Tourist Place of Jamshedpur : टाटा के इस शहर का धरोहर देख आप भी कह उठेंगे, वाह रतन सर वाह...

Tata Group रतन टाटा के इस शहर का ऐतिहासिक धरोहर पर्यटकों को खूब आकर्षित कर रहा है। लगभग 125 साल पुराने यह शहर अपने आप में कई इतिहास समेटे है। तस्वीरों में आप भी देख अचंभित रह जाएंगे...

Jitendra SinghTue, 30 Nov 2021 06:15 AM (IST)
Tata Group : टाटा के इस शहर का धरोहर देख आप भी कह उठेंगे, वाह रतन सर वाह...

जमशेदपुर : अगर आपके घर में कोई मेहमान आता है तो आप क्या करते हैं? ज्यादा से ज्यादा जुबिली पार्क, दोराबजी पार्क, डिमना लेक घुमाते हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि आपके शहर में कई ऐसी धरोहर है, जो आपका सीना गर्व से ऊंचा कर देगा। मेहमान भी कहेंगे वाह जमशेदपुर वाह...

1. अनोखी प्रेम कथा का प्रतीक है सर दोराबजी पार्क

बिष्टुपुर स्थित कीनन स्टेडियम के सामने इस पार्क में जेएन टाटा के बेटे सर दोराबजी टाटा और उनकी पत्नी मेहरबाई टाटा की प्रतिमा है। 2.5 एकड़ में फैले इस पार्क में विशाल डायमंड स्ट्रक्चर भी है। यह स्ट्रक्चर इस बात का प्रतीक है कि मेहर बाई टाटा के पास एक डायमंड था। पहले विश्व युद्ध के बाद जब देश में आर्थिक मंदी आई तो मेहरबाई टाटा ने अपने डायमंड को गिरवी रखा। जिसके बाद कंपनी का न सिर्फ विस्तार हुआ बल्कि कर्मचारियों को वेतन भी दिया गया।

2. प्रथम विश्वयुद्ध में शहीद हुए सैनिकों की याद में बना सेंट जार्ज चर्च

बिष्टुपुर बी रोड में है सेंट जार्ज चर्च। जिसकी आधारशिला 28 दिसंबर 1914 में और निर्माण कार्य 16 अप्रैल 1916 में हुआ था। इस चर्च को पहले विश्वयुद्ध में शहीद हुए सैनिकों की याद में बनाया गया था। यह चर्च जिस स्थान पर खड़ा है उसे सर दोराबजी टाटा ने एक एंग्लिकन कंग्रीगेशन को आवंटित किया था। शहर का यह एकमात्र प्रोटेस्टेंट चर्च हैं जहां आज भी अंग्रेजी में प्रार्थना होती है। इस चर्च को जैक आर्च स्ट्रक्चर रूप में तैयार किया गया है। इस चर्च की ढ़लाई लाइम स्टोन और ईट से की गई है। इसके कारण आज भी इस चर्च को मरम्मती की जरूरत नहीं पड़ी।

3. आर्मरी ग्राउंड में तैनात था स्वदेशी तोप

बिष्टुपुर में सेंट्रल वाटर वर्क्स के सामने स्थित है आर्मरी ग्राउंड। 15 सितंबर 1941 में जमशेदपुर के गोलमुरी लाइन में बिहार रेजिमेंट की पहली बटालियन का गठन हुआ था। इस रेजिमेंट को विश्वयुद्ध के समय जमानी विमानों के संभावित हमले से टाटा स्टील प्लांट से बचाने और उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी दी गई थी।

तत्कालीन वायसराय लॉर्ड वेवेल के जमशेदपुर दौरे के समय स्वदेशी तोप को नार्दर्न टाउन स्थित के जिस मैदान में प्रदर्शित किया। उसे इसी कारण आर्मरी ग्राउंड के नाम से जाना जाता है। इस रेजिमेंट के कमांडर लेफ्टिनेंट कर्नड ट्वीड थे। इस मैदान में ही स्वदेशी तोप तैनात थे ताकि जापानी जहाज आने पर उसे मार गिराया जा सके। आज इस मैदान में कई तरह के खेलों का आयोजन होता है।

4. महात्मा गांधी व सुभाष चंद्र बोस ने यूनाइटेड क्लब में की थी बैठक

बिष्टुपुर में आर्मरी ग्राउंड के सामने स्थित है यूनाइटेड क्लब। जिसकी स्थापना वर्ष 1914 में की गई थी। कंपनी की स्थापना के समय यहां कई विदेशी नागरिक हुआ करते थे जिनके मनोरंजन के लिए इस क्लब की स्थापना की गई थी। इस क्लब का पहले टिस्को इंस्टीट्यूट नाम था जिसे वर्ष 1948 में बदलकर यूनाइटेड क्लब रखा गया।

इस क्लब में कर्मचारियों की सुविधा के लिए टेनिस कोर्ट, फुटबॉल व हॉकी के लिए बड़ा मैदान सहित बलियर्ड रूम, बॉलिंग व डांस के लिए अलग से हॉल की व्यवस्था है। क्लब की सदस्यता के लिए कर्मचारियों को 50 पैसे और अधिकारियों को दो रुपये मासिक शुल्क देना पड़ता था। महात्मा गांधी व नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने यहीं जमशेदपुर प्रवास के दौरान कर्मचारियों के साथ सामूहिक बैठक की थी।

डायरेक्टर्स बंग्लो में रुका करते थे दोराबजी टाटा

बिष्टुपुर में यूनाइटेड क्लब के सामने वर्ष 1918 में डायरेक्टर्स बनाया गया है। इस बंगले को इंडो-सैकरासेनिक स्टाइल यानि भारत व अरब की कला को मिलाकर इसके स्ट्रक्चर को तैयार किया गया है। इसके दरवाजे-खिड़कियों को काफी बड़े और नक्काशीदार है जिसे देखने से स्वत: अरब कला का प्रदर्शन हो जाएगा।

