Article 370 के बाद वोट का अधिकार मिलने पर बोले पाकिस्‍तान से आए परिवार, यह नीली स्याही नहीं...खुद के होने का अहसास है

पश्चिमी पाकिस्तान रिफ्यूजियों ने जम्मू-कश्मीर में पहली बार किया मतदान

अखनूर तहसील में पश्चिमी पाकिस्तान रिफ्यूजियों के करीब 100 परिवार है जो आजादी के बाद से ही जम्मू-कश्मीर में मतदान से वंचित थे। अब अनुच्छेद 370 व 35 ए समाप्त होने और जम्मू-कश्मीर के केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद इन परिवारों ने भी मतदान प्रक्रिया में हिस्सा लिया।

Publish Date:Sat, 28 Nov 2020 01:02 PM (IST) Author: Rahul Sharma

अखनूर, रमण शर्मा। सात दशक से अपनी उम्मीदों का सपना संजोए इन लोगों ने जब अपनी अंगुली पर नीली स्याही देखी तो मानो इन्होंने जग जीत लिया। पहली बार खुद के होने का अहसास हुआ कि वह भी जम्मू कश्मीर के बाशिंदे हैं। ये लोग कोई और नहीं, बल्कि देश के विभाजन के समय पश्चिम पाकिस्तान से आए अपने लोग हैं।

इन लोगों को लोकसभा चुनावों में मतदान करने का तो अधिकार था, लेकिन जम्मू कश्मीर में किसी भी स्थानीय चुनाव में हिस्सा नहीं ले सकते थे। इन्हें तो जम्मू कश्मीर का निवासी ही नहीं माना जाता था। अनुच्छेद 370 हटने के बाद जंजीरें टूटी तो खुला आसमान मिल गया। यह वह लोग हैं, जिन्होंने बचपन से बुढ़ापे तक लोगों को वोट डालते ही देखा था, लेकिन अब नजर धुंधली हाने के बावजूद लोकतंत्र के इस उत्सव में अपनी पसंद का नुमाइंदा चुनकर आए हैं। जिला विकास परिषद चुनाव में वह पहली बार प्रदेश स्तर की चुनाव प्रक्रिया का हिस्सा बने हैं।

जम्मू कश्मीर में जिला विकास परिषद के चुनाव शनिवार से शुरू हो गए हैं। आठ चरणों में ये चुनाव 19 दिसंबर तक चलेंगे। इनके साथ पंचायत और निकाय उपचुनाव भी हो रहे हैं। पाकिस्तान से आए लोग जम्मू कश्मीर में होने वाले किसी स्थानीय चुनाव में पहली बार हिस्सा ले रहे हैं।

अनुच्छेद 370 व 35 ए समाप्त होने के बाद इन रिफ्यूजियों को पहली बार जम्मू-कश्मीर में वोट डालने का अधिकार मिला है। जिला विकास परिषद के चुनावों के तहत शनिवार को जम्मू जिले की अखनूर तहसील में जब पहले चरण का मतदान हुआ, तो सालों से बेबसी के शिकार ये लोग भी अपने मताधिकार का इस्तेमाल करने मतदान केंद्र पहुंचे। जब वह वोट डालकर बाहर आए तो उनकी आंखों में खुशी के आंसू थे। चेहरे पर चमक थी। खुला आसमान था।

26 हजार परिवार पहली बार करेंगे मतदान

जम्मू संभाग में पश्चिमी पाकिस्तान से आए लोगों के 26 हजार परिवार हैं। इनमें से अधिकतर जम्मू, सांबा व कठुआ जिले में बसे हैं। अखनूर तहसील में पश्चिमी पाकिस्तान से आए करीब 100 परिवार हैं। अखनूर के अंबारा क्षेत्र में इनके 30, पारता में 40, गडख़ाल में 10 तथा घूमल में ऐसे 13 परिवार हैं, जो शनिवार को पहली बार जम्मू कश्मीर में स्थानीय चुनाव प्रक्रिया का हिस्सा बने। सात दशकों से अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे इन परिवारों का सपना पांच अगस्त 2019 को पूरा हुआ था, जब मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर को अनुच्छेद 370 व 35ए की जंजीरों से मुक्त किया।

मैंने तो सोचा था शायद जम्मू कश्मीर का बाङ्क्षशदा बनने से पहले ही आंखें बंद हो जाएंगी, लेकिन शुक्रगुजार हूं मोदी सरकार का, जिसने हमें भी जम्मू कश्मीर का नागरिक बनाया। यहां अपना प्रतिनिधि चुनने का मौका दिया। मैं बता नहीं सकता कि वोट डालकर कितनी खुशी हो रही है।

-बोधराज

आज तक हमें किसी ने इंसान ही नहीं समझा। हम अपने बुजुर्गाें के साथ पाकिस्तान छोड़ भारत आए और यहां बस गए, लेकिन बचपन से बुढ़ापा आ गया, हम रिफ्यूजी ही रहे। हमें लगता था कि हमारा कोई घर नहीं, कोई देश नहीं। आज पहली बार अहसास हुआ कि हम भी इंसान हैं और हमें भी यहां वोट डालने का हक है।

-कौशल्या देवी

हमारे लिए तो आज असली आजादी है। हम यहां न तो जमीन खरीद सकते थे, न वोट डाल सकते थे। उम्र बीत गई रिफ्यूजी का जीवन जीते-जीते। शुक्र है आज यह दिन आया। अब हमारे बच्चे भी यहां के बाङ्क्षशदे बन गए हैं। हमने तो ङ्क्षजदगी दरबदर होकर गुजार दी, लेकिन मोदी सरकार ने हमारे बच्चों को दरबदर होने से बचा लिया।

-स्मृति देवी

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आज एक ऐतिहासिक दिन है। पाकिस्तान से आए ङ्क्षहदू-सिख लोग, वाल्मिकी व गोरखा समुदाय, यह सब अनुच्छेद 370 व 35 ए की प्रताडऩा के शिकार थे, जो 73 वर्षों में पहली बार वोट डाल रहे हैं। यह राष्ट्र के लिए एक गौरवशाली क्षण है और डॉ. फारूक अब्दुल्ला के नेतृत्व वाले पीपुल्स एलायंस व पाकिस्तान-चीन की भाषा बोलने वालों के मुंह पर जोरदार तमाचा भी।

-प्रो. हरिओम शर्मा, वरिष्ठ राजनीतिक विश्‍लेषक

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