JPSC: झारखंड हाईकोर्ट ने नई नियमावली पर सरकार से मांगा जवाब... किस वजह से हिंदी और अंग्रेजी को भाषा की श्रेणी से हटा दिया गया

JPSC झारखंड हाईकोर्ट में जेएसएससी परीक्षा के लिए बनाई गई सरकार की नई नियमावली के खिलाफ दाखिल याचिका पर सुनवाई हुई। अदालत ने राज्य सरकार से जवाब मांगा है। अदालत ने पूछा है आखिर किस वजह से हिंदी और अंग्रेजी को भाषा की श्रेणी से हटा दिया गया है।

Kanchan SinghWed, 01 Dec 2021 03:49 PM (IST)
झारखंड हाईकोर्ट में जेएसएससी परीक्षा के लिए बनाई गई सरकार की नई नियमावली के खिलाफ दाखिल याचिका पर सुनवाई हुई।

रांची, राब्यू। झारखंड हाई कोर्ट Jharkhand High Court ने राज्य सरकार की ओर से हाल ही में झारखंड कर्मचारी चयन आयोग की नियुक्ति नियमावली में किए गए संशोधन के बारे में सरकार से जानकारी मांगी है। झारखंड हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस Chief Justice डा. रवि रंजन व जस्टिस एसएन प्रसाद की अदालत ने मामले पर सुनवाई करते हुए मौखिक रूप से यह भी पूछा कि क्या उक्त नियमों के आधार पर राज्य सरकार शत-प्रतिशत आरक्षण देने की धारणा के साथ कार्य कर रही है। साथ ही जानना चाहा कि परीक्षा में हिंदी और अंग्रेजी को पेपर-दो से हटाकर उर्दू, बंगला तथा अन्य भाषाओं को शामिल करने का क्या औचित्य है।

कोर्ट में पेश करें संचिका

अदालत ने कहा कि यह गंभीर विषय है इसलिए राज्य सरकार उक्त नियमों में संशोधन से संबंधित संचिका कोर्ट में पेश करे। यदि इस नियमावली से नियुक्ति प्रक्रिया की जाती है, तो यह विज्ञापन समेत नियुक्ति पत्रों में स्पष्ट कर दिया जाए कि सभी नियुक्तियां लंबित मामले में कोर्ट के अंतिम आदेश से प्रभावित होंगी। इस मामले में अब अगली सुनवाई 21 दिसंबर को होगी। इस मामले में कुशल कुमार और रमेश हांसदा की ओर से हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की गई है।

आरक्षित और अनारक्षित के लिए अलग-अलग योग्यता व नियम कैसे

सुनवाई के दौरान वरीय अधिवक्ता अजीत कुमार ने अदालत को बताया कि नई नियमावली में उन अभ्यर्थियों को शामिल किए जाने की अनिवार्यता रखी गई है, जिन्होंने राज्य के मान्यता प्राप्त संस्थान से 10वीं और इंटरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण की हो। इसके अलावा नियम 10 (भाषा) में संशोधन किया गया, जिसके अनुसार पेपर-दो से हिंदी और अंग्रेजी भाषा को हटाया जाना असंवैधानिक है। दोनों संशोधन संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के विरुद्ध है। शैक्षणिक संस्थानों की स्थिति के आधार पर जो सरकार ने वर्गीकरण करने का संकल्प लिया है, वह संविधान के प्रविधानों के अनुसार पोषणीय नहीं है। यदि परीक्षा के लिए मूल योग्यता स्नातक है, तो ऐसे में 10वीं और इंटरमीडिएट राज्य के संस्थानों से ही उत्तीर्ण होने की शर्त गैरकानूनी है।

इस प्रकार का वर्गीकरण शत-प्रतिशत आरक्षण के समान है, क्योंकि वैसे अभ्यर्थी जो झारखंड के निवासी हैं और किसी वजह से राज्य के बाहर से पढ़ाई किए हों, वह इस परीक्षा में शामिल ही नहीं हो पाएंगे। यह संविधान की अवधारणा के विरुद्ध है। कहा गया कि पेपर-दो से हिंदी और अंग्रेजी को हटाकर उर्दू को शामिल करना सिर्फ और सिर्फ राजनीतिक उद्देश्य की पूर्ति करता है। राज्य के हिंदी भाषी छात्रों के अधिकारों का हनन नहीं किया जा सकता है। जब आरक्षित श्रेणी के अभ्यर्थियों को10वीं और 12वीं की योग्यता राज्य के बाहर के संस्थानों से प्राप्त करने की भी छूट दी गई है, तो सामान्य वर्ग के लिए अलग प्रविधान क्यों। यह वर्गीकरण भी संविधान के प्रविधानों के अनुसार अमान्य घोषित की जानी चाहिए।

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