विधानसभा नियुक्ति घोटाले में कार्रवाई पर असमंजस

रांची, राज्य ब्यूरो। विधानसभा नियुक्ति घोटाले में राजभवन की ओर से कार्रवाई की अनुशंसा करने के बाद गहमागहमी बढ़ गई है। इस बारे में निर्णय और कार्रवाई की प्रक्रिया विधानसभा अध्यक्ष दिनेश उरांव के निजी दौरे से वापस लौटने के बाद ही होगा लेकिन इस पर सरगर्मी शुरू हो गई है। चूंकि कार्रवाई के दायरे में दो पूर्व स्पीकरों समेत प्रभारी सचिव भी आ रहे हैं, ऐसे में विधानसभा सचिवालय में दिन भर चर्चा का विषय यह रहा कि क्या वर्तमान अध्यक्ष अपने पूर्ववर्ती के खिलाफ कानूनी प्रक्रिया शुरू करा सकते हैं? इस मसले पर अलग-अलग राय सामने आ रही है। ऐसे में सर्वाधिक संभावना इसकी दिख रही है कि कार्रवाई के बारे में सबसे पहले कानूनी राय ली जाए। रिपोर्ट में नियुक्ति घोटाले में बड़े पैमाने पर हेराफेरी पाए जाने के साथ ही वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में यह तय माना जा रहा है कि जिम्मेदार लोग बख्शे नहीं जाएंगे।

विधानसभा नियुक्ति घोटाले की जांच करने वाले जस्टिस विक्रमादित्य आयोग की रिपोर्ट और राज्यपाल की अनुशंसा के मद्देनजर कानूनी राय की संभावनाओं पर विचार आरंभ कर दिया गया है। संभावना है कि जल्दी ही फाइल विधि विभाग के जरिए राज्य सरकार के महाधिवक्ता को भेजी जाएगी। महाधिवक्ता की राय के बाद आगे फैसला होगा कि क्या कार्रवाई की जाए? अंतिम नतीजे पर पहुंचने के पहले विधानसभा सचिवालय तमाम कानूनी पहलुओं पर संतुष्ट होना चाहता है।

एक दलील यह दी जा रही है कि वैधानिक पद होने के नाते स्पीकर के खिलाफ उनके द्वारा किए गए फैसले को लेकर कानूनी कार्रवाई संभव नहीं है। स्पीकर विधानसभा की नियुक्ति-प्रोन्नति के मामले में फैसले लेने को सक्षम हैं जबकि एक पक्ष का यह भी कहना है कि अनियमितता के मामले में स्पीकर के खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।

अहम कड़ी है ऑडियो सीडी :

विधानसभा नियुक्ति घोटाले की कड़ी दर कड़ी जोड़ने में एक ऑडियो सीडी की अहम भूमिका रही। इस सीडी को विधानसभा के एक चपरासी ने अपने साथी की मदद से तैयार किया था। इसमें कई लोगों से बातचीत और पैसे के बारे में चर्चा है। ऑडियो सीडी मंत्री सरयू राय ने तत्कालीन स्पीकर आलमगीर आलम को सौंपी थी। आलम ने तत्काल विधानसभा की एक कमेटी बनाकर जांच कराने की घोषणा की। कमेटी के सभापति राधाकृष्ण किशोर थे लेकिन विधानसभा सचिवालय ने उन्हें सहयोग नहीं किया। आगे की कार्रवाई के लिए इस सीडी को आधार बनाया जा सकता है। विक्रमादित्य आयोग की रिपोर्ट और अनुशंसा में इसका जिक्र है।

अजब-गजब खेल, दर्जनों कॉपियों की हैंडराइटिंग एक : विधानसभा नियुक्ति घोटाले की जाच रिपोर्ट में उन तमाम तथ्यों को शामिल किया गया है जो आयोग को इस क्रम में मिले हैं। इसमें विधानसभा के सहायक की लिखित परीक्षा के दौरान पकड़ में आया कि कई कॉपियों की हैंडराइटिंग एक थी। ज्यादातर कॉपियों के सवालों के उत्तर भी लगभग समान थे।

पैरवी पर बहाली को सारे नियम ध्वस्त : विधानसभा में नियुक्ति के दौरान अनियमितता की सारी हदें पार की गईं। एक तत्कालीन विधायक के भाई का ड्राइविंग लाइसेंस के बगैर चालक के पद पर चयन हुआ। विज्ञापन में उल्लेख किए गए आवेदन की तिथि के बाद आवेदन लेने के बावजूद उसका इंटरव्यू भी हुआ। विभिन्न पदों के लिए हुई लिखित परीक्षा की कॉपी जाच के लिए राज्य के बाहर के केंद्रों पर या विषय विशेषज्ञ के पास नहीं भेजी गई। इसे विधानसभा के कर्मियों ने ही चेक किया। जाहिर है कि पसंदीदा लोगों को मनमुताबिक नंबर देने के लिए सारा खेल रचा गया।

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