Terror Funding In Kashmir : छल, मौका परस्ती और दोहरे व्यवहार का दूसरा नाम था वहीद-उर-रहमान परा

Terror Funding In Kashmir परा ने बड़ी ही चालाकी से सुरक्षा एजेंसियों को यकीन दिलाया कि पाकिस्तान में बैठे तत्वों के साथ उसके संबंध अंतत भारत के हित में हैं। आरोपपत्र में परा को पाकिस्तान का एक बहुमूल्य हथियार संपत्ति बताया गया है।

Rahul SharmaTue, 15 Jun 2021 10:03 AM (IST)
एसटीएफ काे ही बाद में एसओजी- स्पेशल आप्रेशन ग्रुप का नाम दिया गया है।

श्रीनगर, एजेंसी : पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की युवा इकाई के अध्यक्ष वहीद उर रहमान परा के खिलाफ राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआइए) ने मार्च 2021 और जम्मू कश्मीर पुलिस के काउंटर इंटेलीजेंस कश्मीर (सीआईके) ने इसी माह की शुरुआत में अदालत में आरोप पत्र दायर किए हैं। इनमें परा को भारत की मुख्यधारा की राजनीति और सरकारी तंत्र में पाक स्थित आतंकी संगठनों और अलगाववादियों का एजेंट बताया गया है। परा के वकील और पीडीपी की अध्यक्षा महबूबा मुफ्ती ने आरोपों को नकारा है।

एनआईए और सीआईके के आरोपपत्र के मुताबिक,परा की दोहरी जिंदगी की शुरुआत 2007 में उसकी पाकिस्तान यात्रा और हिजबुल मुजाहिदीन के चीफ कमांडर सैय्यद सल्लाहुदीन के साक्षात्कार के साथ हुई। उसने यह साक्षात्कार कश्मीर लाैैटने के बाद पुलवामा स्थित एक केबल टीवी चैनल पर प्रसारित किया था।

हिज्ब कमांडर के साक्षात्कार के चार साल बार परा को राम जेठमलानी की कश्मीर कमेटी के दूसरे संस्करण में बतौर सदस्य शामिल होने का माैका मिला। इससे पहले कश्मीर कमेटी वर्ष 2002 से 2004 तक सक्रिय रही थी। परा के साथ कश्मीर कमेटी में पत्रकार एमजे अकबर, मधु किश्वर और भारतीय विदेश सेवा के रिटायड्र नौकरशाह वीके ग्रोवर भी सदस्य थे। जेठमलानी ने कश्मीर कमेटी को दोबरा 2010 के हिंसक प्रदर्शनो के बाद बनाया था और चाहते थे कि वह कश्मीर मं विभिन्न संगठनाें के साथ बातचीत कर मसले का हल निकाला जा सके।

कमेटी अपने मकसद में फिर नाकाम रही,लेकिन परा का कद कुछ बढ़ गया और 2014 के विधानसभा चुनावों से कुछ समय पहले उसे मुफ्ती माहम्मद सईद की पीडीपी में शामिल होने का मौका मिला। सल्लाहुदीन और अलगाववादियों के साथ कथित संबंधों का उसे फायदा मिला। उसे पीडीपी युवा इकाई का अध्यक्ष बनाया गया। पीडीपी-भाजपा गठबंधन सरकार बनने पर वह जम्मू कश्मीर खेल परिषद का सचिव भी बन गया, लेकिन पीडीपी की युवा इकाई का अध्यक्ष पद उसने नहीं छोड़ा। वह मुफ्ती सईद की मौत के बाद पीडीपी अध्यक्षा और पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के खास सिपहसालारों में एक बन गया।

कश्मीर में 31 वर्ष से जारी आतंकी हिंसा के शुरुआती सात साल में पूरे प्रदेश में विशेषकर घाटी मे कोई राजनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं था। सरकार और लोगों के बीच काेई संपर्क नहीं रह गया था। नौकरशाही और सुरक्षाबल केंद्र सरकार के निर्देशानुसार ही आतंकवाद के खिलाफ खुले हाथों से जुटे हुए थ। वर्ष 1990 के बाद कश्मीर में 1994 में पहली बार लाेसभा चुनाव हुए और 1996 में जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव कराए गए। इन चुनावों में डा फारुक अब्दुल्ला के नेतृत्व में नेशनल कांफ्रेंस सबसे बड़ी जमात बनकर उभरी। फारुक अब्दुल्ला ने 1996 से 2002 तक कश्मीर में अलगाववादियों और पाकिस्तानी जिहादियों के खिलाफ खुलकर मोर्चा लिया वह आतंकी शीविरों पर बमवर्षा की मांग करते तो कभी हुर्रियत नेताओं को झेलम में डुबाने की।

इस दौरान सुरक्षाबलों ने आतंकवाद को कश्मीर में मरनासन्न स्थिति में पहुंचा दिया। इस दौरान एक बड़ा घटनाक्रम जम्मू कश्मीर में हुआ, 1999 में मुफ्ती सईद ने कांग्रेस छाेड़ पीडीपी का गठन कर लिया और दूसरी तरफ तत्कालीन मुख्यमंत्री डा फारुक अब्दुल्ला ने राज्य विधानसभा में जम्मू कश्मीर के लिए आटोनामी का प्रस्ताव पारित करा,उसे केंद्र सरकार को भेजा। तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया। इसके बाद केंद्र ने पीडीपी को कथित तौर पर आगे बढ़ाया और पीडीपी ने फारुक अब्दुल्ला के खिलाफ आक्रामक प्रचार करते हुए उनकी सरकार को कश्मीर विरोधी और दिल्ली समर्थक साबित किया। मुफती ने फारुक को कश्मीर में आतंकियों के खिलाफ एसटीएफ तैयर करने का जिम्मेदार ठहराया। एसटीएफ काे ही बाद में एसओजी- स्पेशल आप्रेशन ग्रुप का नाम दिया गया है।

