Jharkhand Radhakrishna Fair: सरना-सनातन की सांस्कृतिक एकरूपता का प्रतीक है आदिवसासियों का राधा-कृष्ण मेला

Jharkhand Radhakrishna Fair दुमका धनबाद सिमडेगा समेत कई ग्रामीण इलाकों में में खासकर पूर्णिमा के दौरान लगने वाला पारंपरिक राधा-कृष्ण मेला या रास मेला में सनातन-सरना संस्कृति का मिलन देखते ही बनता है। यह मेला सरना-सनातन की सांस्कृतिक एकरूपता का प्रतीक है।

MritunjaySat, 20 Nov 2021 07:59 PM (IST)
झारखंड के संताल में सदियों से चली आ रही रास मेला की परंपरा ( फोटो जागरण)।

रुपेश कुमार झा लाली, बासुकीनाथ (दुमका)। धान कटनी के बाद कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर झारखंड के कई ग्रामीण इलाकों में रास मेला आयोजन की परंपरा पुरातन है। इस दौरान रास मेला लगने वाले गांवों में आमबास रेदो काली मेला, कुनामी रे राज रास दो..। आसीन चांदो बालेमोलोक, दिबी होयोक, आमाबास रेदो काली। कुनामी, कुनामी, राज रास दो.., संताली गीत खूब गूंजती है। संताली भाषा में गाए जाने वाले इस गीत का मतलब है अमावस्या में काली मेला और पूर्णिमा में राज रास। इस गीत को आदिसवासी समुदाय के लोग सोहराय गीत के स्वर में ही गाते हैं। दुमका, धनबाद, सिमडेगा समेत कई ग्रामीण इलाकों में में खासकर पूर्णिमा के दौरान लगने वाला पारंपरिक राधा-कृष्ण मेला या रास मेला में सनातन-सरना संस्कृति का मिलन देखते ही बनता है। यह मेला सरना-सनातन की सांस्कृतिक एकरूपता का प्रतीक है।

रास मेला के दाैरान रास लीला का आयोजन

दुमका के जरमुंडी प्रखंड क्षेत्र के आधे दर्जन से अधिक इलाकों में रास मेला का आयोजन काफी धूमधाम से किया जाता है। आदिवासी समुदाय के लोगों का मानना है कि सनातन-सरना धर्म को जोड़ने में रास मेला की भूमिका है। सदियों से चली आ रही सरना धर्म एवं सनातन धर्म के गौरवशाली व वैभवशाली इतिहास में दोनों धर्मों को जोड़ने में राधा कृष्ण की रासलीला का अद्भुत महत्व है। जरमुंडी प्रखंड के सुदूर ग्रामीण आदिवासी इलाकों में प्राचीन काल से आदिवासी समुदाय के लोग धानकटनी रास मेला का त्योहार मनाते हैं। पूरे नियम-निष्ठा से रास मेला के दौरान रास-लीला का आयोजन किया जाता है।

लकड़ी से बनी राधा-कृष्ण की प्रतिमा की होती है पूजा

आदिवासी समुदाय के लोग लकड़ी को तराश कर राधा-कृष्ण एवं गोपियों के आधा दर्जन से अधिक प्रतिमाएं बनाते हैं। इसे सजाते-संवारते हैं और रास मेला के दिन इन्हें गोलाकार पर रखकर नाचते हैं। समय के साथ अब कहीं-कहीं अब मिट्टी की भी राधा-कृष्ण की आकृति भी बनाई जाती है। इस दौरान पूरी रात ढोल, मृदंग की धुन पर आदिवासी समुदाय के लोग भी खूब नाच-गान करते हैं। जरमुंडी प्रखंड मुख्यालय से करीब 18 किलोमीटर पश्चिम-दक्षिण दिशा में स्थित पांडेश्वरनाथ मंदिर से दो किलोमीटर पश्चिम दिशा में स्थित पांडेश्वर गुफा के समीप स्थित नावाडीह, विशनपुर, बांसजोड़ा, बाराटांड़ एवं रामपुर कार्तिक पूर्णिमा की रात्रि में विशाल रास मेला का आयोजन हरेक वर्ष होता है। कहीं यह दो दिवसीय और कहीं तीन दिवसीय आयोजन होता है। इस दौरान आदिवासी व गैर-आदिवासी समुदाय के लोग अपने सगे संबंधी एवं रिश्तेदारों को भी आमंत्रित करते हैं।

राधा-कृष्ण के संग शिव की भी करते हैं पूजा

इस अवसर पर राधा-कृष्ण के साथ शिव की पूजा भी होती है। जनजातीय सुरक्षा मंच के राष्ट्रीय सह संयोजक डा.राजकिशोर हांसदा कहते हैं कि द्वापर युग से आदिवासी समुदाय का नाता है। आदिवासी सनातन हैं। यही कारण है कि सरना आदिवासी बासुकीनाथ मंदिर में शिव की पूजा करते हैं। आदिवासियों में शिव की पूजा के साथ राधा-कृष्ण की रासलीला का काफी महत्व है। सफेद वस्त्र धारण करने वाले सरना धर्म के पुजारी अपने अनूठे शैली में पूरे नियम निष्ठा के राधा-कृष्ण व गोपियों की कठपुतली साक्ष्य मानकर उनके समक्ष रास लीला का मंचन करते हैं। राधा-कृष्ण की रासलीला का आयोजन कर आदिवासी व गैर आदिवासी समुदाय के लोग पूरी रात नाचते-गाते और झूमते हैं। आयोजन के उपरांत बनाई गई प्रतिमाएं विसर्जित कर दी जाती है। इसे घरों में रखने की परंपरा नहीं है।

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