world Tribal Day: झारखंड बचेगा तभी तो वृहद झारखंड के आदिवासी बचेंगे, इसी सोच के साथ सालखन मुर्मू कर रहे नौ अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस मनाने की बात

22 मार्च 2021 को संयुक्त राष्ट्र ने 2022 से 2032 को आदिवासी दशक के रूप में आदिवासी भाषाओं की संरक्षण और प्रोन्नति के लिए रेखांकित किया है क्योंकि विश्व की लगभग 7000 भाषाओं में से 40% भाषाएं विलुप्त होने वाली हैं।

Rakesh RanjanMon, 26 Jul 2021 02:12 PM (IST)
पूर्व सांसद व आदिवासी सेंगेल अभियान के राष्ट्रीय अध्यक्ष सालखन मुर्मू।

जमशेदपुर, जासं। झारखंड बचेगा तो वृहद झारखंड और भारत के आदिवासी बचेंगे। इसलिए अब वृहद झारखंड बनाने की सोच से ज्यादा जरूरी है, वृहद झारखंड अर्थात बंगाल, बिहार, ओडिशा, असम, छत्तीसगढ़ और झारखंड के आदिवासियों को मिलकर झारखंड को बचाने और समृद्ध करने का संकल्प और कार्य योजना बनाकर मैदान में उतर जाने का। चूंकि झारखंड के अधिकांश आदिवासी नेता और आदिवासी जनता ने शहीदों, पूर्वजों और आंदोलनकारियों का सपना "अबुआ दिशुम, अबुआ राज" को विगत दो दशकों में लुटने-मिटने के कगार पर खड़ा कर दिया है। सपनों को बचाने की जगह बेचने का काम किया है। चलो विश्व आदिवासी दिवस के दिन प्रेरणा लेकर आगे बढ़ें।

मयूरभंज (ओडिशा) के पूर्व सांसद व आदिवासी सेंगेल अभियान के राष्ट्रीय अध्यक्ष सालखन मुर्मू कहते हैं कि संयुक्त राष्ट्र ने नौ अगस्त 1982 को प्रथम बार आदिवासी सवाल पर चर्चा की। फिर 1994 से प्रत्येक वर्ष नौ अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस मनाने का फैसला लिया। तत्पश्चात 13 सितंबर 2007 को विश्व आदिवासी अधिकार घोषणा पत्र 144 राष्ट्रों की सहमति से जारी किया, ताकि विश्व के 90 देशों में रह रहे करीब 37 करोड़ (विश्व आबादी का 6.2%) आदिवासियों के हासा (भूमि), भाषा, जाति, धर्म, इज्जत, आबादी, रोजगार, चास-वास और आत्म- निर्णय आदि का संरक्षण और संवर्धन संभव हो सके। घोषणा-पत्र का विरोध चार बड़े राष्ट्रों अमेरिका, आस्ट्रेलिया, कनाडा और न्यूजीलैंड ने किया था। इन्होंने अपने राष्ट्र में आदिवासियों के साथ पहले घोर अन्याय, अत्याचार किया था, परंतु अंततः उन्हें भी इसका समर्थन करना पड़ा। विश्व आदिवासी अधिकार घोषणा पत्र के अनुपालन के लिए राष्ट्र कानूनी रूप से बाध्य नहीं हैं। यह आदिवासियों की एकता, जागरूकता और अन्य जन सहयोग से प्रभावी हो सकता है। नौ अगस्त 2021 का लक्ष्य है- सोशल कॉन्ट्रैक्ट अर्थात आदिवासियों को सर्वत्र शामिल करना Nothing for us without us.

