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डाक विभाग की लेटलतीफी कैदियों को पड़ रही भारी, जमानत के बाद भी रिहाई का इंतजार

रांची, [मनोज सिंह] । कोरोना संकट को देखते हुए एक ओर जहां सुप्रीम कोर्ट जेल में बंद कैदियों की संख्या कम करने की बात कह रहा है। वहीं, दूसरी ओर कोर्ट का रिलीज आदेश पोस्ट से भेजे जाने के कारण हो रही देरी से कैदियों को दो से तीन हफ्तों तक अतिरिक्त जेल में रहना पड़ रहा है। हालांकि कोरोना संकट को देखते हुए जेल से ही वकालतनामा पर कैदियों के हस्ताक्षर की प्रति मेल या फैक्स से भेजी जा रही है, लेकिन रिलीज आदेश की प्रति अभी भी पोस्ट से भेजी जा रही है, जिससे कैदियों की रिहाई में देरी हो रही है।

आर्टिकल 14 और 21 का उल्लंघन

नियमानुसार जब बेल बांड भरने के बाद निचली अदालत रिलीज आदेश जारी करती है, तो कैदी को 24 घंटे के अंदर जेल से छोड़ देना चाहिए। ऐसा नहीं होना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और 21 (जीने का अधिकार) का उल्लंघन है। रिलीज आदेश जारी होने के बाद अगर किसी कैदी को जेल में रखा जाता है, तो जेल में बिताए गए अतिरिक्त समय को उनकी कस्टडी अवधि भी नहीं मानी जाती है, क्योंकि कोर्ट रिलीज आदेश जारी कर चुका होता है। ऐसे में उसे जेल में रखना उसके अधिकारों का हनन है।

केस -1

गुमला के रहने वाले ललित ङ्क्षसह को 15 जून को हाई कोर्ट से जमानत मिली। 23 जून को उन्होंने निचली अदालत में बेल बांड भरा और उसी दिन रिलीज आदेश जारी कर दिया गया। लेकिन 15 दिनों के बाद उन्हें जेल से रिहा किया गया।

केस -2

गुमला जिले के ही हाशिद मीर को 22 जून को हाई कोर्ट से जमानत मिली। एक जुलाई को उन्होंने निचली अदालत में बेल बांड भरा और उसी दिन रिलीज जारी हुआ, लेकिन 15 दिन बाद रिहाई हुई।

केस-3

गुमला जिले के रहने वाले रघुनाथ लोहरा को दो जुलाई को हाई कोर्ट से जमानत मिली है। नौ जुलाई को उन्होंने निचली अदालत में बेल बांड भर दिया और अदालत ने रिलीज आदेश जारी कर दिया, लेकिन अभी तक जेल में बंद हैं।

वकालतनामा फैक्स व मेल से स्वीकार पर आदेश नहीं

अधिवक्ता रितेश कुमार ने कहा कि कोरोना संकट को देखते हुए हाई कोर्ट सहित अन्य कोर्ट ऑनलाइन सुनवाई कर रहे हैं। इस दौरान जेल प्रशासन द्वारा कैदियों से वकालतनामा पर हस्ताक्षर लेकर उसे फैक्स या मेल से भेज दिया जा रहा है, लेकिन कैदियों को जमानत मिलने के बाद रिलीज आदेश पोस्ट से भेजा जा रहा है। इससे अनावश्यक विलंब हो रहा है।

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