पांचवी पास अनीता बत्तख पालन कर ऐसे कमा रही हजारों; कोरोना काल में मह‍िलाओं के ल‍िए बनी म‍िसाल Dhanbad News

पिछले वर्ष कोरोना महामारी को रोकने के लिए सरकार द्वारा लॉकडाउन लगाया गया था। (प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर)

कोरोना महामारी कई लोगों के लिए आपदा में अवसर लेकर आई है। पिछले वर्ष कोरोना महामारी को रोकने के लिए सरकार द्वारा लॉकडाउन लगाया गया था। इसे निरसा प्रखंड के बेलकुप्पा गांव के भातुडीह सिंह टोला की रहने वाली अनीता सिंह ने अवसर में बदल दिया।

Atul SinghSun, 09 May 2021 10:31 AM (IST)

निरसा, संजय सिंह: कोरोना महामारी कई लोगों  के लिए आपदा में  अवसर लेकर आई है। पिछले वर्ष कोरोना महामारी को रोकने के लिए सरकार द्वारा लॉकडाउन लगाया गया था। इसे निरसा प्रखंड के बेलकुप्पा गांव के भातुडीह सिंह टोला की रहने वाली अनीता सिंह  ने अपने पति,  सास व ससुर के सहयोग से अवसर में बदल दिया।

उन्होंने बत्तख पालन का स्वरोजगार शुरू किया और मात्र छह  महीने में लागत से दुगना आमदनी कर एक मिसाल कायम किया है। अमिता सिंह के इस कदम से  उनके गांव के लोग प्रभावित हैं और कई ग्रामीण बत्तख पालन कर अपना स्वरोजगार स्थापित करने  की दिशा में कदम बढ़ा चुके हैं। 

अनीता सिंह ने बताया कि उसकी शादी वर्ष 2005 में सिंह टोला निवासी सुनील सिंह के साथ हुई थी।  पति पश्चिम बंगाल के रानीगंज में प्रिंटिंग ऑपरेटर का काम करते हैं।  वर्ष 2020 में कोरोना महामारी के कारण लॉकडाउन लगने के बाद  पति भी घर पर ही रहने लगे। इसी दौरान हम दोनों ने बत्तख पालन की योजना बनाई क्योंकि हम लोगों के घर में छोटे पैमाने पर बत्तख पालन होता था जिसका अनुभव मुझे  था।  मेरे पति पश्चिम बंगाल में काम करते थे।  उनके कई दोस्त बत्तख पालन से जुड़े हुए हैं। उनसे उन्हें जो जानकारी मिली थी उसे उन्होंने हमारे साथ साझा किया। जुलाई 2020 में  पति बिहार के मुजफ्फरपुर से लगभग ढाई सौ बत्तख के चूजे ले आए। हमारे खेत में लघु सिंचाई विभाग से सौ बाई सौ फीट का  तालाब था। उसी की मेंढ पर हम लोगों ने बत्तख पालन के लिए स्वयं  से शेड  का निर्माण किया। उसके बाद  बतख पालन का व्यवसाय शुरू हो गया।

 बत्तख पालन मुर्गी पालन से ज्यादा आसान व लाभदायक

अनीता सिंह ने बताया कि हम लोगों ने इंडियन रनर व  खाकी कैंपबेल प्रजाति का बत्तख का पालन शुरू किया। बत्तख पालन मुर्गी पालन से ज्यादा आसान व ज्यादा मुनाफा देने वाला व्यवसाय है। बत्तख के चूजे जब छोटे होते हैं। उस वक्त टीकाकरण आवश्यक होता है ताकि यह बीमारियों से बचे रह सके। 1 से 6 सप्ताह के चूजों की हिफाजत ज्यादा करनी पड़ती है। इस दौरान ही चूजे ज्यादा मरते हैं। हम लोगों ने भी सभी चूजों का टीकाकरण करवाया था। बतख में मुर्गियों के मुकाबले बीमारी कम होती है। इस कारण दवा का खर्च भी बचता है। परंतु अनुभव की कमी के कारण लगभग  60 से 70 चूजे  मर गए थे। ढाई सौ चूजे की लागत लगभग ₹35000 आई  थी । शुरुआत में बत्तख के चुजों को जो मुर्गी का दाना दिया जाता है वही देना पड़ता है। बाद में जब वह कुछ बड़े हो जाते हैं तो उसे चावल की टुकड़े, धान, गेहूं के टुकड़े, चावल, बाजरा जो भी देंगे वह आसानी से खा लेता है।

सिर्फ अंडा बेचकर कमाए 20 हजार रुपये

अनीता सिंह ने बताया कि बत्तख 4 महीने बाद अंडा देना शुरू कर देता है। ठंडा के समय में बत्तख के अंडों की ज्यादा डिमांड होती है ।  उस समय अच्छी कीमत भी मिलती है। नवंबर से  अंडों की बिक्री शुरू की थी। वर्तमान समय तक लगभग ₹20000 का अंडा बेच चुकी हूं। ठंडा के समय लगभग डेढ़ किलो का एक बत्तख ₹500 में बिकता है। 4 से 5 माह में बत्तख डेढ़ किलो से ऊपर का हो जाता है। दिसंबर, जनवरी एवं फरवरी में मैंने लगभग डेढ़ सौ बतख की बिक्री की। बत्तख की बिक्री हर मास में होती है। परंतु ठंडा के समय इसकी बिक्री ज्यादा होती है। साथ ही बत्तख का दाम भी ज्यादा मिलता है। अभी भी मेरे पास लगभग 20 बत्तख हैं। वह भी प्रतिदिन लगभग 15 से 17 अंडे देते हैं। बत्तख एवं उसके अंडे की बिक्री के लिए मुझे बाजार नहीं जाना पड़ता। आसपास के ग्रामीण स्वयं आकर घर से बत्तख एवं अंडे ले जाते हैं।

इस वर्ष दुगने पैमाने पर बत्तख पालन की योजना 

अनीता सिंह ने बताया कि इस वर्ष जुलाई में दुगने पैमाने पर बत्तख पालन की योजना  है। इस वर्ष 500 बताते चुजे पालन की योजना बनाई गई है। यदि सरकार द्वारा बत्तख पालने का शेड मिल जाता तो बतख पालन में काफी आसानी होती।

बतख काफी समझदार होते 

अनीता सिंह ने बताया कि बत्तख काफी समझदार होते हैं। वर्तमान समय में मेरे तालाब का पानी सूख गया है इसलिए बत्तख को प्रतिदिन नदी ले जाना पड़ता है। एक बार बत्तख जिस रास्ते से जाता है। वह स्वयं उसी रास्ते से वापस अपने घर आ जाता है। खाकी कैंपबेल प्रजाति ज्यादा अंडे देती है। साथ ही खाकी कैंपवेल बत्तख काफी शोर मचाता है। यदि कोई जंगली जानवर या चोर बाड़े में घुस जाता है तो वह इतना शोर मचाने लगता है कि  रखवाली कर रहे स्वजनों को आसानी से नींद खुल जाती है।

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