आज भी वो मंजर याद कर कांप जाती रूह, पाक से जान बचाकर आए हिंदू परिवारों की दास्‍तां

जमशेदपुर, गुरदीप राज।   Partition of India 14 अगस्त 1947 की वह काली रात तब सबकुछ समान्य लग रहा था। अचानक लोगों की चहलकदमी बढऩे लगी। कुछ देर बाद पाकिस्तान अलग देश होने की घोषणा के साथ झंडा लहराने लगा। कुछ ही देर में हजारों की भीड़ हाथों में नंगी तलवारें, खंजर व अन्य हथियार लिए सड़कों पर उतर आई। देखते ही देखते महिलाओं व बच्चों की चीत्कार सन्नाटे को चीरती माहौल को खौफनाक बनाने लगी।

हर तरफ बचाओ-बचाओ व भागो-मारो का शोर गूंजायमान हो उठा। पिता ने खिड़की से बाहर झांक कर देखा तो दो मिनट के लिए उनके मुंह से आवाज ही न निकली। फिर वो आपने को संभालते हुए बोले दंगा हो गया है। पाकिस्तान समर्थक हमें यहां से भगा रहे हैं। इसके बाद जिसे जो मिला वह जरूरी सामान समेट लिया। जल्दी ही हमसब घर से सुरक्षित स्थान की ओर भाग निकले। रास्ते में हमने देखा कि दुकानें लूटी जा रही थीं। हमारे घरों में जबरदस्ती कब्जे किये जा रहे थे। 

जो वहीं रह गए, हो रहे प्रताडि़त

चरणजीत लाल। तब 12 वर्ष के थेे।

हां के वासिंदा अपनी जमीन, जायदाद छोड़कर खाली हाथ जान बचा कर भाग रहे थे। मिलिट्री वहां से बचा कर हिंदुओं को भारत पहुंचा रही थी। जो हिंदू को अपनी जमीन व जायदाद का लोभ था वह आज पाकिस्तानी हो गए और प्रताडऩा झेल रहे हैं। ट्रेनों में शरणार्थियों को बैठाकर कुरुक्षेत्र पहुंचाया जा रहा था। पाकिस्तान से उस वक्त करीब 250 हिंदू परिवार भाग कर भारत पहुंचे थे। यह बातें गोलमुरी रिफ्यूजी कालोनी निवासी 85 वर्षीय चरणजीत लाल ने बताईं। बताते-बताते उनकी आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने बताया कि उस वक्त उनकी उम्र करीब 13-14 वर्ष रही होगी। वे लोग पाकिस्तान के बादशाहपुर, तहसील पलिया में रहते थे। अपनी हवेली व दो मकान वहीं छोड़ कर भाग कर दादी राधा, दादा गुरदत्तमल व पिता के साथ लुधियाना पहुंचे। वहां दादाजी का सदमे से निधन हो गया। 

अगस्त माह में पहुंचे चाकुलिया

चरणजीत चरणजीत लाल ने बताया कि दादा के निधन के बाद तीन दिन लुधियाना में रुककर वे लोग कुरुक्षेत्र पहुंचे। अगस्त माह में वे लोग परिवार के साथ चाकुलिया पहुंचे। उन्होंने बताया कि चाकुलिया में वे लोग मिलिट्री कैंप में ठहरे थे। जहां प्रतिदिन दोपहर में तूफान आता था। सरकार से शिकायत करने पर कुछ शरणार्थियों को टाटानगर के बारीडीह स्थित मिलिट्री कैंप भेज दिया गया। जबकि आज भी कुछ शरणार्थी चाकुलिया में ही निवास कर रहे हैं। 

टाटा कंपनी ने दी शरण, बसाई कॉलोनी

अपनों से बिछडऩे का दर्द क्या होता है, कोई इन शरणार्थियों से पूछे। वर्ष 1947 में भारत विभाजन के बाद शहर पहुंचे कई ऐसे सिख परिवार है, जिन्होंने अपनी मेहनत के बल पर अलग पहचान बनाई। वे आज भी उस दर्द को महसूस करते है, जब उनके दादा-परदादा अपनी जमीन जायदाद पाकिस्तान में छोड़कर खाली हाथ किस कठिनाईयों से जूझते हुए हजारों किलोमीटर दूर जमशेदपुर पहुंचे थे। तब टाटा स्टील ने इन शरणार्थियों को न सिर्फ शहर में बसाया था, बल्कि उनके लिए अलग कॉलोनी बनाई। आज भी उस कॉलोनी को रिफ्यूजी कॉलोनी के नाम से जाना जाता है। 

