आक्रामक चुनाव प्रचार के कारण भाजपा को शिकस्त देने में कामयाब रहे हेमंत सोरेन

हेमंत सोरेन की रणनीति से पस्त भाजपा। फाइल

मधुपुर उप चुनाव की हार-जीत में कई निहितार्थ छिपे हैं। सत्ताधारी महागठबंधन भलीभांति समझ चुका है कि अगर भाजपा को रोकना है तो पूरी ताकत से उन्हीं की भाषा में आक्रामक प्रचार अभियान के साथ चुनाव मैदान में उतरना होगा।

Sanjay PokhriyalFri, 07 May 2021 01:22 PM (IST)

रांची, प्रदीप शुक्ला। मधुपुर उप चुनाव की जीत जहां राज्य की महागठबंधन सरकार का हौसला बढ़ाने वाली है, वहीं भाजपा के रणनीतिकारों के लिए चिंता का सबब। बेशक इस सीट पर हार-जीत से राज्य की हेमंत सरकार की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ने वाला था, लेकिन नतीजे उलट होते तो विधायक बने बिना ही हफीजुल हसन को मंत्री बनाने के हेमंत सोरेन के फैसले पर चर्चा जरूर होती।

शायद यही कारण था कि मुख्यमंत्री ने इस चुनाव को खुद अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ रखा था। वह पूरे लाव-लश्कर के साथ छह दिन तक मधुपुर में डेरा डाले रहे। उनके माइक्रो स्तर पर प्रबंधन का ही नतीजा रहा कि भाजपा आजसू गठबंधन तमाम प्रयास के बाद भी यहां कोई उलटफेर नहीं कर सका। इससे पहले दुमका और बेरमो उपचुनाव में भी भाजपा पराजित हो चुकी है। इससे भारतीय जनता पार्टी के अंदरखाने ही अब यह सवाल उठने लगे हैं कि कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ है। इसके परिणाम देर-सवेर संगठन स्तर पर कुछ बदलाव के रूप में दिख सकते हैं।

मधुपुर विधानसभा उपचुनाव का परिणाम झामुमो प्रत्याशी और राज्य के अल्पसंख्क कल्याण मंत्री हफीजुल हसन अंसारी के पक्ष में गया है।

मधुपुर उप चुनाव की हार-जीत में कई निहितार्थ छिपे हैं। सत्ताधारी महागठबंधन भलीभांति समझ चुका है कि अगर भाजपा को रोकना है तो पूरी ताकत से उन्हीं की भाषा में आक्रामक प्रचार अभियान के साथ चुनाव मैदान में उतरना होगा। महागठबंधन को इसका भलीभांति अंदाजा था कि अगर इस सीट पर हार का मुंह देखना पड़ा तो राज्य में जल्द ही सत्ता परिवर्तन होने का खम ठोकने वाली भाजपा और आक्रामक रुख अख्तियार कर लेगी। बिहार चुनाव के साथ दो सीटों पर हुए उपचुनाव के वक्त ही भाजपा प्रदेश अध्यक्ष दीपक प्रकाश ने एलान कर दिया था अगर जनता ने दोनों सीटें भाजपा की झोली में डाल दीं तो तीन महीने के अंदर राज्य में हेमंत सोरेन की सरकार गिरा देंगे। खैर, जनता ने न उन्हें तब तवज्जो दी न अब। महागठबंधन और खासकर हेमंत सोरेन एक बात तो अच्छी तरह से समझ रहे हैं कि यदि भाजपा कोई भी सीट जीत जाती है तो सरकार को नाकाम बताने की उनकी प्रोपेगेंडा मशीन को और खुराक मिल जाएगी।

