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रांची पुलिस की सतर्कता से एक और डॉ. इंतजार अली केस होने से बचा

रांची : कहते हैं दूध का जला मट्ठा भी फूंककर पीता है। रांची पुलिस ने बूटी मोड़ के पास एंटी टेररिस्ट स्क्वॉड (एटीएस) की कार्रवाई में भी यही फंडा अपनाया। नतीजा यह हुआ कि एटीएस ने जिन दो निर्दोष युवक आदिल अफरीदी व राकेश कुमार सिंह को हथियार सहित पकड़ने का दावा किया था, वह रंाची पुलिस के अनुसंधान में निर्दोष निकले और उन्हें थाने से ही जमानत दे दी गई। एटीएस की छापेमारी टीम को गुमराह कर खुद हथियार प्लांट कर छापेमारी करवाने वाले जमीन कारोबारी दिलावर खान, उसके सहयोगी सब्बीर व चालक ही इस पूरे खेल के असली मुजरिम निकले। उन्होंने विद्वेष में आकर सिमी के आतंकी की गलत सूचना देकर खुद हथियार प्लांट किया और एटीएस से रेड करवा दिया। अगर रांची पुलिस सतर्कता नहीं बरती होती, तो रांची में एक और डॉ. इंतजार अली केस दोहरा जाता।

डॉ. इंतजार अली हिदपीढ़ी के मक्का मस्जिद लेन के निवासी हैं। उनके साथ विस्फोटक प्लांट कर आतंकी साठगांठ के आरोप में उन्हें फर्जी तरीके से 20 अगस्त 2015 को गिरफ्तार किया गया था, जिसका खुलासा सीआइडी के अनुसंधान में हुआ था। 56 दिनों तक जेल में रहने के बाद सीआइडी से क्लीन चिट मिलने के बाद 16 अक्टूबर 2015 को डॉ. अली बिरसा मुंडा केंद्रीय कारा से रिहा हुए थे। इस मामले में सीआइडी ने अपने अनुसंधान में आर्मी इंटेलिजेंस के सूबेदार सत्य भूषण मिश्रा को दोषी पाते हुए गिरफ्तारी का वारंट निकाला था। हालांकि, सूबेदार सत्य भूषण मिश्रा ने हाई कोर्ट से अपनी गिरफ्तारी पर रोक लगवा रखी है।

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फर्जीवाड़ा का खुलासा होते ही सूबेदार का हो गया था स्थानांतरण :

डॉ. इंतजार अली को फर्जी तरीके से फंसाकर गिरफ्तार करने के मामले में सूबेदार की संलिप्तता उजागर होने के बाद उनका स्थानांतरण राची से कानपुर हो गया था। इस मामले में राची पुलिस के लिए मुखबिरी करने वाले दीपू खान को सीआइडी 30 नवंबर 2015 को गिरफ्तार किया था। बाद में दूसरा आरोपित मोहम्मद जाफरान भी गिरफ्तार किया गया था। दोनों पर चार्जशीट में जांच अधिकारी ने षड्यंत्र के तहत डॉ. इंतजार अली को विस्फोटक सामग्री रखने के आरोप में फंसाने का आरोपित पाया था। दोनों ही आरोपित जेल में हैं। दीपू खान ने ही अपने बयान में सूबेदार सत्य भूषण मिश्र का नाम लिया था। उसने अनुसंधान पदाधिकारी को बताया था कि सूबेदार के कहने पर ही वह इंतजार अली को फंसाने के लिए राची से किता रेलवे स्टेशन पर विस्फोटक ले गया था और ट्रेन में रखने में मदद की थी। इस मामले में उसने सूमो चालक जाफरान का भी नाम लिया था।

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जेल से छूटने के बाद बताई थी घटना की कहानी :

डॉ. इंतजार अली ने जेल से छूटने के बाद बताया था कि वे 20 अगस्त 2015 को झारखंड के सीमावर्ती बंगाल के झालदा में मेडिकल कैंप में गए थे। मरीजों की जांच के बाद वे झालदा स्टेशन पहुंचकर ट्रेन का इंतजार कर रहे थे। इसी बीच स्टेशन पर एक व्यक्ति आया और कहा कि भाईजान रांची जाओगे। इंतजार ने हां में सिर हिलाया। ट्रेन आई तो इंतजार आगे वाली बोगी की तरफ बढ़े और ट्रेन में सिंगल सीट पर बैठ गए। पूछने वाला शख्स भी उसी ट्रेन में चढ़ा। जैसे ही ट्रेन किता स्टेशन पर पहुंची, कुछ लोग ट्रेन की बोगी में चढ़े। इन्हें लगा कि टिकट चेक करेंगे, लेकिन उन्होंने बैग चेक किया। बैग में कुछ भी नहीं मिला। उनके सामने चार लोगों के बैठने वाली सीट के ऊपर से एक बैग मिला, जिसमें विस्फोटक थे। इसके बाद पुलिस के लोगों ने उनका कॉलर पकड़ लिया। इंतजार कहते रह गए कि उस बैग से उनका कोई लेना-देना नहीं, इसके बावजूद पुलिस उन्हें अपराधियों की तरह कॉलर पकड़कर ट्रेन से घसीटते हुए नीचे उतारी। एक अपराधी की तरह उन्हें पुलिस अपनी गाड़ी में बैठाकर सिल्ली थाने ले गई। पुलिस को ट्रेन से जो बैग मिला था, उस बैग में विस्फोटक के अलावा दो धार्मिक पुस्तक भी थे। इंतजार अपनी बेगुनाही का सुबूत देते रहे, लेकिन पुलिस ने उनकी एक न सुनी। डॉ. अली ने यह भी बताया कि उनकी बाइक रांची रेलवे स्टेशन पर खड़ी है। बरामद सामान से उनका कोई लेना-देना नहीं। इसके बावजूद सिल्ली से पुलिस उन्हें लेकर शाम पांच से छह बजे के बीच झारखंड जगुआर कार्यालय ले गई। जहां लाठी से हाथ-पैर में मारा, पीठ पर भी लाठियां बरसाई। दोनों पैर बांधकर अपराधियों की तरह पीटते रहे। भद्दी-भद्दी गालियां दीं। यह भी कहते थे कि जुर्म नहीं कुबूलने पर वे बिजली का शॉक देंगे, हीटर पर पेशाब करवाएंगे। इंतजार कहते रहे कि जब सामान उनका है ही नहीं, तो वे किसका नाम लें। वे यह भी बोले कि पुलिस जिसका नाम लेने के लिए बोलेगी, वह उसका नाम ले लेंगे, लेकिन पुलिस कुछ नहीं बोली। अगले दिन उन्हें जेल भेज दिया गया।

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