महात्‍मा गांधी को अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ संघर्ष के दौरान आरडी टाटा ने की थी मदद, जानिए पूरी कहानी

महात्‍मा गांधी और जेआरडी टाटा की फाइल फोटो।

Mahatma Gandhi relation With Tata. आपको शायद पता हो क‍ि जब महात्‍मा गांधी दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ संघर्ष कर रहे थे तब आरटी टाटा ने उन्‍हें आंदोलन जारी रखने के लिए आर्थ‍िक मदद की थी। यह बात जमशेदपुर में गांधी जी ने खुद कही थी।

Publish Date:Tue, 26 Jan 2021 03:18 PM (IST) Author: Rakesh Ranjan

जमशेदपुर, वीरेंद्र ओझा। महात्मा गांधी जब दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ संघर्ष कर रहे थे, उसी दौरान वे एक भारतीय होने की पहचान भी अंग्रेजों को करा रहे थे। दक्षिण अफ्रीका में उनके बढ़ते प्रभाव को देखते हुए अंग्रेज उन्हें अपमानित करने का लगातार प्रयास कर रहे थे।

उन्हें वहां ट्रेन से धक्के देकर उतार दिया गया था, लेकिन गांधीजी इन सब बातों से हतोत्साहित नहीं हुए। संघर्ष करते रहे, लेकिन जब उन्हें वहां रहने और आंदोलन को जारी रखने के लिए पैसों की जरूरत हुई तो टाटा को याद किया। यह बात जब आरडी टाटा (रतनजी दादाभाई टाटा) को मालूम हुई, तो उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में गांधीजी को 24 हजार रुपये का चेक भेजा था।

1925 की सभा में किया जिक्र

इन बातों का उल्लेख गांधीजी ने तब किया, जब वे 1925 में जमशेदपुर आए थे। बिष्टुपुर के यूनाइटेड क्लब में जनसभा के दौरान गांधीजी ने कहा था 'दक्षिण अफ्रीका में जब मैं वहां के भारतीयों के साथ मिलकर अपने आत्मसम्मान और अपनी प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहा था, तब हमें मदद देने के लिए आगे आने वाले सबसे पहले व्यक्ति स्व. आरडी टाटा ही थे। उन्होंने मुझे एक हौसला बढ़ाने वाला पत्र लिखा और उसके साथ 24 हजार रुपये का चेक भी भेजा। पत्र में वादा किया था कि यदि जरूरी हो तो वे और भी रुपये भेजेंगे। तब से मेरे पास टाटा घराने के साथ रिश्तों की जीवंत यादें हैं। आप कल्पना कर सकते हैं कि आपका साथ मेरे लिए कितना सुखद है।

पूंजीपतियों ने ही माना अपना दोस्‍त

'इससे पूर्व अपने भाषण में महात्मा गांधी ने कहा था 'विश्वास कीजिए, मेरे 35 वर्षो की सार्वजनिक सेवा के दौरान अपने को प्रकटतया पूंजी के खिलाफ रखने के लिए बाध्य रहा हूं। फिर भी पूंजीपतियों ने मुझे अपना दोस्त ही माना है। पूरी विनम्रता के साथ मैं कहना चाहूंगा कि यहां पूंजीपतियों के एक मित्र अर्थात टाटा के एक मित्र के रूप में भी आया हूं। ' गांधीजी ने यह भी कहा था 'मुझे बहुत खुशी है कि मैं इस महान इस्पात कारखाने को देख पाया हूं। वर्ष 1917 में जब मैं चम्पारण के किसानों की सेवा करने की कोशिश कर रहा था, तभी से यहां आने की सोचता रहा हूं। उसी समय सर एडवर्ड ग्रेट ने मुझसे कहा था कि इस कारखाने को देखे बिना मुझे बिहार से नहीं जाना चाहिए, लेकिन भगवान जो चाहता है वही होता है और हुआ भी वही।'

1917 में भी थोड़ी दुर रुके थे जमशेदपुर में

गांधीजी हालांकि 1917 में वर्धा से चम्पारण जाने के क्रम में थोड़ी देर के लिए जमशेदपुर रुके थे, पर कंपनी भ्रमण करने का मौका नहीं निकाल पाए। गांधीजी जमशेदपुर शहर में दूसरी बार वर्ष 1934 में पं. जवाहरलाल नेहरू के साथ आए थे। उस वक्त वे सोनारी और साकची के आसपास की बस्तियों में गए थे, जहां हरिजन कोष के लिए चंदा भी मांगा था। 1925 की शहर यात्रा में उनके साथ डॉ. राजेंद्र प्रसाद व सीमांत गांधी भी थे। गांधीजी ने टाटा स्टील की पहली यात्रा के बाद वर्ष 1925 में ही वर्धा आश्रम से आरडी टाटा को पत्र लिखा। इसमें उन्होंने टाटा से दस हजार पीतल की तकली मांगी थी। टाटा ने एक माह में इन तकलियों को वर्धा भेज दिया था। गांधी ने पत्र में लिखा था कि मुझे पता है आप पीतल के सामान नहीं बनाते हैं, इसके बावजूद मुझे भरोसा है कि आप इसे उपलब्ध करा देंगे। टाटा ने ऐसा किया भी।

 

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