शुरुआत में थोड़ी उठापटक के बाद अब हेमंत महागठबंधन के मजबूत नेता के रूप में स्थापित हो गए हैं। राज्य दर राज्य चुनाव में कांग्रेस की दयनीय होती स्थिति का फायदा भी उन्हें हो रहा है। चुनावों में वह सहयोगी दलों का बखूबी साथ ले रहे हैं। मधुपुर उपचुनाव में सभी कांग्रेसी मंत्रियों के साथ-साथ विधायकों की ड्यूटी लगाई गई थी। झामुमो के साथ-साथ कांग्रेस के विधायक ब्लॉक-गांव स्तर तक सक्रिय थे। दूसरी तरफ भाजपा और उसकी सहयोगी आजसू में वह मेलभाव नदारद था।

गत विधानसभा चुनाव में भाजपा की करारी हार के बाद पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी की पार्टी में वापसी हो गई थी। उनकी पार्टी झारखंड विकास मोर्चा (जेवीएम) का भी भारतीय जनता पार्टी में विलय हो गया। तब भाजपा की हार के बड़े कारणों में पूर्व रघुवर सरकार से आदिवासियों का नाराज होना सामने आया था। माना जा रहा था कि बाबूलाल मरांडी के भाजपा में आने के बाद आदिवासियों में राज्य भाजपा के प्रति बनी कड़वी सोच में कुछ बदलाव आएगा, लेकिन अभी तक तीन सीटों पर हुए उपचुनाव में ऐसा होता प्रतीत नहीं हो रहा है।

यह स्थिति तब है जब महागठबंधन सरकार कोविड महामारी के कारण र्आिथक मोर्चे सहित तमाम अन्य संकटों के चलते धरातल पर उतना काम नहीं कर सकी है, जितनी आमजन को उनसे अपेक्षा रही होगी। सरकार के कई मंत्री यह स्वीकार भी कर चुके हैं। ऐसे में अब भारतीय जनता पार्टी के अंदरखाने ही यह चर्चा तेज हो गई है कि लगातार हार के पीछे कहीं कारगर रणनीति का अभाव तो नहीं है? आखिर क्या कारण है कि महागठबंधन लगातार मजबूत होता जा रहा है? बाबूलाल मरांडी और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष दीपक प्रकाश की जोड़ी क्या कोई असर नहीं डाल पा रही है? ऐसे तमाम सवाल हैं जिन पर भाजपा में निश्चित ही मंथन हो रहा होगा।

आंशिक लॉकडाउन और बढ़ा : राज्य में कोरोना संक्रमण की चेन तोड़ने के लिए आंशिक लॉकडाउन को एक सप्ताह और बढ़ा दिया गया है। स्वास्थ्य सुरक्षा सप्ताह के नाम पर इस आंशिक लॉकडाउन के कुछ अच्छे परिणाम दिखने शुरू हो चुके हैं। पिछले तीन दिनों में संक्रमण की दर में कुछ कमी आई है। पिछले सप्ताह जहां हर 100 जांच में 19 संक्रमित निकल रहे थे वह घटकर 16 पर पहुंच गया है। इस दौरान सरकार ने आक्सीजन सहित अन्य तमाम संसाधन जुटाने में खुद को झोंक रखा है। इससे अस्पतालों में अफरातफरी कुछ कम हुई है। राज्य के लिए बड़ी चिंता गांवों में बढ़ रहा संक्रमण है। बड़ी संख्या में मजदूर बिना जांच के गांवों में पहुंच चुके हैं। ऐसे में सरकार ने तय किया है कि कोई भी प्रवासी मजदूर अब सात दिन क्वारंटाइन में रहने के बाद ही घर जा सकेगा। उम्मीद की जा सकती है कि इससे गांवों में बढ़ते संक्रमण पर कुछ अंकुश लगेगा।

[स्थानीय संपादक, झारखंड]

डाउनलोड करें हमारी नई एप और पायें अपने शहर से जुड़ी हर जरुरी खबर!

रोमांचक गेम्स खेलें और जीतें
एक लाख रुपए तक कैश अभी खेलें

This website uses cookie or similar technologies, to enhance your browsing experience and provide personalised recommendations. By continuing to use our website, you agree to our Privacy Policy and Cookie Policy.