Rathyatra: महाप्रभु जगन्नाथ की रथ यात्रा पर लगातार दूसरे साल कोरोना का असर, उत्सव का रंग रहेगा फीका

जगन्नाथ धाम पुरी के तर्ज पर सरायकेला में आयोजित होनेवाली वार्षिक जगन्नाथ रथ यात्रा का इतिहास तकरीबन ढाई सौ साल पुराना है। परंतु बीते साल से सरायकेला की परंपरागत रथ यात्रा पर लगातार कोरोना इफेक्ट देखा जा रहा है।

Rakesh RanjanTue, 22 Jun 2021 05:40 PM (IST)
झारखंड के सरायकेला में स्थित श्री श्री जगन्नाथ मंदिर। जागरण

सरायकेला, जासं। जगन्नाथ धाम पुरी के तर्ज पर सरायकेला में आयोजित होनेवाली वार्षिक जगन्नाथ रथ यात्रा का इतिहास तकरीबन ढाई सौ साल पुराना है। परंतु बीते साल से सरायकेला की परंपरागत रथ यात्रा पर लगातार कोरोना इफेक्ट देखा जा रहा है। इस वर्ष भी अब तक कयास लगाया जा रहा है कि कोरोना संक्रमण को लेकर हालात यदि सामान्य नहीं हुए तो सरायकेला की प्रसिद्ध रथ यात्रा में सिर्फ धार्मिक परंपराओं का निर्वाहन किया जा सकेगा।

जगन्नाथ पांजी के अनुसार महाप्रभु श्री जगन्नाथ की वार्षिक रथयात्रा को लेकर तिथि वार धार्मिक अनुष्ठानों की घोषणा कर दी गई है। सरायकेला स्थित प्राचीन जगन्नाथ श्री मंदिर के पुजारी सह सेवक पंडित ब्रह्मानंद महापात्र बताते हैं कि पंचागीय दशा के अनुसार इस वर्ष की रथ यात्रा खास होगी। महाप्रभु श्री जगन्नाथ के अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ मौसीबाड़ी गुंडिचा मंदिर जाने के क्रम में मार्ग में ही मां विपदातारिणी की पूजा आगामी 13 जुलाई को होगी। इस अवसर पर सुहागिन महिलाएं अपने परिवार और संतान की विपत्तियों से रक्षा के लिए माता सुभद्रा की मां विपदातारिणी के स्वरूप में आराधना करती हैं। पंडित श्री महापात्र ने बताया कि ऐसा अवसर रथयात्रा के इतिहास में बहुत ही कम बार आया है। जब रथ यात्रा मार्ग में ही मां विपदातारिणी की पूजा हुई है।

ऐसे होंगे धार्मिक अनुष्ठान

24 जून- देवस्नान पूर्णिमा। 10 जुलाई- नेत्र उत्सव। 12 जुलाई- जात्रा ( रथ यात्रा प्रारंभ). 13 जुलाई- मां विपदातारिणी पूजा एवं मौसी बाड़ी आगमन। 16 जुलाई- रथभांगिनी। 20 जुलाई- बाऊड़ा ( घूरती रथ प्रारंभ). 21 जुलाई- महाप्रभु का श्री मंदिर आगमन के साथ देवशयनी एकादशी पर महाप्रभु का चातुर्मास शयन प्रारंभ।

अलौकिक है सरायकेला में महाप्रभु श्री जगन्नाथ का आगमन

सरायकेला में महाप्रभु श्री जगन्नाथ के पूजन की परंपरा तकरीबन ढाई सौ साल पुरानी बताई जाती है। इनके सरायकेला आगमन के संबंध में बताया जाता है कि उड़ीसा स्थित ढेंकानाल के पुजारी पंडित जलंधर महापात्र को नदी में स्नान करने के क्रम में महाप्रभु के विग्रह ( लकड़ी) का दर्शन बहते हुए हुआ था। जिसे घर लाकर पुजारी ने श्रृंगार करते हुए पूजा - अर्चना शुरू की। कुछ समय पश्चात पंडित जलंधर महाप्रभु के विग्रह को लेकर तत्कालीन सरायकेला स्टेट में पहुंचे और खपरैल घर में महाप्रभु को स्थापित कर पूजा-अर्चना करने लगे। इसी दौरान युद्ध के लिए जा रहे सरायकेला स्टेट के तत्कालीन महाराज अभिराम सिंह को कुटिया से घंटी की आवाज आती हुई सुनाई दी। इस पर वह कुटिया में जाकर महाप्रभु से युद्ध विजय का आशीर्वाद मांगा। युद्ध से विजयी होकर लौटने के बाद उन्होंने पुजारी सहित महाप्रभु को लाकर खरकई नदी के तट पर जमीन देकर बसाया। इसके बाद प्रसिद्ध शिल्पकार चंद्रमोहन महापात्र के निर्देशन में इसे भव्य रूप देकर मंदिर का निर्माण कराया गया जो पश्चिम बंगाल स्थित बांकुड़ा और उड़ीसा के मिश्रित मंदिर वास्तुकला निर्माण शैली का उदाहरण है।

दो सौ साल पहले हुआ मंदिर का निर्माण

टेराकोटा पद्धति से तकरीबन पौने दो सौ साल पहले उक्त प्राचीन जगन्नाथ श्री मंदिर का निर्माण कराया गया था। परंतु वर्तमान में मंदिर के ऊपर नीम और पीपल के वृक्ष उगाने के कारण धरोहर की श्रेणी में गिने जाने वाले उक्त मंदिर का गुंबद भाग दरकने लगा है। जिसे लंबे समय से संरक्षित किए जाने की आवश्यकता जताई जा रही है। वही परंपरागत तरीके से महाप्रभु श्री जगन्नाथ के पूजा परंपरा को लेकर पुजारी जालंधर महापात्र की 10 वीं पीढ़ी आज महाप्रभु की सेवा कर रही है। मंदिर के वर्तमान पुजारी पंडित ब्रह्मानंद महापात्र द्वारा प्रतिदिन प्रातः कालीन पूजा अर्चना, भोग अर्पण और संध्या आरती की जाती है। महाप्रभु के पूजा अर्चना सहित संस्कृति के संरक्षक सरायकेला के राजा पदेन होते हैं। उड़ीसा से बिहार के विभाजन के समय सरकार के साथ हुए राजकीय करार के अनुसार 1 जनवरी 1948 से उक्त मंदिर की देखरेख और परंपराओं के निर्वहन का अधिकार राज्य सरकार के पास होने के बावजूद परंपरा अनुसार इसके संरक्षक सरायकेला के वर्तमान राजा प्रताप आदित्य सिंहदेव हैं। इसके अलावा वर्ष 2007 से जगन्नाथ सेवा समिति उक्त मंदिर की देखरेख और परंपराओं का निर्वहन कर रही है।

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