मेरा दरवाजा नहीं खटखटाया हो। मैं बदहाल जीता रहा इतने सालों तक इस कहानी को लेकर। लेखक के रूप में हम कई बार बहुत कुछ तय नहीं कर सकते। मेरे नाट्य में कविता की झलक मिलना मेरी शैली नहीं है। मैं जब नाटक लिखता हूं कि उसमें कुछ पद होते हैं। एक बड़े लेखक ने कहा है कि कविता को गद्य नहीं होना चाहिए मगर गद्य तक पहुंचना चाहिए। ठीक वैसे ही किसी गद्य को कविता नहीं होना चाहिए, मगर कविता तक पहुंचा चाहिए। रेणु ने कभी सोचा नहीं था कि वे जिस कथा को सहज भाव से लिख रहे हैं वह एक टैग हो जाएगी। जब लेखक पहले से कुछ मान कर लिखता है तो वह उस उद्देश्य तक नहीं पहुंच पाता है। इसलिए मुक्ति का होना जरूरी है।

कार्यक्रम में रांची दूरदर्शन के पूर्व निदेशक पीके झा, कहानीकार कमलेश, रश्मि शर्मा, सत्या कीर्ति शर्मा, पूनम आनंद, डॉ सीमा सिंह सहित कई साहित्यप्रेमी उपस्थित थे।

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