शुरुआती दौर में चार आना देती थी टाटा कंपनी

नागरिकता संशोधन विधेेयक पारित होने पर खुशी मनाते गोलमुरी स्थित रिफ्यूजी कॉलोनी के लोग। 

शरणार्थियों की मदद के लिए टाटा स्टील शुरुआती दौर में प्रति व्यक्ति चार आना एक सप्ताह में देती थी। जिसके बाद टाटा स्टील ने गोलमुरी स्थित रिफ्यूजी कॉलोनी में 151 शरणार्थियों को एक रुपये की रजिस्ट्री पर मकान बना कर दिया। फिर पानी का कनेक्शन दिया। वर्ष 1965 में रिफ्यूजी कॉलोनी में बिजली की सुविधा मिलने लगी। उन्होंने बताया कि टाटा स्टील ने शरणार्थियों को व्यवसाय करने के लिए साकची में 101 दुकानें उपलब्ध कराईं, जिस मार्केट का नाम रिफ्यूजी मार्केट पड़ा। 

खुद के दम पर खड़ा किया व्यवसाय

पकिस्तान से आने के बाद शरणार्थियों को पास न रहने को मकान था न व्यवसाय के लिए रुपये। टाटा स्टील के सहयोग से उन्हें रहने को मकान व व्यवसाय के दुकान मिली। शरणार्थियों ने नौकरी में कम व व्यवसाय की ओर ज्यादा ध्यान दिया, अपनी मेहनत के दम पर वर्तमान में शरणार्थियों ने अच्छा मुकाम हासिल कर लिया है। वर्तमान में एक-एक शरणार्थी व्यवसाय कर लखपति से करोड़पति बन चुके है। 

चाकुलिया से ट्रेनों के नीचे छुपा कर लाया जाता था चावल

चरणजीत लाल ने बताया कि पहले चाकुलिया व अन्य स्थानों से चावल को टाटा लाने पर पाबंदी लगाई गई थी। जिसके कारण वे लोग चाकुलिया से चावल ट्रेन की चेचिस में रखकर चोरी छिपे टाटानगर लाते थे और उसे दोगुनी कीमत में हाथों हाथ व्यवसाइयों को बेच देते थे। कई बार चावल की बोरियां पुलिस ने पकड़़ लीं, लेकिन बोरियों पर अपना हक नहीं जताने के कारण उनलोगों तक पुलिस नहीं पहुंच पाई। इस तरह सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़कर वे लोग आज इस मुकाम तक पहुंचे है। 

72 वर्षों बाद शरणार्थियों के ताने से मिली राहत

चरणजीत लाल ने बताया कि भारत का विभाजन हुए करीब 72 वर्ष हो गए। इन 72 वर्षो के बाद भाजपा सरकार ने शरणार्थियों को सम्मान दिलाने का काम किया है। अबतक शरणार्थियों के ताने सुन-सुन कर हमारे दिलों में टीस उठती थी। अपना कमाते थे और खाते थे, जिसके बाद भी उन्हें रिफ्यूजी कह कर संबोधित किया जाता था, लेकिन अब हम गर्व महसूस करते है कि अब हम भारत के नागरिक हो गए। 

चार वर्ष की उम्र में पाकिस्तान से भागने पड़ा

सुरजीत सिंह।

रिफ्यूजी कालोनी निवासी 76 वर्षीय सुरजीत सिंह ने बताया कि जिस वक्त भारत का विभाजन हुआ था उस वक्त उनकी उम्र करीब चार वर्ष की थी। जब उनको होश आया तो उनके पिता थेरा सिंह ने उन्हें बताया कि हिंदुस्तान-पाकिस्तान के बंटवारे के वक्त उनकी भरी दुकानों को पाकिस्तान में लूट लिया गया और कब्जा कर लिया गया। उनके परिवार पर जान की आफत आ गई थी। किसी तरह वे लोग पाकिस्तान से भाग कर टाटा पहुंचे। यहां उनके मामा रहते थे। मामा के घर मे शरण ली फिर किसी तरह दुकानें खुल कर व्यवसाय उनके परिवार के लोगों ने शुरू किया। फिर धीरे-धीरे समय के साथ सब बदल गया, लेकिन आज भी वह मंजर रुह को हिला देता है।  

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