मधुमेह, थैलेसीमिया, मोटापा से ग्रस्त बच्चों को भी कोरोना से खतरा नहीं, सभी ठीक हो गए

CoronaVirus News सामान्य बच्चों की तरह जेनेटिक रोग से ग्रस्त बच्चों को भी कोरोना से ज्यादा खतरा नहीं है लेकिन सावधानी जरूरी है। कोरोना की पहली व दूसरी लहर में कई जेनेटिक रोग से ग्रस्त बच्चे संक्रमित हुए हैं ठीक भी हो गए।

Rakesh RanjanFri, 23 Jul 2021 05:47 PM (IST)
बड़ों में एसीई-2 पूरी तरह से विकसित हो जाता है ।

अमित तिवारी, जमशेदपुर । कोरोना से होनेवाली मौतों में सबसे अधिक वैसे मरीज शामिल हैं जो पूर्व से मधुमेह, मोटापा, हार्ट, ब्लड प्रेशर, थैलेसीमिया सहित अन्य बीमारी से ग्रस्त थे, जिन्हें को-मार्बिड कहा जाता है। लगभग 80 प्रतिशत को-मार्बिड के मरीजों की ही मौत हुई हैं। लेकिन, बच्चों के साथ ऐसा नहीं है। बच्चों में होने वाली मधुमेह टाइप-वन, थैलेसीमिया, मोटापा, सफेद रोग सहित अन्य जेनेटिक (आनुवांशिक) बीमारी के बावजूद उन्हें अभी तक कोरोना से कोई खतरा नहीं पहुंचा है।

जमशेदपुर में दूसरी लहर के बाद अभी तक 20 से अधिक बच्चे एमआइएससी (मल्टी सिस्टम इंफ्लेमेटरी) के मरीज सामने आ चुके हैं, जिनमें नौ मरीज वैसे पाए गए हैं, जो पूर्व से जेनेटिक बीमारी (मधुमेह टाइप-1, थैलेसीमिया, मोटोपा, हीमोफीलिया, सफेद दाग, डाउन सिंड्रोम ) से ग्रस्त थे। जब कोरोना पीक पर था तो ये बच्चे भी संक्रमित हुए लेकिन इन्हें थोड़ा भी महसूस नहीं हुआ। सामान्य बच्चों की तरह यह भी स्वस्थ हो गए। अब कोरोना के बाद होने वाली बीमारी एमआइएससी (जिसे पोस्ट कोविड भी कहते हैं) हुई तो पता चला कि इनके शरीर में पूर्व से एंटीबॉडी बना हुआ है। यानी ये पूर्व में कोरोना से संक्रमित हो चुके हैं। जब वे संक्रमित हुए तो इनके माता-पिता को भी पता नहीं चल सका। कारण कि इन्हें ज्यादा परेशानी नहीं हुई और ये बच्चे खेलते-कूदते ही स्वस्थ हो गए। ऐसे में विशेषज्ञ चिकित्सकों का कहना है कि जेनेटिक रोग से जूझ रहे बच्चों को भी कोरोना ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचाएगा।

अभी तक एमआइएसी के सभी बच्चे हुए स्वस्थ

दूसरी लहर के बाद टाटा मुख्य अस्पताल (टीएमएच) में एमआइएसी के नौ, मर्सी अस्पताल में छह, आदित्यपुर ईएसआइसी अस्पताल में चार मामले सामने आ चुके हैं। इसके अलावे कई निजी चिकित्सकों के क्लीनिक में भी एमआइएसी के मरीज पहुंचे लेकिन अभी तक सभी मरीज स्वस्थ हो चुके हैं। ऐसे में किसी भी बच्चों को घबराने की जरूरत नहीं है।

बच्चों में होने वाली प्रमुख जेनेटिक बीमारी

 डाउन सिंड्रोम सिस्टिक फाइब्रोसिस कंजेनिटल एड्रिनल हाइपरलेशिया एपर्ट सिंड्रोम- एंजेलमैन सिंड्रोम आंक्यलोसिंग स्पॉन्डिलाइटिस मस्कुलर डिस्ट्रॉफी एहलर्स डैमलॉस सिंड्रोम हेमोक्रोमैटोसिस हीमोफीलिया मार्फन सिंड्रोम न्यूरोफाइब्रोमैटोसिस

थैलेसीमिया-बच्चों में विकसित नहीं होता रेसप्टर एसीई-2

बच्चों में रेसप्टर एसीई-2 (एंजियोटेनसिन कंवर्टिन एंजाइम) विकसित नहीं होता है, जिसके कारण कोरोना वायरस उनके फेफड़े को नुकसान नहीं पहुंचा पाता है। वहीं, बड़ों में एसीई-2 पूरी तरह से विकसित हो जाता है जो वायरस को चुंबक की तरह टान लेता और उससे फेफड़ा तेजी से डैमेज होने लगता है। जिसके कारण सांस की परेशानी शुरू हो जाती है और ऑक्सीजन लेवल गिरने लगता है। इस दौरान मरीज की मौत भी हो जाती है।

2253 बच्चों में सिर्फ दो की हुई मौत

कोरोना से अभी तक कुल दो हजार 253 बच्चे संक्रमित हुए है। इसमें सिर्फ दो बच्चों की ही मौत हुई है। जबकि उम्र 15 साल के बाद अभी तक कुल 1052 की मौत हुई है।

कोट

सामान्य बच्चों की तरह जेनेटिक रोग से ग्रस्त बच्चों को भी कोरोना से ज्यादा खतरा नहीं है लेकिन सावधानी जरूरी है। कोरोना की पहली व दूसरी लहर में कई जेनेटिक रोग से ग्रस्त बच्चे संक्रमित हुए हैं ठीक भी हो गए। अभी एंटीबॉडी जांच कराई जा रही है तो उनके शरीर में एंटीबॉडी विकसित मिल रहा है।

- डॉ. शुभोजीत बनर्जी, शिशु रोग विशेषज्ञ, मर्सी अस्पताल।

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