1947 का सच: जब कबाइलियों से निहत्थे भिड़ गए़ आरएसएस व सिंह सभा के शूरवीर

बुजुर्ग कुलदीप राज गुप्ता आज भी उस भयानक मंजर को याद कर कांप उठते हैं।
Publish Date:Sat, 24 Oct 2020 11:02 AM (IST) Author: Rahul Sharma

राजौरी, गगन कोहली: वर्ष 1947 का सच वाकई रोंगटे खड़े करने वाला था। राजौरी पर कबाइलियों ने धावा बोल दिया था। लोगों को नृशंस हत्याएं की जा रही थी। उस समय राष्ट्रीय स्वयं संघ (आरएसएस) और सिंह सभा के शूरवीर कबाइलियों को खदेडऩे के लिए सामने आ गए। कइयों ने जान भी दे दी। इन शूरवीरों ने सैकड़ों कबाइलियों को मौत के घाट उतार दिया। 27 अक्टूबर 1947 से लेकर 12 अप्रैल 1948 तक कबाइलियों का राजौरी पर कब्जा रहा। ये कबाइली कश्मीर से खदेड़े जाने के बाद राजौरी घुस आए। 13 अप्रैल, 1948 का सूरज खुशियां लेकर आया जब भारतीय सेना ने राजौरी को कबाइलियों से मुक्त करा लिया। कबाइलियों ने 30 हजार से अधिक लोगों को मौत के घाट उतार दिया था। राजौरी के लोग 13 अप्रैल को विजय दिवस व सेना शौर्य के तौर पर मनाती है।

26 अक्टूबर, 1947 को महाराजा हरि सिंह ने जम्मू कश्मीर का विलय भारत के साथ कर दिया। 27 अक्टूबर पाकिस्तान ने कबाइलियों को जम्मू कश्मीर में भेजकर कब्जा का प्रयास किया। कबाइलियों ने लोगों को मौत के घाट उतारना शुरू कर दिया। महिलाओं की अस्मत लूटी गई। 11 नवंबर, 1947 को देश में दिवाली मनाई जा रही थी, उस समय राजौरी कबाइलियों के जुल्म में जल रहा था। तीस हजार से अधिक लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया। कई महिलाओं ने बेटियों के साथ जहर खा लिया तो कुछ ने कुएं में छलांग लगा दी।

भयानक मंजर याद कर कांप जाते हैं : बुजुर्ग कुलदीप राज गुप्ता आज भी उस भयानक मंजर को याद कर कांप उठते हैं। 'आज भी मुझे बच्चों के रोने की आवाज सुनाई देती है। मेरी उम्र सिर्फ दस वर्ष थी। उस समय राजौरी के तहसीलदार हरजी लाल थे। जब कबाइलियों ने हमला बोला तो वह हम लोगों की सुरक्षा के लिए तैनात गोरखा राइफल के 20 जवानों को लेकर रियासी भाग गए।' आरएसएस व सिंह सभा के सदस्यों का गोलाबारूद खत्म हो चुका था। कबाइलियों ने आक्रमण तेज कर दिया। आरएसएस और सिंह सभा के शूरवीर निहत्थे ही कबाइलियों से भिड़ गए। कइयों को मार गिराया। सिंह सभा में अधिकांश सिख युवा थे। उनके पिता के साथ परिवार के कई सदस्य मारे गए।

बुजुर्ग कृष्ण लाल गुप्ता कहते हैं कि कबाइलियों ने राजौरी पर बहुत कहर बरपाया। जो भी महिला मिली उसको अपने साथ ले गए। किसी को भी नहीं छोड़ा। जो मिला उसे मौत के घाट उतार दिया। आज भी जब वह मंजर याद आता है तो सिहर उठता हूं। । जिस स्थान पर आज बलिदान भवन बना हुआ है। उस स्थान पर कुआं हुआ करता था। कई महिलाओं ने अपनी इज्जत बचाने के लिए कूद कर जान दे दी।

यहां होता है श्रद्धांजलि कार्यक्रम : प्रत्येक वर्ष 13 अप्रैल को मंडी चौराहे पर बनाए गए शहीदी स्मारक पर श्रद्धांजलि कार्यक्रम किया जाता है। इसमें होने वाली प्रार्थना सभा में सैन्य अधिकारी, धर्म गुरु, प्रशासनिक अधिकारी व आम लोग भाग लेते हैं। बलिदान भवन का निर्माण नवंबर, 1969 को हुआ। 

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