किसके लिए है झारखंड के खास लोगों के घरों में फले आम, पढ़ें यह रोचक खबर

Jharkhand News खास हों या आम फलों का राजा आम सबके लिए खास है। साल भर इस रसीले फल का इंतजार सबको रहता है। रांची में सरकारी आवासों के अहाते में भी आम के वृक्ष हैं। यहां रहने वाले इसका लुत्फ उठाते हैं। सवाल उठता है इसपर अधिकार किसका है।

Sujeet Kumar SumanSat, 12 Jun 2021 12:27 PM (IST)
Jharkhand News खास हों या आम, फलों का राजा 'आम' सबके लिए 'खास' है।

रांची, [प्रदीप सिंह]। पकने को तैयार हो चुके इन आमों को अपने आवास स्थित वृक्ष से तोड़ा। आम को बिना कार्बाइड के पकाने की तैयारी है। कई वृक्षों में आम अभी भी छोटे हैं। इंटरनेट मीडिया पर यह संदेश राज्य सरकार के पूर्व मंत्री और रांची के विधायक सीपी सिंह ने जब डाला तो प्रतिक्रिया में कई लोगों ने फलों के राजा आम को चखने की इच्छा प्रकट की।

इसके जवाब में उन्होंने लिखा- आम को तोड़कर पकने के लिए रखा गया है। मुझे लगता है, तीन-चार दिन में सभी आम पक जाएंगे। अभी कोरोना काल है इसलिए कोई पार्टी नहीं होगी। यदि कोई व्यक्ति घर आएगा तो उन्हें अवश्य आम खिलाया जाएगा। मेरा परिवार तो पूरा रांची है, आम के लिए किसी को मना नहीं है। लेकिन इनविटेशन नहीं है, अभी भी हजारों आम पेड़ों पर हैं। शुभ रात्रि।

झारखंड विधानसभा के अध्यक्ष रहे सीपी सिंह के इस पोस्ट से सवाल उठ रहे हैं कि सरकारी आवास में होने वाली पैदावार पर हक आखिरकार किसका है। राजधानी रांची में सैकड़ों सरकारी आवास हैं, जिसमें चार दर्जन से ज्यादा आवासों के अहाते बड़े हैं। इसमें फलदार वृक्ष लगे हैं और कृषि कार्य भी होता है। इसका लुत्फ सरकारी आवासों में रह रहे लोग उठाते हैं।

राज्य प्रशासनिक सेवा के एक अधिकारी के मुताबिक सरकारी आवासों का निर्माण और उसकी देखरेख का जिम्मा भवन निर्माण विभाग का है। इसके निर्माण और रखरखाव पर काफी पैसे खर्च होते हैं। नियमानुसार आवासों के अहाते में लगे वृक्षों से फल समेत अन्य पैदावार को बाजार दर पर बेचकर पैसा सरकारी खजाने में जमा करा देना चाहिए। विभाग को स्वयं इसका आकलन करना चाहिए, लेकिन प्रभावशाली लोगों के सामने उनकी एक नहीं चल पाती है। कोई पदाधिकारी इसे लेकर जोखिम भी नहीं उठाना चाहता।

अलग-अलग पूल के आवास

राजधानी रांची में अलग-अलग पूल के सरकारी आवास हैं। पद और कद के मुताबिक इसका आवंटन होता है। कई अफसरों-नेताओं को आवास का मोह इस कदर हो जाता है कि वे रिटायर होने अथवा स्थानांतरित होने के बाद भी इसे खाली नहीं करते। ऐसे में असुविधा का भी सामना करना पड़ता है। बूटी रोड, कांके रोड से लेकर धुर्वा तक सरकारी आवास अलग-अलग कैटेगरी के हैं। पुराने आवास बड़े भूखंड में बने हैं। नए सरकारी आवास में खाली जमीन नहीं के बराबर हैं। मनपसंद आवास से हटाने जाने पर कई दफा माननीय कोर्ट तक का भी दरवाजा खटखटाते हैं। आवास से हटाने के लिए कई दफा बल प्रयोग भी करना पड़ता है।

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