क्या गुजरातियों को सबक सिखाने के लिए कोयला उद्योग-बैंकों का हुआ था राष्ट्रीयकरण, इंटक नेता ने खोला राज

इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में मोरारजी भाई देसाई ने बगावत किया था और कांग्रेस आर्गनाइजेशन का गठन किया था। शुरुआत में इसमें जगजीवन राम नहीं गए थे। मोरारजी भाई गुजराती थे। अधिकांश उद्योगपति और बैंकर भी गुजराती थे।

MritunjayTue, 27 Jul 2021 11:42 AM (IST)
कोल इंडिया मुख्यालय और कोयले का खनन ( फाइल फोटो)।

रोहित कर्ण, धनबाद। कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण क्यों हुआ। सुरक्षा से अर्थव्यवस्था तक में दिमाग न खपाइये। अपने मजदूर नेता इंटक के झा जी की सुनिये। इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में मोरारजी भाई देसाई ने बगावत किया था और कांग्रेस आर्गनाइजेशन का गठन किया था। शुरुआत में इसमें जगजीवन राम नहीं गए थे। मोरारजी भाई गुजराती थे। अधिकांश उद्योगपति और बैंकर भी गुजराती थे। 95 फीसद कोयला खदानों के मालिक भी गुजराती ही थे। वे खुले तौर पर देसाई का समर्थन कर रहे थे। लिहाजा गांधी ने उन्हें सबक सिखाने की ठानी और विभिन्न बैंकों व कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण शुरू किया। अन्य उद्योगों का नंबर बाद में आया। राष्ट्रीयकरण की खबर खानगी मालिकों को भी अखबारों से ही पता चली। खदानों में सुरक्षा की अनदेखी तो बस बहाना था। अब सवाल उठता है कि निजी क्षेत्र को ब्लॉक क्यों दिए जा रहे। झा जी का नजरिया आप खुद समझिए। 

हमारी मांगें पूरी करो

जेबीसीसीआइ-11 की बैठकें शुरू हो चुकी हैं। प्रबंधन से श्रमिक संगठन तक अधिकांश सदस्य नए नवेले हैं। इसका परिणाम क्या हो सकता है भला। एक पुराने सदस्य की सुनिये- लग रहा था मानो किसी क्षेत्रीय जीएम के साथ बैठक करने आए हों। कुछ ने तो टेबल ठोक के कह दिया कि यह मांग माननी ही होगी। मांगें भी ऐसी जिनका इस कमेटी से लेना देना नहीं। यह कमेटी नियमित कर्मचारियों के वेतन वृद्धि के लिए बनी है और सदस्य ठेका मजदूरों की मांग लिए बैठे थे। मजेदार यह कि जिन मांगों की चर्चा कर रहे थे उन पर पहले ही कार्रवाई हो चुकी है। दो-दो मिनट का समय दिया गया लेकिन भाइयों ने भाषण पूरा कर के ही दम लिया। अब दिग्गज यह देख कर भौंचक हैं कि इन बेसिर पैर की मांगों पर भी इंटरनेट मीडिया में समर्थकों की वाहवाही की झड़ी लगी है। 

मजदूर का काम खत्म

शिवपाल राम झरिया पुनर्वास व विकास प्राधिकार के बेलगढ़िया स्थित फेज थ्री के एक क्वार्टर में रहता था। कल उसकी मौत हो गई। शव क्वार्टर में यूं ही पड़ा हुआ है। पड़ोसियों ने तहकीकात की तो पता चला बीसीसीएल का मजदूर है। घनुआडीह क्वार्टर में काम करता था। वहां उसे कंपनी का आवास भी मिला हुआ है। परिवार उत्तर प्रदेश में रहता है। शिवपाल परिवार और कंपनी आवास छोड़कर यहां क्यों और कैसे रहता था। पता चला है कि यहां के केयर टेकर ने 1000 रुपये में आवास दिया था। बताते हैं कि एक व्यक्ति उसे ड्यूटी ले जाता था और लाकर छोड़ जाता था। सर्विस बुक, पासबुक सब उसी के पास है। राम के मरने के बाद से नहीं आया है। ऐसे भी अब वह उसके किस काम का रहा जो पूछने आए। काम के सारे कागजात तो हैं ही। कोयला मजदूरों की त्रासदी यही है। 

जंगल में मोर नाचा, किसने देखा...

तो छोड़िये मोर के नाचने की बात। खुद नाचने के इच्छुक हैं तो इसकी व्यवस्था भी की गई है। खदानों के धूल भरे रास्तों पर चलते-चलते थक गए हों तो दो पल का सुकून देने की व्यवस्था यहां की गई है। कतरास क्षेत्र के पारसनाथ पार्क चले आइये। ओबी के पहाड़ पर हरियाली की चादर बिछाई गई है। खदान के पानी को संजोकर बनाए गए तालाब में कलरव करते पक्षी आपका मन मोह लेंगे। खुद भी अठखेलियां करना चाहें तो जरा और ऊपर चढ़िये, यहां हाल ही में रेन डांस की भी व्यवस्था की गई है। फव्वारे के साथ साउंड सिस्टम भी है। तो मोर नाचा कि नहीं कौन पूछता है, खुद ही नाचिए और मजे कीजिए। हालांकि लाकडाउन की वजह से फिलहाल कुछ पाबंदियां हैं, लेकिन नौजवान जोड़ों को कौन रोकता है। वह तो अब भी अठखेलियां करने गेट फांद कर आ ही रहे हैं।

 

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