Jharkhand: बरसाती आलू से किसान होंगे समृद्ध, राज्य में पूरी होगी आलू की कमी

झारखंड के करीब 34 हजार हेक्टेयर भूमि में आलू की खेती की जाती है। इनमें रांची एवं हजारीबाग जिले के करीब 5 हजार हेक्टेयर भूमि में खरीफ मौसम में बरसाती आलू की खेती की जाती है। झारखंड में आलू की सालाना खपत करीब 30 लाख टन है।

Vikram GiriSun, 13 Jun 2021 11:15 AM (IST)
बरसाती आलू से किसान होंगे समृद्ध, राज्य में पूरी होगी आलू की कमी। जागरण

रांची, जासं । झारखंड के करीब 34 हजार हेक्टेयर भूमि में आलू की खेती की जाती है। इनमें रांची एवं हजारीबाग जिले के करीब 5 हजार हेक्टेयर भूमि में खरीफ मौसम में बरसाती आलू की खेती की जाती है। झारखंड में आलू की सालाना खपत करीब 30 लाख टन है, जबकि राज्य में पैदावार महज 9 लाख टन ही है। ऐसे में राज्य को आलू की आपूर्ति के लिए पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल, बिहार और उत्तर प्रदेश पर निर्भर रहना पड़ता है। ऑफ सीजन में राज्य में आलू की भारी कमी हो जाती है। हाल के दिनों में राज्य के शहरों के बाजारों में आलू की कीमत 20 प्रतिशत तक बढ़ गई है। ऐसे में बिरसा कृषि विवि ने किसानों को इस खरीफ मौसम में आलू की खेती करने की सलाह दी है।

बीएयू के डीन एग्रीकल्चर डा एमएस यादव बताते हैं कि देश में बरसाती आलू की खेती सबसे पहले रांची जिले के बेड़ो इलाके में ही होती थी। इस इलाके के कई किसान आलू की खेती से जुड़े थे। आलू के उत्पादन के मामले में बेड़ो झारखंड में प्रथम स्थान पर है। बेड़ो में आलू का उत्पादन सितंबर माह के पहले सप्ताह से प्रारंभ हो जाता है। इसकी उपज मिलने पर झारखंड में आलू की किल्लत कुछ हद तक दूर होती है।

एमएस यादव ने बताया कि झारखंड में आलू का उत्पादन बढ़ाकर ही राज्य में आलू की कमी को दूर किया जा सकता है। साथ ही किसानों को इससे बेहतर लाभ हो सकता है। इसे राज्य सरकार को केवीके माध्यम से प्रोत्साहित करने की जरूरत है। किसानों को सस्ते बीज और कोल्ड स्टोरेज की उपलब्धता से इसे बढ़ावा दिया जा सकता है। उन्होंने बताया कि बरसात का मौसम शुरू होते ही पहाड़ी क्षेत्रों का तापक्रम कम होने लगता है। इस क्षेत्र का पूरा वातावरण आलू की खेती के लिए अनुकूल हो जाता है। इन क्षेत्रों में मध्य जुलाई से सितंबर के प्रथम सप्ताह तक आलू की बोआई की जा सकती है।

बरसाती आलू की खेती के लिए अच्छी निकास वाली बलूई दोमट मिट्टी तथा ऊंचा एवं ढालूआ खेत का चयन करना चाहिए। खेतों में जल निकास का उपयुक्त इंतेजाम किया जाना जरूरी होता है। खेत की 2-3 बार जुताई के बाद उसी समय खेतों में 10 टन प्रति हेक्टेयर की दर से गोबर की खाद या कम्पोस्ट को मिट्टी में अच्छी तरह मिला देना चाहिए।

डीन एग्रीकल्चर ने कहा कि अगस्त माह तक कुफरी कुबेर (ओएन – 2236), कुफ़री पुखराज या कुफरी अशोका किस्म तथा सितंबर मध्य तक कुफरी अशोका, कुफरी लालिमा, कुफरी चन्द्रमुखी, कुफरी बहार, कुफरी जवाहर या अल्टीमस किस्म का चयन किया जा सकता है। एक एकड़ में बोआई के लिए 12 क्विंटल बीज (20-30 ग्राम के आकार का अंकुरित कंद की आवश्यकता होती है। बरसात में आलू के कंद को काटकर नहीं लगाना चाहिए। 40 किलो ग्राम यूरिया, 70 किलो ग्राम डीएपी, 80 किलो ग्राम म्युरीएट ऑफ पोटाश एवं 10 किलो ग्राम गंधक का प्रयोग की जा सकती है।

बरसाती आलू 65-75 दिनों में तैयार हो जाती है। फसल तैयार होते ही किसानों को तुरंत कोड़ाई कर लेनी चाहिए तथा इसे 4-5 दिनों के अंदर ही बाजार में बेच देना चाहिए क्योंकि बरसाती आलू के संरक्षण की क्षमता कम होती है। आलू की खेती का मुनाफा पूरी तरह तत्कालीन बाजार मूल्य पर निर्भर होता है। हालांकि फसल बाजार में नए आलू के रूप में मिलती है जिसका बाजार मूल्य भी बढ़िया मिलता है।

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