गुरु-शिष्य का रिश्ता पवित्रता का विशुद्ध प्रेम संबंध

जागरण संवाददाता कठुआ गुरु पूर्णिमा का पर्व अभी भी कई धार्मिक स्थलों पर मनाए जाने का क्रम जा

JagranSun, 01 Aug 2021 12:43 AM (IST)
'गुरु-शिष्य का रिश्ता पवित्रता का विशुद्ध प्रेम संबंध'

जागरण संवाददाता, कठुआ: गुरु पूर्णिमा का पर्व अभी भी कई धार्मिक स्थलों पर मनाए जाने का क्रम जारी है। इसी क्रम में शनिवार को नौनाथ घगवाल स्थित श्री अखंड परमधाम आश्रम में गुरु पूर्णिमा पर हजारों शिष्यों ने अपने गुरु के प्रति आस्था जताते हुए आशीर्वाद प्राप्त किया।

मौके पर आचार्य महामण्डलेश्वर स्वामी परमानंद गिरी जी महाराज के शिष्य संत सुभाष शास्त्री जी महाराज ने श्रद्धालुओं को बताया कि गुरु पूर्णिमा (व्यास पूर्णिमा) विश्वभर में मनाया जाता है। उन्होंने कहा कि गुरु-शिष्य का संबंध पवित्रता का विशुद्ध प्रेम है। परस्पर दोनों एक दूसरे से प्रेम करते हैं। ये वासना का नहीं, बल्कि साधना, आराधना व उपासना का संबंध है। ये भोग का नहीं, ये योग का, स्वार्थ का नहीं परमार्थ का संबंध है। जहां स्वार्थ है, वहां परमार्थ नहीं होता है। गुरु पूजा में शिष्य चाहता है, मैं गुरु जी को क्या भेंट दूं, तन, मन, धन से क्या सेवा करुं कि सदगुरु मुझ पर प्रसन्न हो जाए और गुरु सोचते है कि हम शिष्य को क्या दें, क्या लौटाएं जिससे शिष्य का कल्याण हो जाए।

जबकि सदगुरु सदैव यहीं चाहते हैं कि जैसी ²ष्टि जैसी निष्ठा, जैसी समझ, जैसा बोध और आनंद मुझे मिला है, वैसा मेरे शिष्य को प्राप्त हो जाए। गुरु अपने जैसा शिष्य को देखकर प्रसन्न होते हैं। जैसे भक्ति प्रभु के प्रति होती है, वैसी ही गुरु के प्रति भी हो, गुरु भगवान है और भगवान ही गुरु है। अध्यात्म का श्री गणेश सदगुरु से ही होता और जब जीवन में अध्यात्म का विकास होता है तो फिर शिष्य का चहुंमुखी विकास होता है। अध्यात्म पथ पर सदगुरु ही अग्रसर करते हैं, तभी तो प्रभु भी खुद के बजाय सर्वप्रथम गुरु को पूजने की बात करते है। उन्होंने कहा कि हमारी मां प्रथम गुरु होती है। जीवन के हर विषय के लिए गुरु होते हैं- धर्म के लिए धर्म गुरु, योग के लिए योग गुरु, परिवार के लिए कुलगुरु, किसी विषय अध्यण के लिए विद्या गुरु, राज्य के लिए राज गुरु और अध्यात्म- ब्रह्मविद्या के लिए सदगुरु की जरूरत होती है और एक ही साम‌र्थ्य गुरु में ये सब गुण भी हो सकते हैं।

मनुष्यों में, मनुष्यों मात्र का गुरु ब्रह्मज्ञानी- सन्यासी है। चारो वर्णों का गुरु ब्रह्मज्ञानी ब्राह्मण है अक्षरों-वर्णों में ओंकार गुरु है। रेंगने वालों का सर्प गुरु, हिसक जानवरों का गुरु शेर, जलचरों का कच्छुआ गुरु है। धर्म ग्रंथों का गुरु श्रीमद् भागवत गीता है जो गीता को ठीक तरह से समझ लेता है, वे सारे ग्रंथों का सार निकाल सकता है अर्थात सबको समझ सकता है। धर्म ग्रंथों में जो भी अच्छी बाते हैं वे लगभग भगवान श्री वेद व्यास जी द्वारा कहीं गई है। ऐसे अवतारों- ऋषियों के हम ऋणी है, इसलिए उनके वचनों के अनुसार ही चलें।

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