कुडुख को संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल करने की उठी मांग

संवाद सूत्र, डुमरी : जनजातीय समाज के बीच बोली जाने वाली कुडुख भाषा को संविधान की आठवीं सूची में शामिल करने के लिए डुमरी प्रखंड के लूर डीपा में शुक्रवार से तीन दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन आरंभ हो गया। इस सम्मेलन में कई राज्यों के लगभग 400 प्रतिनिधि भाग ले रहे हैं। प्रतिनिधियों में दिल्ली, पश्चिम बंगाल, असम, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ, ओडिशा, तमिलनाडु, बिहार और अंडमान निकोबार के लोग शामिल हैं। सम्मेलन में कुडुख भाषा को जनप्रिय भाषा बनाने के लिए संघर्षरत और दैनिक जागरण से सम्मानित एतवा उरांव ने कहा कि यह भाषा लगभग मृत प्राय भाषाओं की सूची में पांचवें स्थान पर जा पहुंची है। जिसे पुनर्वजीवित करने का हर संभव प्रयास किया जा रहा है। आम जनों के सहयोग से लूर डीपा में कुडुख भाषा और तोलोंग सिकी की पढाई के लिए देश में पहले यहीं विद्यालय की स्थापना की गई है। विद्यालय में इस भाषा की पढ़ाई होने से यह भाषा लोकप्रिय होता जा रहा है। नए नए लेखकों की रचनाएं पुरस्कृत हो रही है। कुडुख साहित्य का प्रचार प्रसार हो रहा है। कुडुख लिटरेरी सोसाइटी का एक मात्र लक्ष्य इस भाषा को संविधान की आठवीं सूची में शामिल कराना है। इस सोसाइटी की स्थापना वर्ष 2006 में की गई थी। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज के पूर्ण सहयोग मिलने से लक्ष्य को हासिल करना कोई कठिन काम नहीं है। इस अवसर पर डॉ. सुशील लकड़ा, निकोलस टोप्पो, आकाश भगत, प्रो. हरि उरांव, डॉ. उषा रानी मिज, प्रो. महेश भगत, सिलास कुूजूर, सुशील कुजूर, जोसेरियुस एक्का, प्रो. विरेंद्र उरांव आदि उपस्थित थे।

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