Rajouri Day 2021: छह माह तक मौत के तांडव के बाद राजौरी में आई थी उम्मीदों की नई सुबह

राजौरी नरसंहार की स्‍मृति में हर वर्ष शहीदी चौक पर शहीदों को श्रद्धांजलि दी जाती है।

कबाइलियों ने राजौरी शहर में घुसते ही लूटपाट शुरू कर दी थी। 7 नवंबर 1947 से आरंभ हुआ कत्लेआम 12 अप्रैल 1948 तक चलता रहा। 11 नवंबर 1947 को देश में आजादी के बाद पहला दीपावली का पर्व मनाया जा रहा था राजौरी खून की होली खेल रहा था।

Vikas AbrolTue, 13 Apr 2021 05:00 AM (IST)

गगन कोहली, राजौरी : जम्मू कश्मीर पर पाकिस्तान की बुरी नजर आजादी के बाद से ही थी। अक्टूबर 1947 में जम्‍मू कश्‍मीर को कब्‍जाने के लिए सेना के नेतृत्‍व में किया गया कबाइली हमला उसी साजिश का हिस्सा था। 26 अक्टूबर 1947 को महाराजा हरिसिंह के विलयपत्र पर हस्ताक्षर करते ही भारतीय फौज कश्मीर को संकट से बचाने के लिए श्रीनगर में उतर गई। कबाइलियों और उनके भेष में घुसे पाकिस्तानी सैनिकों को कश्‍मीर से खदेड़ा जाने लगा पर मीरपुर से आगे कबाइली राजौरी की ओर बढ़ आए। इसके बाद छह माह तक राजौरी में मौत का खेल खेला जाता रहा। भारतीय इतिहास में सबसे भीषण नरसंहार में से एक राजौरी में 30 हजार से अधिक हिंदुओं और सिखों का सड़कों पर कत्लेआम कर दिया गया। औरतें अस्मत बचाने के लिए कुएं में कूद गईं या जहर खाकर जान दे दी।

12 अप्रैल 1948 की रात तक यही सिलसिला चलता रहा और 13 अप्रैल की सुबह नया सवेरा लेकर आई और जब भारतीय सेना ने राजौरी को आतंक से मुक्त करवा लिया। हजारों कुर्बानियों को भले ही देश ने बिसार दिया हो लेकिन आज सेना इसे शौर्य दिवस के तौर पर मनाती है और शहीदों को श्रद्धांजलि दी जाती है।

जब देश में थी दीवाली, राजौरी में थी खून की होली

कबाइलियों ने राजौरी शहर में घुसते ही लूटपाट शुरू कर दी थी। 7 नवंबर 1947 से आरंभ हुआ कत्लेआम 12 अप्रैल 1948 तक चलता रहा। हजारों लोग जान बचाने के लिए पहाड़ों और जंगलों में छिपे रहे। 11 नवंबर 1947 को देश में आजादी के बाद पहला दीपावली का पर्व मनाया जा रहा था और राजौरी कबाइलियों के जुल्म में जल रहा था। बताया जाता है कि एक दिन में तीन हजार से अधिक हिंदुओं और सिखों की हत्या कर दी गई। सिंह सभा और राष्ट्रीय स्वयं संघ के वीरों ने अपने परंपरागत हथियारों से जमकर लोहा लिया पर उनके हथियार भी अधिक समय तक साथ नहीं दे पाए और ज्यादातर योद्धा कबाइलियों से जूझते हुए शहीद हो गए।

तहसीलदार जवानों को लेकर भाग गया रियासी
उस समय राजौरी के तहसीलदार हरजी लाल हमला होते ही शहर में तैनात गोरखा राइफल के बीस जवानों को अपने साथ लेकर रियासी भाग गया। ऐसे में महीनों तक राजौरी को उसके हाल पर छोड़ दिया गया।



आज भी याद है वह क्रंदन
उस समय 10 वर्ष के रहे कुलदीप राज गुप्ता उस भयानक मंजर को याद कर आज भी कांप उठते हैं। उनका कहना है कि आज भी मुझे बच्चों का क्रंदन सुनाई देता है। आरएसएस व सिंह सभा के सदस्यों ने मुकाबला किया, उनके हथियार भी खत्म हो गए। इस लड़ाई में उनके पिता के साथ परिवार के कई सदस्य मारे गए।

नहीं थमते आंसू
कृष्‍ण लाल गुप्ता कहते हैं कि कबाइलियों ने राजौरी पर बहुत कहर बरपाया, जो मिला उसे मौत के घाट उतार दिया। उनका कहना है कि आज भी जब वह मंजर याद आता है तो आंखों से आंसू अपने आप बहने लगते हैं। महिलाओं को कुएं में कूदकर जान देनी पड़ी या फिर परिवार के लोगों ने अपने हाथों से बहू-बेटियों को जहर दे दिया। आज उस कुएं की जगह पर बलिदान स्‍थल का निर्माण किया गया है।

राणै के शौर्य के आगे हर साजिश हुई विफल
भारतीय सेना ने राजौरी से मुक्त करवाने के लिए मुहिम पर निकली तो कबाइलियों के पैर अधिक देर नहीं टिक पाए। नौशहरा से पीछे हटते हुए पाकिस्तानी सेना ने पग-पग पर साजिशें रच रखी थीं लेकिन डोगरा रेजिमेंट के सेकेंड लेफ्टिनेंट राम राघोबा राणै के शौर्य और सूझबूझ के आगे हर साजिश विफल हो गई। भारतीय सेना के इंजीनियङ्क्षरग कोर में अधिकारी के तौर पर उन्हें 15 दिसंबर 1947 को उन्हें कमीशन मिला। पाकिस्तान सेना और कबाइलियों को राजौरी से खदेडऩे के लिए आठ अप्रैल 1948 को डोगरा रेजिमेंट के जवानों व अधिकारियों ने नौशहरा से राजौरी की तरफ मार्च किया था। पाकिस्तानी सेना ने रास्ते में बारूदी सुरंगें बिछा रखी थीं और पेड़ काटकर सड़क पर फेंक दिए थे। घायल होने के बावजूद राणै बारूदी सुरंगें हटाते हुए सेना के लिए रास्ता बनाते रहे।
उनकी बदौलत ही भारतीय सेना राजौरी में प्रवेश कर पाई। इसके लिए उन्हेंं शौर्य के लिए परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। उनके नाम से ही हवाई पट्टी है।

मंडी चौराहे व राणै हवाई पट्टी सेना मैदान पर कार्यक्रम

प्रत्येक वर्ष 13 अप्रैल को शहर में बने शहीदी स्मारक और राणै हवाई पट्टी पर श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किया जाता है। इसमें सैन्य अधिकारी, धर्म गुरु, प्रशासनिक अधिकारी व आम लोग प्रार्थना सभा में भाग लेते हैं।

 

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