Coronavirus Effect: कतरास के इस 800 वर्ष पुराने मंदिर में बदल गई परंपरा, पशु की जगह इस चीज की दी जा रही बलि

मंदिर के पुजारी सिंटू बाबा ने बताया कि 800 वर्ष पूर्व मध्यप्रदेश के रीवा राज घराने के वंशज राजा सुजन सिंह ने कतरास के जंगल में माता की प्रतिमा स्थापित की थी। तब से लेकर आज तक पहली पूजा यहां के राज परिवार के सदस्य ही करते आ रहे है।

MritunjayWed, 23 Jun 2021 08:53 AM (IST)
केला की बलि देते मंदिर के सेवक ( फोटो जागरण)।

धनबाद [ राकेश कुमार महतो ]। कतरास के लिलोरी स्थान व लिलोरी मंंदिर राजागढ़ के कुल देवी के नाम से जाना जाता है। यह मंदिर करीबन 800 साल पुराना है। इस मंदिर के पिछे कई राहस्य और इतिहास छिपे हैं। जिस कारण यहां प्रतिदिन पाठा (पशु) की बलि दी जाती रही है। लेकिन कोरोना के कारण मंदिर की 800 की परंपरा बदल गई है। पाठा ( बकरा) की बलि बंद है। जबसे कोरोना आया है और इसके बचाव के लिए सरकार की तरफ से गाइडलाइन जारी की गई है यहां फल ( केला और गन्ना) की बलि से परंपरा निभायी जा रही है।

800 वर्ष पुराना मंदिर में 56वीं पीढ़ी निभा रही परंपरा

मंदिर के पुजारी सिंटू बाबा ने बताया कि 800 वर्ष पूर्व मध्यप्रदेश के रीवा के राज घराने के वंशज राजा सुजन सिंह ने कतरास के इस जंगल में माता की प्रतिमा स्थापित किए थे। तब से लेकर आज तक पहली पूजा यहां के राज परिवार के सदस्य ही करते आ रहे है। उसके बाद अन्य लोग पूजा पाठ करते हैं। राज परिवार के चंद्रनाथ सिंह मंदिर देखरेख करते थे। लेकिन कुछ सालों से उनके स्वस्थ ठीक नहीं रहने के कारण उनका पु़त्र विशाल देव सिंह मंदिर की देखरेख कर रहा हैं। यह परिवार की 56वीं पीढ़ी है जो अपनी परंपरा निभा रही है.

मंदिर के प्रति लोगों की आस्था बेहद गहरा

लिलोरी मंदिर के प्रति लोगों की आस्था इतना गहरा है कि यहां प्रतिदिन दूर-दूर से व दूसरे राज्यों से भी लोग पूजा करने के लिए आते हैं। ऐसी मान्यता है कि यहां जो भी भक्त श्रद्धा भक्ति से अपनी मन्नतें माता से मांगता है, पूर्ण रूप से पूरी होती है। यहां तक कि कई लोग अपनी मन्नतें पूरी होने पर पशु की बलि भी देते हैं।

प्रतिदिन सुबह दी जाती बलि

लिलोरी माता मंदिर में वर्षों से बलि की परंपरा चली आ रही है। प्रतिदिन सुबह पूजा के समय पशु की बलि दी जाती है। इस मंदिर में करीबन सौ पुजारी पूजा करते हैं। सभी अलग-अलग गुट बनाकर पशु खरीदकर बलि देते हैं। लेकिन लॉकडाउन के कारण मंदिर बंद है। जिस कारण पुजारियों को घर चलाना मुश्किल हो गया है, इसलिए बलि की परंपरा पुरी नहीं की जा रही है। इसके साथ ही यहां आसपास के हजारों दुकानदारों का रोजगार थम गया है।

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