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गुरु के चरणों में मिलती है भक्ति और योग की शक्ति

'सब धरती कागज करूं, लेखनी सब बनराय। सात समुंदर की मसि करूं, गुरुगुण लिखा न जाय।' संत कबीर ने कहा है, अगर मैं इस धरती के बराबर कागज बनाऊं, दुनिया के सभी वृक्षों की कलम बना लूं और सातों समुद्रों के बराबर स्याही बना लूं तो भी गुरु के गुणों को लिखना संभव नहीं है। कुछ इसी तरह से अपने गुरुओं की व्याख्या पूर्वी सिंहभूम के दिग्गजों ने की। सफलता का श्रेय प्रशासनिक अफसरों ने अपने गुरु को दिया तो शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े लोग गुरुओं को नमन किए। खेल में शिखर पर पहुंचे खिलाड़ियों ने अपनी सफलता के पीछे गुरु का हाथ होना बताया। शिक्षाविद् कहे-तमसो मा ज्योतिर्गय (अंधकार से प्रकाश की ओर) गुरु ही ले गए। गुरु पूर्णिमा की पूर्व संध्या पर लोगों ने कहा..गुरु साक्षात परब्रह्म..।

अपने लिए अध्ययन करें, तभी आप सफल होंगे

मैं अपने गुरु की वाणियों को आज तक नहीं भूला। इस कारण अपने लिये अध्ययन करता हूं। मेरे गुरु उज्जैन के विक्रम विश्वविद्यालय प्रोफेसर श्रीनिवास रथ व वी वेंकटाचलम हैं। वेंकटाचलम सर पद्यश्री से विभूषित हो चुके हैं और वे संपूर्णानंद विश्वविद्यालय के कुलपति भी रहे हैं। मेरा भी सौभाग्य रहा कि मैं भी वहां का कुलपति रहा। श्रीनिवास सर की बात आज भी याद है, उन्हीं के कारण मैं आज भी अपने लिए अध्ययन करता हूं। उनका कहना था विद्यार्थी जीवन में परीक्षा के लिए अध्ययन किया जाता है। इसके आगे नौकरी के लिए अध्ययन किया जाता है, लेकिन कोई अपने लिए अध्ययन नहीं करता। जो अपने लिए अध्ययन करते हैं, वहीं ज्ञान बांट पाते हैं। वेंकटाचलम सर से आचार, शुद्धता, ज्ञान के प्रति निष्ठा, संस्कृति को सीखा। श्रीनिवास सर ने उन्हें ओडिशा से उठाकर उज्जेन लाये। उनके सानिध्य में साहित्य शास्त्र का अध्ययन किया।

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