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चिड़काधाम में नहीं होगी कांवर यात्रा

जागरण संवाददाता, बोकारो : कोरोना संक्रमण के कारण मंदिरों के बंद रहने से इस बार सावन में पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिला स्थित चिड़काधाम के लिए कांवर यात्रा नहीं निकलेगी। यहां राज्य सरकार की गाडइलाइन के अनुसार ही पूजा अर्चना होगी। जबकि, सावन के महीने में एक ओर जहां बैद्यनाथधाम में जलार्पण की प्रक्रिया सदियों से चली आ रही है। वहीं निकटवर्ती पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिला स्थित चिड़काधाम में बूढ़ाबाबा शिवलिग के प्रति भी स्थानीय समेत दूरदराज के हजारों शिवभक्तों की आस्था जुड़ी हुई है। दामोदर नदी एवं गरगा नदी से जल लेकर चास-चंदनकियारी समेत झरिया, धनबाद के अलावा निकटवर्ती पश्चिम बंगाल के हजारों शिवभक्त चंदनकियारी व चास के रास्ते चिड़काधाम स्थित बूढ़ाबाबा शिवलिग पर वर्षो से कांवर लेकर जलार्पण को जाते रहे हैं। इस वर्ष कोरोना के कारण यहां कांवर यात्रा नहीं होगी। ऐसे में नियमित रूप से प्रत्येक वर्ष चिड़काधाम जाने वाले श्रद्धालुओं के लिए विषम स्थिति पैदा हो जाएगी। वहीं यहां दर्शन व जलार्पण के लिए जाने वाले अन्य लोग भी प्रभावित होंगे। ------------

कैसे हुआ बूढ़ा बाबा का प्रादुर्भाव : बूढ़ाबाबा धाम की कहानी इस प्रकार है। पुरुलिया के चिड़का गांव में रह रहे फणी महतो के पास एक कामधेनु गाय थी। अभी जिस स्थान पर बूढ़ा अवस्थित है, वहां पहले घनघोर जंगल था। वहां ढेला (एक प्रकार का पेड़) का पेड़ प्रचुर मात्रा में हुआ करता था। गांव का चरवाहा उस गाय को चराया करता था। एक दिन की बात है कि वह गाय दौड़ती हुई ढेला के जंगल में समा गई। वहां गाय का सारा दूध थन से स्वत: समाप्त हो गया। ऐसा कई दिनों तक चलता रहा। यह देख गाय का मालिक चितित हो गया। इस बीच उन्होंने करीब सात चरवाहों को बदला, परंतु कोई फायदा नहीं हुआ। अंत में गाय मालिक खुद गाय चराने ले गया। उसके सामने भी यही घटना हुई। गाय का मालिक यह देख स्तब्ध रह गया। उस रात जब गाय का मालिक सोया हुआ था तो बाबा सपना में आए और कहा कि तुम्हारी गाय जहां प्रतिदिन जाती है, उसके नीचे धरती में हम स्थित हैं। हम लोग हर और गौरी हैं। सुबह कामधेनु गाय का मालिक उठा और उस जगह को खोद डाला, लेकिन बाबा का कोई पता नहीं चला। दूसरी रात पुन: गाय का मालिक सो गया। इस बार बाबा ने सपने में उससे कहा कि तुम बड़दाहा गम्हरिया के बूढ़ा और बूढ़ी को ले आओ, तब में निकलूंगा। उसने वैसा ही किया। बूढ़ा-बूढ़ी के एक कुदाल चलाने मात्र से उस जगह से दूध की धारा बहने लगी और बाबा वहीं स्थापित हो गए। फिर आकाशवाणी हुई कि हमलोगों को चिड़का और रुद्रा में स्थापित करो। फिर पुआल की छावनी बनाकर वहां पूजा-अर्चना होने लगी।

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कारोबार होगा प्रभावित : चास-चंदनकियारी के रास्ते प्रतिवर्ष सावन के महीने में रोजाना हजारों की संख्या में शिव भक्त कांवर यात्रा करते हैं। जिससे स्थानीय दुकानदारों व व्यापारियों को महीने भर में अच्छी कमाई भी हो जाती है। जो इसबार पूरी तरह ठप रहेगी। वहीं, चिड़का बाबा धाम जाने वाले कांवरियों के लिए पूरे रास्ते में विभिन्न संगठन सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा सेवा शिविर लगाया जाता था। शिविर में कांवरियों के लिए चाय, पानी, बिस्कुट, गरम पानी आदि की व्यवस्था की जाती थी। इसके अलावा दवाई, प्राथमिक उपचार और एंबुलेंस की भी व्यवस्था रहती थी। --------

क्या कहते हैं पुजारी : चिड़काधाम शिव मंदिर के पुजारी गोवर्धन पंडा एवं प्रणव कुमार पांडेय ने बताया कि इस बार कोविड-19 के कारण यहां श्रद्धालुओं की भीड़ नहीं के बराबर हो सकती है। अभी मंदिर में पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा जारी किए गए गाइडलाइन के मुताबिक पूजा-अर्चना के दौरान शारीरिक दूरी व मास्क अनिवार्य कर दिया गया है। मंदिर में प्रवेश से पहले श्रद्धालुओं के हाथों को सैनिटाइज किया जा रहा है।

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