शरणार्थी दिवस ::: आए थे शरणार्थी बनकर, आज दे रहे सैकड़ों को रोजगार

लीड मेहनत व संघर्ष के बूते इस रिफ्यूजी परिवार ने हासिल किया मुकाम लेकिन आज भी है जेहन

JagranSat, 19 Jun 2021 08:02 PM (IST)
शरणार्थी दिवस ::: आए थे शरणार्थी बनकर, आज दे रहे सैकड़ों को रोजगार

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मेहनत व संघर्ष के बूते इस रिफ्यूजी परिवार ने हासिल किया मुकाम, लेकिन आज भी है जेहन में गांव व घर खोने की टीस

फोटो::: 15 में है।

जागरण संवाददाता, कोडरमा : लंबे संघर्ष एवं हजारों कुर्बानी के बाद भारत को आजादी मिली। लेकिन इसकी खुशी विभाजन के जिस काले अध्याय के साथ मिली, उसकी टीस आज भी लाखों परिवारों के जेहन में है। लाखों लोगों ने उस दौर में कत्लेआम से बचकर किसी तरह सुरक्षित स्थान पर शरण ली थी। ऐसे शरणार्थी परिवार के वंशज कोडरमा जिले में सैकड़ों की तादाद में हैं। हालांकि वक्त के साथ अधिकतर परिवार के लोग मेहनत-मजदूरी व अच्छी शिक्षा की बदौलत नई मुकाम हासिल करते गए। लेकिन जब कभी परिवार के बड़े-बुजुर्गों के बीच विभाजन के उस दौर की चर्चा होती है, लोगों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। धार्मिक उन्माद में लोग एक-दूसरे के खून के प्यासे हो गए थे। कोडरमा के चाराडीह स्थित रिफ्यूजी कैंप में रहनेवाला ऐसा ही एक परिवार है दुलाल दास का। कारोबारी दुलाल व इनके अनुज राजू दास बताते हैं, विभाजन के बाद मेरे दादाजी सुरेंद्र किशोर दास, मेरे पिता पवित्र किशोर दास समेत अपने सात बेटों व तीन बेटियों को लेकर पूर्वी पाकिस्तान के मोइनसिंह जिला से त्रिपुरा, फिर कोलकाता होते हुए 1952 में पहले चंदवारा रिफ्यूजी कैंप आए थे। यहां से उन्हें चाराडीह रिफ्यूजी कैंप भेजा गया। यहां टिन के शेड में किसी तरह पूरे परिवार को सिर छिपाने की जगह मिली। लेकिन जीविकोपार्जन की चुनौती मुंह बाए खड़ी थी। कोई सरकारी सहायता नहीं। दादाजी ने बैंक से कर्ज लेकर सरसों तेल का कारोबार शुरू किया। फिर धीरे-धीरे पिताजी के अन्य चार भाई अलग-अलग शहरों में नौकरी- रोजगार के सिलसिले में जाकर बस गए। बाद में इनके पिता पवित्र किशोर दास ने दुलाल मसाला उद्योग के नाम से कारोबार शुरू किया। काफी दिनों तक यह चलता रहा। फिर दुलाल दास एवं राजू दास ने भी मसाला उद्योग के कारोबार को कुछ दिनों तक चलाया। इसके बाद लोग अपना कारोबार बढ़ाते हुए माइनिग, स्टोन क्रशर और एक्सप्लोसिव के धंधे से जुड़े। इस कारोबार में सफलता मिलती गई और आज चार पत्थर खदानों के मालिक हैं।

दास परिवार ने कारोबार कोडरमा के अलावा रांची, पाकुड़ में भी फैलाया। एक्सप्लोसिव के मामले में भी झारखंड के सबसे बड़े डीलर में इनका फर्म शुमार है।

दुलाल बताते हैं, विभाजन के बाद पूर्वी पाकिस्तान में धार्मिक अत्याचार और धर्म परिवर्तन के दबाव से त्रस्त होकर उनके पूर्वज वहां से निर्वासित होकर भारत आए। अपने धर्म की रक्षा के लिए पूर्वजों ने गांव में खेत, बारी, मकान, कारोबार सब कुछ छोड़ने का रास्ता चुना। गांव-घर छूटने का दर्द दादाजी व पिताजी के जेहन में ताउम्र रहा। आज तीसरी पीढ़ी के दुलाल व उनके भाई व्यापार व कारोबार अपने दिवंगत पिता के नाम पर पवित्रा स्टोन, पवित्रा एक्स्पलोसिव, पवित्रा ग्रीन हाउस का सफलतापूर्वक संचालित कर रहे हैं। इनकी कंपनी में करीब 150 से 200 लोग कार्यरत हैं। दुलाल कहते हैं, 1971 में जब भाषाई संघर्ष में पूर्वी पाकिस्तान का वह हिस्सा पाकिस्तान से अलग हो बांग्लादेश बना तो पूर्वजों को कुछ शांति मिली, लेकिन वहां जाने का फिर कभी मौका नहीं मिला।

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