रांची में भवन प्लान स्वीकृत कराने में घिस जाती थीं चप्पलें, प्रशासन के गले की फांस बनीं अवैध इमारतें

राजधानी में लगभग दो लाख एक हजार इमारतों में से एक लाख 88 हजार 232 इमारतों का नक्शा पास नहीं है। महज 12 हजार 768 इमारतों का ही नक्शा पास है। रांची में मकान बनाने के लिए नक्शा पास कराने में लोगों को काफी परेशानी झेलनी पड़ती है।

Kanchan SinghFri, 22 Oct 2021 10:27 AM (IST)
रांची निगम क्षेत्र में मकान बनाने के लिए नक्शा पास कराने में लोगों को काफी परेशानी झेलनी पड़ती है।

रांची,जासं।  राजधानी रांची में अवैध इमारतों की संख्या अधिक होने के पीछे लोगों के पास जमीन के कागजात ठीक नहीं होने को कारण बताया जा रहा है। यह इमारतें या तो सरकारी जमीन पर बनाई गईं या फिर आदिवासी भूमि पर खड़ी की गई हैं। इसके अलावा पूर्व में आरआरडीए में नक्शा पास होने की जटिल प्रक्रिया के चलते भी लोगों ने बिना नक्शा पास कराए ही इमारतें खड़ी कर ली हैं। अब यह इमारतें प्रशासन के गले की फांस बन गई हैं। कोर्ट इन मामलों में प्रशासन और नगर निगम से बार बार जवाब मांगता है। अधिकारी जवाब देते देते थक गए हैं।

राजधानी में लगभग दो लाख एक हजार इमारतों में से एक लाख 88 हजार 232 इमारतों का नक्शा पास नहीं है। यहां महज 12 हजार 768 इमारतों का ही नक्शा पास है। नगर निगम के अधिकारियों का कहना है कि जब से नक्शा पास करने की ऑनलाइन प्रक्रिया शुरू हुई है। तब से नक्शे जल्दी मंजूर किए जाते हैं। अब नक्शा पास करने में हफ्ता भर लगता है। पहले नक्शे ऑफलाइन प्रक्रिया के तहत स्वीकृत किए जाते थे। तब इसमें समय भी ज्यादा लगता था। इस वजह से ज्यादातर लोग नक्शा पास नहीं कराते थे और इमारतें बना लेते थे। बरियातू के राम कुमार कहते हैं कि उनके पिता श्याम सिंह बताते हैं कि उन्होंने अपने मकान के नक्शे का आवेदन आरआरडीए में स्वीकृति के लिए दिया था। लेकिन, चार-पांच महीने में भी नक्शा पास नहीं हुआ। तो थक हार कर अपना मकान बना लिया।

बिना जेब ढीली किए नहीं बनता था नक्शा : यही नहीं लोगों का आरोप है कि आरआरडीए में नक्शा बिना जेब ढीली किए नहीं बनता था। आरआरडीए में काफी बिचौलिए सक्रिय थे। अगर आवेदन कर्ता बिचौलियों को नहीं सेट तरता था तो नक्शा आवेदन जमा करने के बाद दौड़ता रहता था। चप्पल घिस जाती थी लेकिन भवन प्लान स्वीकृत नहीं हो पाता था। इसी वजह से ज्यादातर लोगों ने नक्शा पास कराने के पचड़े से बचते हुए अवैध इमारतें खड़ी कर लीं। नक्शा नहीं पास कराने के पीछे दूसरी बड़ी वजह जमीन के कागजातों का ठीक नहीं होना है।

आदिवासी जमीन पर इमारतों का बनना भी एक कारण : आदिवासी जमीन पर अगर किसी ने मकान बनाया तो मकान का नक्शा पास नहीं होगा। ऐसी जमीन का नक्शा तभी पास होगा। जब आदिवासी जमीन को रजिस्ट्री कराने से पहले संबंधित व्यक्ति ने सक्षम प्राधिकार से इसकी अनुमति ली हो। लेकिन, आदिवासी भूमि पर बनी इमारतों के मामले में ऐसा नहीं है। लोगों ने आदिवासी जमीनें एग्रीमेंट पर खरीद लीं।

आदिवासी भूमि की रजिस्ट्री नहीं हुई। इसलिए भी नक्शे नहीं बन पाए हैं। क्योंकि, नक्शे के आवेदन के लिए सेल डीड भी होना जरूरी है। वहीं जिन लोगों ने चोरी-छिपे आदिवासी जमीन की रजिस्ट्री करा भी ली तो म्यूटेशन नहीं होने का पेंच फंसा। यही हाल सरकारी जमीन का है। रांची में बड़े पैमाने पर सरकारी जमीन पर अवैध बस्तियां बसीं। जमीन का कोई कागज नहीं होने की वजह से लोगों ने इसका नक्शा पास नहीं कराया। अब यही बिना नक्शे की बनी इमारतें सबके लिए सर दर्द हो गई हैं।

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