Gurdwara Patthar Sahib में माथा टेकने पहुंचे लद्दाख के रक्षक, जानिए क्या है इस गुरुद्वारे का इतिहास

लद्दाख में सरहदों की रक्षा करने के लिए तैनात सैनिकों के साथ हजारों पर्यटक भी यहां पर हर साल आते हैं। इस गुरुद्वारा में राक्षस द्वारा फेंका गया वह पत्थर आज भी आकषर्ण का केंद्र है जिसे गुरु नानक देव जी ने अपनी पीठ से रोक लिया।

Lokesh Chandra MishraFri, 19 Nov 2021 08:43 PM (IST)
गुरुनानक जी के लद्दाख दौरे का यादगार यह एेतिहासिक गुरुद्वारा लेह से 25 किमी दूर श्रीनगर-लेह रोड पर स्थित है।

जम्मू, राज्य ब्यूरो : केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख में भी शुक्रवार को श्री गुरु नानक देव जी के प्रकाश पर्व की धूम रही। लेह में विश्व प्रसिद्ध गुरुद्वारा पत्थर साहिब में माथा टेकने के लद्दाख के रक्षकों की भीड़ जुटी। सैन्य क्षेत्र में स्थित इस एेतिहासिक गुरुद्वारा में माथा टेकने के लिए लद्दाख के उपराज्यपाल आरके माथुर, क्षेत्र की सुरक्षा का जिम्मा संभालने वाले सेना की चौदह कोर के कोर कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल पीजीके मेनन समेत सेना, प्रशासन के कई वरिष्ठ अधिकारी, सैनिक व उनके परिजन पहुंचे। इस दौरान उन्होंने देश, लद्दाख में शांति व खुशहाली के लिए अरदास भी की।

उपराज्यपाल और कोर कमांडर ने गुरुद्वारा में पहुंचे सैन्य कर्मियों व लोगों के साथ गुरु का लंगर भी ग्रहण किया। लेह में सैन्य क्षेत्र में स्थित इस एतिहासिक गुरुद्वारा का रखरखाव सेना द्वारा किया जाता है। गुरु नानक जी के लद्दाख दौरे का यादगार यह एेतिहासिक गुरुद्वारा लेह से 25 किमी दूर श्रीनगर-लेह रोड पर स्थित है। लद्दाख में सरहदों की रक्षा करने के लिए तैनात सैनिकों के साथ हजारों पर्यटक भी यहां पर हर साल आते हैं। इस गुरुद्वारा में राक्षस द्वारा फेंका गया वह पत्थर आज भी आकषर्ण का केंद्र है, जिसे गुरु नानक देव जी ने अपनी पीठ से रोक लिया। इससे पत्थर पर गुरु नानक जी की पीठ का निशान बन गया था।

क्या है इस गुरुद्वारे का इतिहास : श्री गुरु नानक देव जी अपनी दूसरी यात्रा के दौरान जम्मू कश्मीर और लद्दाख आए थे। लेह से जम्मू तक अनेक ऐसे गुरुद्वारा हैं जो श्री गुरु जी की याद दिलाते हैं। गुरु जी जिस जगह भी ठहरे, वहां उनका गुरुद्वारा बन गया। श्री गुरु नानक देव जी भूटान, नेपाल, चीन से होते हुए लद्दाख के लेह में पहुंचे थे। लेह में एक राक्षस लोगों को बहुत परेशान करता था। श्री गुरु नानक देव जी 1517 ई. में सुमेर पर्वत पर अपना उपदेश देने के बाद लेह पहुंचे थे। वहां पहाड़ी पर रहने वाला राक्षस से परेशान लोगों ने अपना दुख गुरु जी से बयां किया था।

गुरु नानक देव जी ने नदी किनारे अपना आसन लगा लिया। जब श्री गुरु नानक देव जी प्रभु की भक्ति में लीन थे, तो राक्षस ने गुरु जी को मारने के लिए पहाड़ से बड़ा पत्थर गिरा दिया। गुरु जी से स्पर्श होते ही पत्थर मोम जैसा बन गया। इससे पत्थर पर गुरु जी के पीठ का निशान पड़ गया। गुस्से में राक्षस ने अपना दायां पैर पत्थर पर मारा तो उसका पैर पत्थर में धंस गया। वह गुरु जी के चरणों में गिर पड़ा। राक्षस के पैर का निशान भी पत्थर पर देखा जा सकता है। गुरु जी ने राक्षस को उपदेश दिया कि बुरे काम मत करो, लोगों को तंग न करो, मानव के कल्याण के लिए काम करो।

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