संयुक्त राष्ट्र ने रखा आदिवासी दशक का थीम

22 मार्च 2021 को संयुक्त राष्ट्र ने 2022 से 2032 को "आदिवासी दशक" के रूप में आदिवासी भाषाओं की संरक्षण और प्रोन्नति के लिए रेखांकित किया है, क्योंकि विश्व की लगभग 7000 भाषाओं में से 40% भाषाएं विलुप्त होने वाली हैं। इसमें सर्वाधिक खतरे के मुहाने पर आदिवासी भाषाएं खड़ी हैं। चूंकि इनका उपयोग पठन-पाठन, जनसंचार, सरकारी कार्य और रोजगार सृजन में नहीं किए जाते हैं। विश्व आदिवासी दिवस का अनुपालन दुनिया भर में बढ़ रहा है। दुनिया भर में विलुप्त हो रहे आदिवासियों के लिए एकजुट होकर संकल्प लेने का यह एक अच्छा अवसर है। मगर नाच गान, खेलकूद, आनंद मनाने से ज्यादा अपने भूत, वर्तमान और भविष्य के बारे सोचने और संकल्प लेने का दायित्व गंभीरतापूर्वक लेना अनिवार्य हो जाता है। ताकि आदिवासियों के हासा, भाषा, जाति, धर्म, इज्जत, आबादी, रोजगार, चास-वास और संवैधानिक-कानूनी अधिकार का संरक्षण और संवर्धन को सफल बनाया जा सके। उपरोक्त मुद्दों को अपना, समाज का, संगठनों का एजेंडा बनाकर चलना होगा। साथ ही एकजुटता और सफलता के लिए आदिवासी समाज के भीतर विद्यमान नशापान, अंधविश्वास (डायन प्रथा), ईर्ष्या द्वेष, राजनीतिक कुपोषण और प्राचीन वंश- परंपरागत आदिवासी स्वशासन व्यवस्था में गुणात्मक जनतांत्रिकरण कर सुधार लाने की त्वरित जरूरत है। आदिवासियों के तमाम सामाजिक-राजनीतिक संगठनों को पहचानने और मजबूर करने की भी जरूरत है- कि क्या वे वाकई आदिवासियों के हासा, भाषा, जाति,धर्म, इज्जत, आबादी, रोजगार, न्यायपूर्ण पुनर्वास आदि के लिए सजग प्रहरी की तरह कार्यरत हैं या केवल अपने पेट, परिवार और स्वार्थों को आगे बढ़ा रहे हैं?

इन राज्यों के आदिवासी सामाजिक-राजनीतिक सशक्तीकरण में सक्रिय

आदिवासी सेंगेल अभियान झारखंड, बंगाल, बिहार, असम, ओडिशा आदि प्रांतों में विगत दो दशक से आदिवासियों के सामाजिक-राजनीतिक सशक्तीकरण के लिए सक्रिय है। 2021 के विश्व आदिवासी दिवस को सेंगेल, झारखंड दिशोम (झारखंड प्रांत) को समर्पित करना चाहती है। अर्थात आज का झारखंड दो दशक के बावजूद जिस प्रकार लुटने-मिटने की कगार पर खड़ा है, उसे कैसे बचा कर समृद्ध किया जाए? शहीदों के सपनों को कैसे पुनर्जीवित किया जाए? आज की परिस्थितियों में यदि संविधान प्रदत्त आरक्षण के लाभ से आदिवासियों को वंचित कर दिया जाए तो शिक्षा, रोजगार, चुनाव आदि क्षेत्रों से आदिवासी गायब कर दिए जा सकते हैं। ठीक उसी प्रकार झारखंड प्रांत आदिवासियों के लिए एक आदिवासी आरक्षित प्रदेश की तरह है। झारखंड प्रदेश में आदिवासियों की मजबूती देश और दुनिया के आदिवासियों के अस्तित्व पहचान और हिस्सेदारी के साथ जुड़ा हुआ है। अतः सेंगेल का आह्वान है कि देश के आदिवासी अपनी पूरी ताकत लगाकर झारखंड दिशोम को लुटने- मिटने से बचाने का संकल्प लें। आदिवासी सेंगेल अभियान "अबुआ दिशुम, अबुआ राज" को सफल बनाने के संकल्प के साथ 9 अगस्त 2021 को भारत के पांच प्रदेशों में निम्न मांगों के साथ धरना प्रदर्शन आदि के मार्फत भारत के राष्ट्रपति को ज्ञापन प्रदान करेगी।

ये रही मांग

- 2021 की जनगणना में प्रकृति पूजक आदिवासियों को सरना धर्म कोड प्रदान किया जाए।

- संताली को हिंदी के साथ झारखंड की प्रथम राजभाषा बनाया जाए और हो, मुंडा, कुड़ुख, खड़िया आदि भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाए।

- झारखंडी डोमिसाइल और अन्य संवैधानिक-कानूनी अधिकारों की रक्षा की जाए।

- सीएनटी/एसपीटी कानून की रक्षा करते हुए वीर शहीदों सिदो मुर्मू और बिरसा मुंडा के वंशजों के सम्मान, सुरक्षा और समृद्धि के लिए दो ट्रस्टों का गठन किया जाए।

- विस्थापन-पलायन, ह्यूमन ट्रैफिकिंग पर रोक लगाई जाए।

- असम-अंडमान आदि के झारखंडी आदिवासियों को अविलंब अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा प्रदान किया जाए।

- शहीद सिदो मुर्मू के वंशज रामेश्वर मुर्मू और रूपा तिर्की के संदिग्ध मौतों की सीबीआई जांच हो।

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