डायरेक्टर्स बंगलों में कुल आठ बड़े-बड़े कमरे, एक डाइनिंग हॉल, एक कार्ड रूम और बड़ा लाउंज भी है। यहीं पर कंपनी के डायरेक्टर्स शहर आने पर ठहरते थे। शुरूआती दिनों में सर दोराबजी टाटा यहीं आकर रूकते थे। देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू सहित कई बड़ी हस्तियां यहां आकर रूके हैं।

शहर का पहला प्राइवेट होटल बुलेवर्ड

बिष्टुपुर थाना के बगल में स्थित है होटल बुलेवर्ड। जिसका निर्माण वर्ष 1919 को गोवा से एक उद्यमी ठेकेदार बार्थोलोम्यू डी-कोस्टा ने की थी। वर्ष 1940 में 45 हजार रुपये की लागत से इस होटल को रेडीमेड नक्शे व स्थानीय ईट के भट्ठे से तैयार ईटों व भार थामने वाले दीवारों के तत्काल सेटअप का उपयोग कर छह माह में बनाया गया था। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान इस होटल में 28 अंग्रेज व अमेरिकन पायलट 18 माह तक रूके थे। इसके लिए अमेरिकन पायलट प्रतिदिन के हिसाब से सवा रुपये जबकि अंग्रेज पायलट 14 आना किराया देते थे।

पारसी युवाओं के लिए बना था भरूचा मेंशन

बिष्टुपुर थाना के ठीक सामने है भरूचा मेंशन। जिसे हम रीगल बिल्डिंग के नाम से भी जानते हैं। टाटा स्टील के पहले भारतीय चीफ कैशियर खुर्शीद मानेकजी भस्चा ने वर्ष 1935 में टाटा स्टील में काम करने आए बाहरी पारसी युवाओं को घर का अनुभव देने के लिए भरूचा मेंशन का निर्माण किया। यह बिल्डिंग अपनी अनूठी औपनिवेशक शैली के इतिहास को संजोए हुए है।

स्टेशन तक सुनाई देता था क्लॉक टॉवर की आवाज

गोलमुरी गोल्फ ग्राउंड मैदान में स्थित है क्लॉक टॉवर। चार घुमावदार घड़ियों के साथ 70 फीट ऊंचे इस क्लॉक टॉवर को एंग्लो स्विस वॉच कंपनी द्वारा तैयार किया गया था। चार मार्च 1939 को टिनप्लेट कंपनी ऑफ इंडिया के पहले महाप्रबंधक जॉन लेशोन के सेवाकाल के 16 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य पर इस क्लॉक टॉवर की स्थापना की गई थी।

कहा जाता है कि इसके घड़ी की बेल की आवाज स्टेशन व सोनारी तक सुनाई पड़ती थी। वर्ष 1994 में यह घड़ी खराब हो गई और दशक तक नहीं चली। तीन मार्च 2014 को स्थापना दिवस पर स्विस कंपनी के इंजीनियरों को बुलाकर इसकी मरम्मती कराई गई और यह क्लॉक टॉवर आज भी अपनी बेल को उसके समय की कीमत का एहसास करा रहा है।

दूसरे विश्वयुद्ध में हमले से बचने के लिए बना था आइएसडब्ल्यूपी बंकर

इंडियन स्टील एंड वायर प्रोडक्ट्स लिमिटेड (आइएसडब्ल्यूपी) की स्थापना सरदार बहादुर इंदर सिंह ने वर्ष 1920 में की थी। उस समय कंपनी 300 एकड़ में फैली हुई थी। इस कंपनी के ठीक सामने है एक विशाल बंकर। जिसे दूसरे विश्वयुद्ध के समय बनाया गया था। दूसरे विश्वयुद्ध के समय दुश्मन देशों के जहाज आने की सूचना पर पूरे शहर में सायरन बजता था।

ऐसे में कंपनी के चारो ओर टार जलाकर काला धुंआ उठाया जाता था। साथ ही बड़े-बड़े बैलून छोड़े जाते थे ताकि दुश्मन के जहाज उसमें फंस जाए। इस बंकर में 40 लोगों के लिए बैठने की व्यवस्था है। वहीं, सायरन बजते ही शहर में ब्लैक आउट हो जाता था और दलमा के ऊपर एक नकली शहर बसाया गया था जहां लाइट जलते थे ताकि दुश्मन देश ऊपर से धोखा खाकर वहां बमबारी कर दे और शहर को नुकसान न हो। लेकिन यह हमारे शहर की खुशकिस्मती है कि दुश्मन के जहाज दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान कोलकाता से आगे नहीं आए।

टाटा मोटर्स से पहले यहां थी पेनसेल्वेनिया की कंपनी, बनाती था रोड रोलर

टाटा मोटर्स भले ही कंपनी का पहला मदर प्लांट हो और यहीं से टाटा मोटर्स की नींव रखी गई हो लेकिन यहां वर्ष 1930 में पेनसल्वेनिया कंपनी हुआ करती थी जो रोड रोलर बनाती थी। लेकिन कंपनी घाटे में चली गई। जेआरडी टाटा और सुमंत मूलगांवकर की मुलाकात जर्मनी में कंपनी के मालिक से हुई और उन्होंने इसे खरीद लिया। वर्ष 1945 में यहां रोड रोलर और उसके बाद मीडियम गेज वाले स्टीम इंजन बनाए जाते थे। वर्ष 1954 में इंजीनियरिंग एंड लोकोमोटिव कंपनी ने मर्सिडीज के साथ मिलकर ट्रक बनाना शुरू किया।

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