ये बंडी वाले जनाब मिजाज से तनिक तुनकमिजाज हैं... आप भी जानिए इनके बारे में...

Jharkhand Political Update: राज्‍य ब्‍यूरो के सहयोगी आनंद मिश्र के साथ यहां पढ़ें सियासत की खरी-खरी...

Jharkhand Political Update जनाब मिजाज से तनिक तुनकमिजाज हैं। इनका मिजाज इनकी सियासी पारी में ही दिख रहा है। इन्हें छोड़ो उसे पकड़ो के माहिर खिलाड़ी हैं जैसा पकड़म-पकड़ाई में होता है। खैर बता दें कि तीर वाले तीर-कमान की काट के रूप में इन्हें बड़ी उम्मीदों से लाए थे।

Alok ShahiMon, 01 Mar 2021 04:58 AM (IST)

रांची, राज्‍य ब्‍यूरो। झारखंड में सियासत गर्म है। कुछ तपिश बंगाल चुनाव के चलते तो कुछ झारखंड विधानसभा के बजट सत्र के चलते। सत्‍ता पक्ष और विपक्ष दोनों आमने-सामने डटे हैं। एक-दूसरे की टांग खींचने के किसी मौके को छोड़ना नहीं चाहते। राज्‍य ब्‍यूरो के सहयोगी आनंद मिश्र के साथ यहां पढ़ें सियासत की खरी-खरी...

पसंदीदा पिच

पिच क्रिकेट की हो या सियासत की, मनमाफिक होगी या तैयार की जाएगी तो परिणाम अहमदाबाद टेस्ट सरीखे ही आएंगे। फिर इसे मास्टर स्ट्रोक और गुजरात मॉडल जैसे नाम दिए जाएंगे। इन दिनों ऐसी ही पसंदीदा पिचें तैयार करने का कल्चर जोरों पर है। पड़ोसी पश्चिम बंगाल में झोंका गया है रसद-पानी। इससे प्रतिकूल परिणाम आने का जोखिम कम हो जाता है, आए भी तो उसकी भरपाई के चांसेज बने रहते हैं। ऑफर ही डिस्काउंट के साथ कुछ ऐसे परोसे जाते हैं कि लोग पल्टी मार ही देते हैं। अपने यहां भी इन दिनों सबसे बड़ी पंचायत बैठी है, जिसमें दोनों खेमों की ओर से अपनी-अपनी पार्टी के एजेंडे के अनुरूप ऐसी सियासी पिच तैयार की जा रही है, जो डिच न दें। गेंद ऐसा टर्न ले कि वोट टर्नआउट पक्ष में हो। भले ही बल्लेबाज कहीं का हो। सदन चले न चले, मधुपुर का जलवा बरकरार रहे।

यह तीर भी निशाना चूका

जनाब मिजाज से तनिक तुनकमिजाज हैं। इनका मिजाज इनकी सियासी पारी में ही दिख रहा है। इन्हें छोड़ो, उसे पकड़ो के माहिर खिलाड़ी हैं जैसा पकड़म-पकड़ाई में होता है। खैर बता दें कि सूबे में सियासी जमीन तलाश रहे तीर वाले, तीर-कमान की काट के रूप में इन्हें बड़ी उम्मीदों से लाए थे। सोचा था निशाने पर लगेगा तीर, लेकिन हो गया धोखा। बोलने लगे तो उन्हीं पर बरस पड़े। दरअसल, ये साथ निभाने वाले लखन हैं ही नहीं। फितरत ही कुछ ऐसी है। जिस डाली पर बैठते हैं, उसे काट कर ही दम लेते हैं। कमल दल वालों ने पड़ोसी राज्य से सीट रिजर्व करा दिल्ली भेजा था कभी, कमल ही कुम्लाहने लगा। कोई ऐसा दल नहीं जहां ये न रहे हों, इनका तो एक ही जुमला है, ऐसा कोई सगा नहीं जिसे हमने ठगा नहीं। अब नए ठौर की तलाश में हैं।

नई गाइडलाइन

शासकीय अंदाज जुदा होता है, इस सिस्टम की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह काम कम और उंगली ज्यादा करता है। उंगली की दिशा अपेक्षाकृत दबी आवाजों की ओर होती है। यह कमजोर को दबाता है और अक्सर रसूखदार के घुटनों के नीचे झुका पाया जाता है। इसी में इसकी ताकत की शान समाई है। दूसरी सरकार से वेतन-भत्ता पाने वालों का हालिया फरमान, तीसरी सरकार की नुमाइंदगी करने वाले मुखिया जी के लिए जारी हुआ है। गाइडलाइन बाकायदा फार्मेट के साथ जारी की गई है। इसका जो इसका पालन करें उसकी कई पीढ़ी कर ले चुनाव से तौबा। दरअसल, संवैधानिक दर्जा प्राप्त तीसरी सरकार के हक की बात करने और उन्हें हक दिलाने में फर्क है। सो पेंच ऐसा फंसाओ कि उलझ कर रहे जाएं सभी। और जो इसे ना माने उनके लिए कानून की तमाम धाराओं का उपयोग तो किया ही जा सकता है।

अपना-अपना राग

कमल दल में आजकल लाइमलाइट में आने का जोर है। मौका मिला नहीं कि सभी टूट पड़ते हैं एक साथ। जमीन से ज्यादा बयानों में जोर है इनका। दिनरात लोग इसी गम में दुबले हुए जा रहे हैं कि कैसे कुर्सी पर कब्जा हो जाए लेकिन कोई गुंजाइश दिखती नहीं। उस वक्त को कोस रहे हैं जब जरा सी गलती का खामियाजा भुगतना पड़ा। बेचारे कहते फिर रहे हैं-लम्हों ने खता की, सदियों ने सजा पाई। दूसरी तरफ वे भी हैं जिन्होंने लम्हों की खता पर पूरा ग्रंथ ही लिख डाला है। वह चक्कर नहीं लगा होता तो आज सीन कुछ दूसरा ही होता। बोलने वाले तो यहां तक कहते हैं कि जिस तरह से सामने वाला एक-एक इश्यू पर चौके-छक्के जड़ रहा है, उसमें बाउंड्री पर कैच लपके बिना कोई गुंजाइश नहीं दिखती फिर से वापसी की।

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