International Day Of Persons With Disabilities 2021: हिम्‍मत से बढ़ाया कदम तो जिंदगी में भरने लगे रंग, पढ़ें-झरिया की रिंकी की कहानी

International Day Of Persons With Disabilities 2021 रिंकी को भी अहसास था कि जिंदगी बदरंग हो गई है। जीवन में अंधियारा है मगर जानती थी कि हिम्‍मत से जिंदगी खुशरंग हो सकती है। हौसले का हथियार इस जंग में कारगर होगा।

MritunjayFri, 03 Dec 2021 08:43 AM (IST)
अपनी मां मुन्‍नी के साथ रिंकी कुमारी ( फोटो जागरण)।

राजीव शुक्‍ला, धनबाद। International Day Of Persons With Disabilities 2021: 18 साल की रिंकी कुमारी। धनबाद के भागा पांच नंबर में रहती है। जन्‍म से ही सेरेब्रल पाल्‍सी की शिकार। चलने ही नहीं बोलने में भी असमर्थ। बचपन से ही गरीबी में आंखें खोलीं। पिता लखन माली का साया सिर से उठ गया था। मां मुन्‍नी बिटिया का दर्द देख रोती थी। मजदूरी कर परिवार चलाने वाले भाई पिंटू व रंजन भी उसकी पीड़ा से बिलख उठते थे। रिंकी को भी अहसास था कि जिंदगी बदरंग हो गई है। जीवन में अंधियारा है, मगर जानती थी कि हिम्‍मत से जिंदगी खुशरंग हो सकती है। हौसले का हथियार इस जंग में कारगर होगा। दस साल पहले झरिया रिसोर्स सेंटर (दिव्‍यांग बच्‍चों का पुनर्वास केंद्र) के फ‍िजियोथेरेपिस्‍ट डा मनोज सिंह, रिसोर्स शिक्षक रोशन कुमारी व अखलाक अहमद उसके घर पहुंचे। तीनों ने घर पर ही उसकी शिक्षा शुरू की। एक्‍सरसाइज कराई, हिम्‍मत भरी, फ‍िर क्‍या था। शुरू हो गई उसकी पढ़ाई। इसी वर्ष रिंकी ने हाई स्‍कूल की परीक्षा में प्रथम श्रेणी से एसई रेलवे हाईस्‍कूल से उत्‍तीर्ण कर साबित कर दिया कि असंभव कुछ भी नहीं।

रिसोर्स सेंटर में बढ़ रहे 35 दिव्यांग

सिर्फ रिंकी ही नहीं रिसोर्स सेंटर में 35 दिव्‍यांग बच्‍चे सामान्‍य जीवन जीने की राह में शिद्दत से बढ़ रहे हैं। डा मनोज व अखलाक बताते हैं कि हम लोग झरिया इलाके के दिव्‍यांग बच्‍चों की तलाश कर रिसाेर्स सेंटर में लाते हैं। उनकी छिपी प्रतिभा को तराश कर सामान्‍य जीवन जीने को अग्रसर करते हैं। ऐसे बच्‍चों को निश्‍शुल्‍क शिक्षा दी जाती है। जब रिंकी के घर गए थे तो वह बि‍स्‍तर पर ही रहती थी। बोल नहीं सकती थी। एक साल तक फ‍िजियोथेरेपी के सहारे उसे कुछ चलने लायक बनाया। फ‍िर रिसोर्स सेंटर लाना शुरू किया। अब वह पूरी लगन से पढ़ रही है। बेशक उसे बोलने में तकलीफ है, मगर उसे हर बात जल्‍द याद हो जाती है। बस इसी गुण काे तराशा, नतीजा वह हाईस्‍कूल परीक्षा उत्‍तीर्ण कर अब 11 वीं में पहुंच गई है।

शिक्षक बनना चाहती है पम्‍मी

रिसोर्स सेंटर में आ रही पम्‍मी की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। बचपन से ही वह बोल नहीं पाती थी। सेरेब्रल पाल्‍सी की शिकार होने के कारण उसे सभी मंद बुद्धि कहते थे। उसे भी डा मनोज ने फ‍िजियोथेरेपी चिकित्‍सा दी। जब वह कुछ कुछ चलने लगी तो घर वाले रिसोर्स सेंटर लाने लगे। यहां उसकी विशेष कक्षाओं के सहारे पढ़ाई शुरू कराई गई। मेहनत रंग लाई, वह नवीं कक्षा में पढ़ रही है। हालांकि उसकी जुबान आज भी लड़खड़ाती है, मगर कई कविताएं वह कंठस्‍थ कर चुकी है। वह कहती है कि पढ़ लिखकर शिक्षिका बनेंगे, दिव्‍यांग बच्‍चों को पढ़ाएंगे। ताकि वे भी सामान्‍य जीवन जी सकें। रिसोर्स सेंटर में पढ़ रही अर्पिता भी मान‍सिक रूप से कमजोर थी। रिसाेर्स शिक्षकों के प्रयासों से अब वह नवीं कक्षा में पढ़ रही है। धनबाद में नौ रिसोर्स सेंटर हैं, जहां दिव्‍यांग बच्‍चों का जीवन संवारा जा रहा है।

हिम्‍मत करिए, हर जंग में मिलेगी जीत

बकौल रिंकी, उसे उम्‍मीद ही नहीं थी कि वह सामान्‍य जीवन जी सकेगी। रिसोर्स सेंटर आने के बाद अहसास हुआ कि असंभव तो कुछ भी नहीं है। हिम्‍मत तो करिए। हमने हिम्‍मत की तो परिणाम सुखद आए। तालीम हर इंसान के लिए जरूरी है। खूब पढ़ूंगी, परिवार का नाम रोशन करूंगी। दिव्‍यांग बच्‍चों के अभ‍िभावक भी जागरूक हों, यह न सोचें के उनका बच्‍चा कमजोर है, जिंदगी जीने में असफल होगा, उसे उनको रिसोर्स सेंटर में लाना चाहिए, जहां उसकी जिंदगी शिक्षकों के प्रयासों से निश्चित ही तालीम के नूर से भर जाएगी। वे भी सामान्‍य जीवन जी सकेंगे।

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