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केयू हिन्दी विभाग में दो दिवसीय राष्ट्रीय वेबिनार शुरू, देश भर से 545 प्रतिभागियों ने कराया पंजीयन Jamshedpur News

जमशेदपुर (जेएनएन)। कोल्हान विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में 'सदी का संकट और हिन्दी' विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय वेबिनार की शुरुआत सोमवार (25 मई) को सुबह 11 बजे से हुई। गूगल मीट एप्लीकेशन के माध्यम से देशभर के करीब 545 प्रतिभागी सीधे तौर पर और लाईव स्ट्रीमिंग के माध्यम से शामिल हुए। वेबिनार की मुख्य संरक्षक और केयू की कुलपति डॉ शुक्ला मोहांति ने उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता की। 

कोरोना एक बड़ा संकट लेकिन हर संकट कुछ सिखाता है : शुक्‍ला मोहांति

कोल्‍हान विवि की कुलपति डॉ शुक्‍ला मोहांति ने कहा कि कोरोना विषाणु एक बड़ा संकट है लेकिन हर संकट कुछ नया सिखा जाता है। हमारी कोशिश है कि हमारे विद्यार्थियों और शिक्षकों को अपने ज्ञान, शिक्षण के तरीके और सीखने की प्रक्रिया को लगातार तराशने का मौका मिले। इसलिए इस तरह के वेबिनार महत्वपूर्ण हो जाते हैं। सोशल डिस्टेंसिंग का मतलब अनसोशल होना नहीं है। कई बार हम समाज के बीच रहकर भी अकेले होते हैं और कभी अकेले रहते हुए भी समाज के साथ खड़े होते हैं। हमें धैर्य रखने की जरूरत है। क्षण भर का संकट समय-समाज की स्थायी संवेदनाओं को नहीं मिटा सकता। हम दूर रहकर भी अधिक करीब हो रहे हैं। सड़कों पर विनाश के साथ ही सृजन और निर्माण भी दिख रहा है। यही जीवन है और साहित्य हमेशा जीवन को बड़ा मानता और बनाता आया  है। इसलिए इस वेबिनार में होने वाले विमर्श हमें और मजबूत व्यक्ति बनाने में मानसिक संबल देंगे।

साहित्य संबद्ध भी है और स्वायत्त भी : प्रोफेसर राजकुमार

पहले व्याख्यान सत्र में स्रोतविद् बीएचयू के हिन्दी विभाग के आचार्य डॉ राजकुमार ने संकट की इस सदी में विचारधारा और आलोचना के स्वरूप और चरित्र पर बात की। उन्होंने कहा कि दूसरे ज्ञानानुशासनों के बनिस्पत साहित्य इन अर्थों में अलग है कि वह किसी भी संकट को भोथरे और तात्कालिक संदर्भों में ही नहीं देखता। वह भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं है बल्कि जटिल संवेदन प्रक्रिया है। वह राजनीति, अर्थशास्त्र जैसे अनुशासनों का न तो पिछलग्गू है न ही आत्ममुग्ध नेता। बल्कि वह इन सबसे संबद्ध होते हुए एक स्वायत्त संरचना है। ज्ञान के क्षेत्र में कोई प्रोटोकॉल नहीं चलता। जब भी मनुष्यता खतरे में पड़ी है, साहित्य ने उसके लिए महान मानवीय सृजन किये हैं। इसलिए सदी के इस संकट के भीतरी स्तरों की पहचान साहित्य भविष्य में जरूर करेगा।

यह कोरोना नहीं, करुणा काल : डॉ कुमार वीरेन्द्र

दूसरे व्याख्यान सत्र में स्रोतविद् इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के उपाचार्य डॉ कुमार वीरेन्द्र ने कहा कि हमें समय को देखने का दृष्टिकोण बदलना चाहिए। कोरोना की भयलीला में मानवीय करुणा ज्यादा फलित हुई है। सड़कों पर चलने वालों को खाना या सहारा देने वाले लोग जाति धर्म पूछकर मदद नहीं कर रहे। वे उन्हें अपनी ही तरह का हाड़ मांस का इंसान मानकर उनकी पीड़ा हरने की सामर्थ्य भर कोशिश कर रहे हैं। हमारा ढेर सारा हिन्दी लेखन महामारी, अकाल, सूखा, बाढ़, युद्ध जैसी विकराल विपदाओं के समानांतर सृजन और उम्मीद की महान मानवीय घटनाओं का मार्मिक दस्तावेज है।

उन्होंने अल्बेयर कामू के उपन्यास 'प्लेग' के माध्यम से संकेत किया कि कभी-कभी रूप बदलते विषाणुओं की दंतकथाओं के बहाने बहुरूपिया फासिज़्म भी अपनी चाल चलता है। साहित्य निश्चय ही आने वाले दिनों में इसकी सही समझ सामने लाएगा। उन्होंने ऋणजल धनजल, वारेन हेस्टिंग्स का साँड़, सदी का सबसे बड़ा आदमी, बंशीधर की उत्तरकथा, परदा, फूलों का कुर्ता जैसी रचनाओं के माध्यम से संकटकाल में मानवीय करूणा के विराट उदाहरणों की चर्चा की।

डॉ श्रीनिवास सुमन ने किया अतिथियों का स्‍वागत

वेबिनार में स्वागत भाषण संयोजक डॉ श्रीनिवास कुमार, सत्रों का संयोजन व संचालन आयोजन सचिव डॉ अविनाश कुमार सिंह व तकनीकी सहयोग कन्हैया सिंह ने किया। प्रतिभागी शिक्षक, शोधार्थी और स्नाकोत्तर के विद्यार्थीगण वक्ताओं से सक्रिय संवाद कर रहे हैं। कल वेबिनार के दूसरे और अंतिम दिन दिल्ली विश्वविद्यालय की डॉ सपना चमड़िया और बीएचयू से डॉ प्रभाकर सिंह रूबरू होंगे। संयोजक ने बताया कि विश्वविद्यालय से अनुमति लेकर प्रतिभागियों के शोधपत्र आमंत्रित किये जाएंगे और उन्हें ई पुस्तक के रूप में प्रकाशित कराने का प्रयास किया जाएगा।

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