बाल विवाह रुकवा कर मशहूर हुई गिरिडीह की चंपा, सौ से अधिक बाल मजदूरों को शिक्षा से जोड़ा

Jharkhand News Giridih News गिरिडीह के गावां प्रखंड की चंपा कभी बाल मजदूर थी। इसने आधा दर्जन बाल विवाह भी रुकवाए। 11वीं की इस छात्रा को ब्रिटेन का प्रतिष्ठित डायना अवार्ड मिला है। कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रेन फाउंडेशन की बाल महापंचायत की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष है।

Sujeet Kumar SumanWed, 13 Oct 2021 04:24 PM (IST)
Jharkhand News, Giridih News गिरिडीह के गावां प्रखंड की चंपा कभी बाल मजदूर थी।

गावां (गिरिडीह), [संदीप बरनवाल]। गिरिडीह के गावां प्रखंड के जमडार गांव की रहने वाली 16 साल की चंपा कुमारी। बाल अधिकारों की रक्षा के लिए ऐसी आवाज बुलंद की कि दुनिया में छा गई। गरीब परिवार की बेटी पांच वर्ष पहले बंद माइका (अभ्रक) खदान से माइका के टुकड़े चुनती थी, ताकि परिवार को सहारा दे सके। तभी कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रेन फाउंडेशन के सदस्यों ने उसे तालीम का महत्व समझाया। फिर क्या था, उसकी जिंदगी बदल गई। उसने पढ़ाई शुरू की। अपने जैसे बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए बढ़ चली।

माइका चुनने वाले सौ से अधिक बाल मजदूरों को पढ़ाई के लिए प्रेरित कर स्कूल में प्रवेश कराया। आधा दर्जन बाल विवाह रुकवाए। ब्रिटेन तक उसकी शोहरत पहुंची, उसे प्रतिष्ठित डायना अवार्ड से साल 2019 में पुरस्कृत किया गया। उसी वर्ष राज्य सरकार ने उसे चेंज मेकर अवार्ड दिया। बाल विवाह का विरोध और बच्चों को पढ़ने के लिए प्रेरित कर रही इस लड़की की प्रतिभा को कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रेन फाउंडेशन ने पहचाना। उसे अपनी बाल महापंचायत का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना दिया है।

बच्चों को पढ़ाओ, मजदूरी नहीं कराओ

चंपा ने राजस्थान, दिल्ली, रांची समेत कई शहरों में बच्चों की शिक्षा के लिए लोगों को जागरूक किया। शिक्षा का महत्व अभिभावकों को बताया। कहा कि खुद बाल मजदूरी कर रही थी। अब शिक्षा से बेहतर भविष्य की नींव तैयार कर रही है। उसका कहना है कि आप बच्चों से काम न कराएं, तालीम से उनका जीवन रोशन करें। उनका कम उम्र में ब्याह न करें।

यूं बदल गया चंपा का जीवन

2016 में एक दिन चंपा माता-पिता के साथ बंद माइका खदान में गई थी।  गांव में कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रेन फाउंडेशन ने स्कूल चलें अभियान के तहत रैली निकाली। चंपा ने रैली देखी तो पढऩे की ललक जागी। दौड़कर रैली में जा रहे कार्यकर्ता पुरुषोत्तम पांडेय से पढऩे की इच्छा जताई। उन्होंने उसके घर जा मां बसंती देवी व पिता महेंद्र ठाकुर को पढ़ाई की महत्ता बताई।

चंपा ने कहा, पढ़ेगी जरूर। अंत में उसके माता पिता तैयार हो गए। उसका प्रवेश कक्षा छह में जमडार हाई स्कूल में हुआ। इसी साल मैट्रिक की परीक्षा पास कर 11 वीं में गिरिडीह के आरके महिला कालेज में प्रवेश लिया है। वह कहती है कि बच्चों का बचपन मजदूरी की लपटों में न झुलसे, इसलिए उनके अधिकारों की रक्षा को लड़ रही है।

सूचना मिलते ही होती सक्रिय

बकौल चंपा बच्चों से ही बाल मजदूरी और बाल विवाह की जानकारी मिलती है। पहले खुद बच्चों के अभिभावकों के पास जाकर समझाते हैं। नहीं मानते तो फाउंडेशन के सदस्यों को ले जाते हैं। किसी ने हीला हवाली की तो पुलिस व चाइल्ड लाइन का सहारा लेते हैं।

चंपा ने बदल दिया हमारा जीवन

जमुआ की सुलेखा कहती हैं कि स्वजनों ने उसकी 17 साल की उम्र में शादी तय की। चंपा को यह बात पता चली। वह घर आई। सबको समझाया। अंत में घरवालों ने शादी रोक दी। 18 साल की उम्र होने के बाद मेरी शादी की गई। भतगढ़वा के दीपक कुमार ने बताया कि पांच साल पहले चंपा स्कूल जाने लगी थी। हमें भी स्कूल जाने को कहती। घर वालों से उसने बात की, हमारा प्रवेश स्कूल में कराया। हम अब 11 वीं में पढ़ते हैं, ढिबरा नहीं चुनते।

डाउनलोड करें हमारी नई एप और पायें अपने शहर से जुड़ी हर जरुरी खबर!

रोमांचक गेम्स खेलें और जीतें
एक लाख रुपए तक कैश अभी खेलें

This website uses cookie or similar technologies, to enhance your browsing experience and provide personalised recommendations. By continuing to use our website, you agree to our Privacy Policy and Cookie Policy.
You have used all of your free pageviews.
Please subscribe to access more content.
Dismiss
Please register to access this content.
To continue viewing the content you love, please sign in or create a new account
Dismiss
You must subscribe to access this content.
To continue viewing the content you love, please choose one of our subscriptions today.