ऐसे थे गोपाल भेंगरा: खेल के साथ जंग के मैदान में भी भारत के लिए लड़े पर संघर्ष के दिनों में किसी ने नहीं दिया साथ

विश्व कप सहित कई अंतरराष्ट्रीय हॉकी प्रतियोगिता में देश का प्रतिनिधित्व करने और 1965 व 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में जाबांज सैनिक की भूमिका निभाने वाले गोपाल भेंगरा अब हमारे बीच नहीं रहे। एक सितारे का चुपके से चले जाने से हॉकी खिलाड़ी और खेल प्रेमी आहत हैं।

Vikram GiriMon, 09 Aug 2021 12:44 PM (IST)
पूर्व हॉकी प्लेयर गोपाल भेंगरा के निधन से पूर्व घर में बच्चों के साथ की तस्वीर। फाइल फोटो। जागरण

रांची/खूंटी [दिलीप कुमार] । विश्व कप सहित कई अंतरराष्ट्रीय हॉकी प्रतियोगिता में देश का प्रतिनिधित्व करने वाले और 1965 व 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में जाबांज सैनिक की भूमिका निभाने वाले गोपाल भेंगरा अब हमारे बीच नहीं रहे। एक सितारे का चुपके से चले जाने से खूंटी जिले के हॉकी खिलाड़ी और खेल प्रेमी आहत हैं। पूर्व अंतरराष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी गोपाल भेंगरा काे ब्रेन हेमरेज के बाद उनके स्वजन इलाज के लिए रांची ले गए थे। रांची के गुरुनानक अस्पताल में तीन दिन तक इलाज के दौरान उनकी स्थिति नाजुक बनी हुई थी। इलाज के दौरान सोमवार को उनकी मृत्यु हो गई।

अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी होने के बावजूद गुमनाम जीवन जीने को मजबूर थे गोपाल भेंगरा

गोपाल भेंगरा पिछले कई वर्षों से अपने गांव में गुमनाम जीवन जी रहे थे। कभी परिवार के भरण-पोषण के लिए पत्थर तोड़कर मजदूरी करने वाले गोपाल भेंगरा के जीवन में एक समय ऐसा भी आया था जब वे हॉकी का नाम भी लेना नहीं चाहते थे। गोपाल भेंगरा ने 1978 में अर्जेंटिना में आयोजित विश्व कप हॉकी प्रतियोगिता में देश का प्रतिनिधित्व किया था। उसी वर्ष उन्होंने पाकिस्तान के साथ टेस्ट मैच में भी भाग लिया था। कई वर्षों तक वे पश्चिम बंगाल टीम के कप्तान भी रहे थे। मोहन बागान की ओर से वे कई बार खेल चुके थे।

1965 व 1971 के युद्ध में निभाई थी महत्वपूर्ण भूमिका

1979 में बैंकाक में हुई दक्षिण एशिया हॉकी प्रतियोगिता में भारतीय टीम में शामिल थे। इतना होने के बाद जब वे सेवानिवृत्त हुए और उनकी आर्थिक स्थिति काफी खराब हो गई, तो किसी ने उनकी सुधि नहीं ली। गोपाल भेंगरा हॉकी के अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी के साथ-साथ सेवानिवृत्त सैनिक भी थे। उन्होंने पाकिस्तान के साथ 1965 और 1971 हुई लड़ाई में अहम भूमिका निभाई थी। गोपाल भेंगरा को सेवानिवृत्ति के बाद इतनी कम पेंशन मिलती थी कि परिवार का गुजारा मुश्किल हो गया था।

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