बेटी को था टाइफाइड, फिर भी करती रही कोरोना पीड़ितों की सेवा

बेटी को था टाइफाइड, फिर भी करती रही कोरोना पीड़ितों की सेवा

बच्चों की अक्सर याद आती है मुझे भी घर जाने का मन करता है। लेकिन क्या करुं यहा भी जो भर्ती है वह भी किसी के बच्चे हैं। उनकी मा को भी इनकी चिंता होती रहती होगी। मैं भी मा हूं और इनकी मा पर इस समय क्या बीत रही होगी मैं अच्छे से जानती हूं। यह कहना है कि धनबाद के भूली स्थित भूली रेलवे रिजनल ट्रेनिंग कोविड सेंटर में तैनात नर्स सुनीता देवी का।

JagranSun, 09 May 2021 06:12 AM (IST)

अभिषेक पोददार, धनबाद

बच्चों की अक्सर याद आती है, मुझे भी घर जाने का मन करता है। लेकिन क्या करुं यहा भी जो भर्ती है, वह भी किसी के बच्चे हैं। उनकी मा को भी इनकी चिंता होती रहती होगी। मैं भी मा हूं और इनकी मा पर इस समय क्या बीत रही होगी, मैं अच्छे से जानती हूं। यह कहना है कि धनबाद के भूली स्थित भूली रेलवे रिजनल ट्रेनिंग कोविड सेंटर में तैनात नर्स सुनीता देवी का। वह यहा कोरोना की दूसरी लहर में खोले गए कोविड सेंटर में पिछले एक माह से सेवा दे रही है।

भूली ए ब्लॉक की रहनेवाली सुनीता बताती है कि उनका एक 13 साल का बेटा और एक 11 साल की बेटी है। लेकिन पिछले एक माह से घर भी नहीं गई है। इस दौरान उनकी बेटी को टाइफाइड भी हुआ, तब भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अपनी बेटी को अपनी मा के भरोसे छोड़ कर यहा लोगों की सेवा करती रहीं। वह बताती हैं कि वहा मेरी मा है, जो मेरी बेटी की देखभाल कर सकती है, लेकिन यहा तनाव भरे माहौल में कोई किसी का नहीं है। ऐसे में हम नर्स और डॉक्टर ही हैं, जो इनकी हिम्मत बढ़ाते हैं। वह बताती है कि हालाकि अब उनकी बेटी लगभग ठीक हो चुकी है, थोड़ी कमजोरी है। जो धीरे-धीरे ठीक हो जाएगी। रोज वीडियो कॉल पर होती है बात

सुनीता बताती हैं कि वह यहां अपने सहकर्मी के साथ ही रहती हैं। जब भी बच्चों की याद आती है वीडियो कॉल से उनसे बात कर लेती हूं। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि बच्चे फोन करते हैं लेकिन काम में बिजी होने के कारण फोन नहीं उठा पाती। बाद में फोन करने पर बच्चे रोने भी लगते हैं। मुझे भी रोना आता है लेकिन अगर मैं ही हिम्मत हार गई तो इन बच्चों को हिम्मत कौन देगा यह सोचकर अपने आसू रोक लेती हूं। बेटी की टाइफाइड होने के समय की बात करते हुए वह बताती हैं कि उस समय रोज बेटी फोन कर कहती थी कि मा आ जाओ, क्या तुम्हें मेरी चिंता नहीं है। उस समय मन में भी आता था कि नौकरी छोड़कर बेटी के पास चली जाऊं। लेकिन फिर अपने कर्तव्य और मरीजों की स्थिति को देखते हुए ऐसा नहीं कर पाती थी। अच्छा लगता है जब कोई ठीक होकर घर जाता है

सुनीता बताती हैं कि सेंटर में बड़ों के साथ-साथ कई बच्चे व युवा भी संक्रमित होकर पहुंचे। इस दौरान वह बहुत रोते थे, उन्हें अक्सर घर की याद आती थी। इस समय हमें उनका मनोबल ऊंचा रखना पड़ता था। उनका बच्चों जैसा ख्याल रखना पड़ता था। हम अक्सर ऐसे मरीजों से ज्यादा देर तक बातें करते थे। इसका सकारात्मक परिणाम भी सामने आता था। वह जल्दी ठीक होकर अपने घर भी लौटे। इस दौरान कई लोग घर पहुंचने पर अक्सर हमें फोन कर हमारा हाल चाल पूछते हैं। कई लोगें ने अपने स्वजनों और मा से भी बात कराई। उन्होंने हमें धन्यवाद भी दिया। कई स्वजन इस दौरान रोने लगते हैं, वह क्षण हमारे लिए भी काफी भावुक हो जाता है। सेंटर में हर एक मौत हमें हिला देती है

सीमा बताती हैं कि सबसे ज्यादा दुख तब होता है कि जब हम किसी मरीज को बचा नहीं पाते। वह दिन हमारे लिए सबसे कठिन होता है। साथ ही यह भी डर लगता है कि जब सबकुछ ठीक हो गया और बाहर जब किसी मृतक के स्वजन हमें मिले तो हम उन्हें क्या जवाब देंगे।

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