32 गांवों की जमींदारी छोड़ पाकिस्तान से आ गए भारत

बाटम विश्व शरणार्थी दिवस पर विशेष सोहन परिवार ने मेहनत व संघर्ष के बूते समाज में बनाई अलग

JagranSat, 19 Jun 2021 06:21 PM (IST)
32 गांवों की जमींदारी छोड़ पाकिस्तान से आ गए भारत

बाटम

विश्व शरणार्थी दिवस पर विशेष

सोहन परिवार ने मेहनत व संघर्ष के बूते समाज में बनाई अलग पहचान

केतन आनंद, मेदिनीनगर (पलामू) : भारत के विभाजन से करोड़ो लोग प्रभावित हुए थे। नए देश पाकिस्तान के बनने के बाद से दोनों ओर हुई हिसा में हजारों लोगों की की जान गई थी। इनमें से कई अपने स्वजनों से बिछड़ गए थे। अचानक भड़की हिसा से किसी को भी कुछ समझ नहीं आया, लोग किसी तरह अपनी जान बचाकर एक सुरक्षित ठिकाने पर पहुंच जाना चाहते थे। इनमें पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के गुजरांवाला जिले के मज्जु चक के 32 गांवों के जमींदार सरदार दल सिंह के सरदार हरनाम सिंह भी एक थे। वे उस समय रंगून (बर्मा) में पढ़ाई कर रहे थे। 19 वर्ष की आयु में ही इनकी शादी बीबी रामभेजा कौर उर्फ उपेंद्र कौर से हो गई थी। इस बीच 14 अगस्त 1947 के सुबह इन्हे गांव छोड़ने का फरमान मिला। अपने पास उपलब्ध नकदी लेकर वे अपनी पत्नी पांच पुत्र व दो पुत्रियों के साथ वे अफरा तफरी के माहौल में पैदल ही अमृतसर के लिए निकल पड़े। रास्ते में पत्नी व दो पुत्र इनसे बिछड़ गए। हालांकि दो माह बाद अमृतसर के शरणार्थी शिविर में बिछड़े परिवार को मिलन हो गया। अब इनके समक्ष रोटी की व्यवस्था एक चुनौती बन रही थी। इस बीच अमृतसर से करीब 1500 किलोमीटर दूर एकीकृत बिहार के बरवाडीह से चिरमिरी रेल लाइन का निर्माण हो रहा था। यहां इनके एक रिश्तेदार सरदार सुरजीत सिंह चिमनी काम करवा रहे थे। शरणार्थी शिविर में ही सुरजीत सिंह ने हरनाम सिंह को बरवाडीह में आने का निमंत्रण दिया। वर्ष 1948 के शुरूआत में बरवाडीह जाने के क्रम में किसी तरह हरनाम अपने पूरे परिवार के साथ डालटनगंज रेलवे स्टेशन पहुंच गए। कड़ाके की ठंढ में बच्चों को अपने आंचल में समेटे किसी फरिश्ते का इंतजार कर रही थी। इस बीच बेलवाटिका चौक के निवासी नैन सिंह की नजर इस परिवार पर पड़ी। उन्होंने मानवता के नाते हुए पूरे परिवार को अपने घर के एक कमरे में शरण दी। साथ ही उनके लिए रोजगार की व्यवस्था करने का भी भरोसा दिलाया। सरदार हरनाम सिंह के पौत्र इंद्रजीत सिंह बताते है कि दादा जी उस समय एक आटा चक्की में मजदूर का काम करते थे। घर तक पहुंचाने के एवज में कोई उन्हे आटा तो कोई पैसा ही दे देता था। इसी से पूरे परिवार का भरण पोषण चल रहा था। इस बीच वे किसी तरह बरवाडीह पहुंच कर रेलवे लाईन के महाराजा रणजीत सिंह के निकट संबधी रहे कांट्रेक्टर सुरजीत सिंह चिमनी से मिलकर वहीं मिट्टी का काम करने लगे। यहीं से एक पुराना ट्रक खरीद कर उन्होंने अपना कारोबार आरंभ कर दिया। अपने लगन, मेहनत व संघर्ष के बूते धीरे-धीरे अपने बच्चों को पढ़ाई शुरू करवा दी। वर्तमान में सोईन परिवार झारखंड, बंगाल, हरियाणा व पंजाब के कई जिलों में अपनी अलग पहचान बना चुका है। बाक्स:लार्ड माउंटबेटन की पुत्री के मित्र थे सरदार हरनाम मेदिनीनगर: रंगून में अपनी पढाई के दौरान सरदार हरनाम सिंह की दोस्ती भारत के अंतिम वायसराय रहे लार्ड माउंटबेटन की पुत्री एनी माउंटबेटन से हो गई थी। इनके स्वजन बताते है कि एनी माउंटबेटन के प्रयास से ही सोइन परिवार को हरियाणा के कुरूक्षेत्र में खेती के लिए कुछ जमीन मिली थी। बाद में यही जमीन पूरे परिवार के रोजगार का सहारा बना था। बाक्स: कजरी के नैन सिंह व किशुनपुर के झा परिवार का ऋणी है सोइन परिवार मेदिनीनगर : पांकिस्तान से पलालय के बाद पलामू पहुंचे सोइन परिवार जिले के पाटन प्रखंड के कजरी निवासी व पूर्व समाजवादी नेता स्व. श्रीपति सिंह के पिता नैन सिंह व किशुनपुर के झा परिवार का एहसानमंद मानता है। इंद्रजीत बताते है कि स्व. नैन सिंह ने पूरे विस्थापित परिवार को सहारा दिया था। वहीं झा परिवार ने रेड़मा में छत के लिए जमीन उपलब्ध कराई थी।

सरदार हरनाम सिंह अपनी पत्नी बीबी उपेंद्र कौर, पुत्री करतार कौर व देवेंद्र कौर, पुत्र सरदार जोगेंद्र पाल सिंह, सरदार जगजीत सिंह, सरदार संतवीर सिंह, सरदार कुलदीप सिंह व सरदार कुलवंत सिंह के साथ पलामू को मिट्टी में रच बच गए।

बाक्स: पाकिस्तान से भाग कर 300 परिवार पहुंचे थे पलामू मेदिनीनगर: देश के बंटवारे के समय पाकिस्तान से जान बचाकर करीब तीन सिख सौ परिवार पलामू में आकर बस गए थे। यहां जंगलों व अन्य कारोबार में जुट गए थे। हालाकि वर्ष 1984 के दंगे के बाद कई परिवार देश के दूसरे क्षेत्र में बस गए है। लेकिन अभी यहां रह गए सिख परिवार जिले के तरक्की में अपना योगदान दे रहे है। जानकारी के अनुसार देश की आजादी से पहले पलामू जिला मुख्यालय में सरदार भगवान सिंह, शरण सिंह, सरदार भगत सिंह, सरदार कुलवंत सिंह व अहलूवालिया परिवार यहां रहते थे। इनमें कुलवंत सिंह कई वर्षों तक छतरपुर प्रखंड में मुखिया भी रहे थे। वहीं वालिया परिवार चैनपुर के पथरा में बस गया था।

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