दरकिनार हुए कई अलगाववादी और आतंकी भी प्रत्यक्ष-परोक्ष रुप से पीडीपी के साथ जुड़े। मुफ्ती सईद ने सबका साथ-सबका हाथ थामा। एक तरफ उन्होंने अलगाववादियों और आतंकियों के साथ कथित समझौता किया तो दूसरी तरफ दिल्ली के साथ गठजाेड़ आगे बढ़ाया। इसका फायदा उन्हें 2002 के चुनाव के बाद मिला। उनके पास सिर्फ 16 विधायक थे, लेकिन तत्कालीन भाजपा सरकार और कांग्रेस के सहयोग सेे वह मुख्यमंत्री बने। पीडीपी व कांग्रेस ने जम्मू कश्मीर में गठबंधन सरकार बनाई। इसके बाद तो आतंकियों और अलगाववादियों के साथ संबंध सरकारी तंत्र, मुख्यधारा के राजनीतिक दलों और प्रशासन में अपनी पैठ बनाने के लिए कईयों का जरिया बन गई। इस मामले में परा सबसे ज्यादा चालाक निकला। वह एक बड़े गठजोड़ का एक छोटा सा पुर्जा है,जो भारतीय सुरक्षा व खुफिया एजेंसियों और पार्टी व सरकार के सहयोग के बिना एक सैंकेंड भी नहीं टिक पाता।

इस दौरान हालात को भांपते हुए उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व में नेशनल कांफ्रेसं ने भी अलगाववादियों और आतंकियों के प्रति कुछ नरम रवैया अपनाना शुरु कर दिया। उन्होंने मुफ्ती सईद और पीडीपी की पाकिस्तान के प्रति उदार नीतियों को अपनाने का प्रयास किया उमर अब्दुल्ला ने तो मुख्यमंत्री रहते हुए कश्मीर के एक नामी व्यापारी, जो इस समय टेरर फंडिंग के सिलसिले में तिहाड़ जेल में हैं, केे बेटे की शादी मे हिस्सा लिया। इस शादी मेंगुलाम कश्मीर के पूर्व प्रधानमंत्री भी आए। उमर और उनकी मुलाकात भी हुई। उमर अब्दुल्ला ने उन्हें सरकारी हैलीकाप्टर में पहलगाम की सैर भी कराई। कईयों ने इसे सराहा तो कईयों ने इस पर एतराज जताया क्योंकि यह अलगाववादियों और आतंकियों के लिए प्रोत्साहजनक था। यही सब चल रहा था कि 14 फरवरी 2019 को श्रीनगर-जम्मू हाइवे पर लिथेपारा में सुरक्षाबलों पर एक बड़ा आतंकी हमला हुआ। इसके बाद तो पूरा माहौल बदल गया।

खैर, परा के खिलाफ दायर दोनों आरोपपत्र एक मजबूत मामला तैयार करने में समर्थ हैं,लेकिन यह कई सवालों के जवाब भी मांगते हैं। आखिर क्या वजह रही कि 20 साल तक वाजपेयी-आडवानी नीति के लाभ-हानि का कोई वैज्ञानिक आकलन नहीं हुआ। आखिर 1999-2002 तक अपनाई गई नीति के पैराेकारों से सवाल क्यों नीं किया गया,उन्हें बिना किसी जवाबदेयी के भारतीय सुरक्ष्ज्ञा और खुफिया एजेंसियों में अपनी मर्जी से काम करने दिया गया। आज जो नेता राष्ट्रीय एकता अखंडता के लिए खतरनाक बताए जा रहे हैं, उन्हें भारत व इसके राजनीतिक संस्थानों, लाेकतंत्र और व्यवस्था को गाली देने की अनुमति किसने दी थी? बीते 20 सालों के दौरान जब स्थल-जलचर राजनीतिक कश्मीर को एक तरह से पाकिस्तान बनाने में लगे हुए थे, उस समय हमारी केंद्रीय खुफिया एजेंसियां कहां थी?

वहीद परा के प्रक्ररण ने कई सवाल उठाए हैं, कई अनछुए तथ्यों की तरफ ध्यान दिलाया है। परा ने बड़ी ही चालाकी से सुरक्षा एजेंसियों को यकीन दिलाया कि पाकिस्तान में बैठे तत्वों के साथ उसके संबंध अंतत: भारत के हित में हैं। आरोपपत्र में परा को पाकिस्तान का एक बहुमूल्य हथियार, संपत्ति बताया गया है। वह भारत के साथ ढोंग कर रहा था। उसके पास पाकिस्तान की तरफ से पूरा अधिकार था कि वह भारतीय एजेंसियों को समय समय पर छोटे मोटे लॉलीपॉप दे,जिनसे उन्हें लगे कि वह पाकिस्तान के खिलाफ है और दूसरी तरफ वह धीरे धीरे कश्मीर के हालात को पूरी तरह पाकिस्तान के पक्ष में बदलता जाए। सीआईके ने अपने आरोपत्र मे किसी दूसरे खिलाड़ी को चिन्हित किए बगैर साफ शब्दां में कहा है कि उसने 13 साल में उसने जाे किया वह छल, कपट, मौका परस्ती और दोहरे व्यवहार की एक बड़ी गाथा ही है। 

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