Jammu Kashmir: सेब की लाली आपकी सेहत पर पड़ रही है भारी, जानें क्या है इसकी वजह

शेर-ए-कश्मीर कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय कश्मीर के फल-विज्ञान विभाग के अध्यक्ष डा. शाहिद इकबाल के अनुसार फलों के भीतर प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला इथाइलीन फल को पकाते हुए उसे रसीला बनता है। सेब जितना लाल होता है ग्राहकों को उतना ही लुभाता है।

Vikas AbrolSun, 12 Sep 2021 06:50 AM (IST)
व्यापारी चांदी कूट रहा है और सेब का स्वाद बीमार बना रहा है।

श्रीनगर, राज्य ब्यूरो : सेब और कश्मीर, दोनों एक दूसरे का पर्याय हैं। रसीले लाल सुर्ख सेब ग्राहकों को बरबस ही आकर्षित करते हैं। पर यह चटख लाल रंग आपकी सेहत बनाने के बजाय आपकी सेहत बिगाड़ भी सकता है। इतना ही नहीं इस कृत्रिम लाली की कवायद बागवान पर भी भारी पड़ रही है और उसके बाग वीरान हो रहे हैं। व्यापारी चांदी कूट रहा है और सेब का स्वाद बीमार बना रहा है।

उल्लेखनीय है कि देश में कुल सेब उत्पादन का 80 फीसद जम्मू कश्मीर में पैदा होता है। बीते साल जम्मू कश्मीर में 19 लाख टन सेब पैदा हुआ था।

शेर-ए-कश्मीर कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, कश्मीर के फल-विज्ञान विभाग के अध्यक्ष डा. शाहिद इकबाल के अनुसार फलों के भीतर प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला इथाइलीन फल को पकाते हुए उसे रसीला बनता है। सेब जितना लाल होता है, ग्राहकों को उतना ही लुभाता है। यह सभी बागवान जानते हैं। इसलिए कई लालची और लापरवाह बागवान इथेफोन नामक रसायन का छिड़काव करते हैं।

इन रसायनों के इस्तेमाल से पेड़ इथाइलीन तेजी से बनाता है। इसका असर यह होता है कि फल जल्दी पकता है और उसका रंग लाल हो जाता है पर लगातार इस्तेमाल से पेड़ सूखने लगता है।

बागवानी विभाग के एक अधिकारी के अनुसार हजरतबली, कैंडिशन और रेड डिलिश्यस प्रजाति के सेबों में ही मुख्यत: कृत्रिम रसायनों का इस्तेमाल देखा गया है। कश्मीर में सेब की यही किस्में सबसे पहले तैयार होती हैं।

अब कैल्शियम कार्बाइड से भी पका रहे सेब

विज्ञानियों के अनुसार कुछ बागवान मेथनाल, कैल्शियम कार्बाइड, इथनोल और इथाइलीन ग्लासोल का भी कई जगह प्रयोग होने की सूचनाएं हैं। खासकर कैल्शियम कार्बाइड कैंसर का कारण बन सकता है।

व्यापारी करते हैं रसायनों का प्रयोग : सोपोर के सेब उत्पादक हाज मोहम्मद मकबूल ने कहा कि सेब व्यापारी का मकसद जल्द से जल्द मुनाफा कमाना होता है। ऐसे में वह रसायनों का इस्तेमाल करता है। फसल उतारता है, बाजार में बेचता है और चलता बनता है। दो-तीन साल बाद पेड़ सूखने लगते हैं और पैदावार घटती है तो बागवान को असलियत समझ आती है।

जल्द खराब होने लगता है सेब

पांजीपोरा के सेब उत्पादक जहूर के अनुसार रसायनों के इस्तेमाल से तैयार सेब ज्यादा देर नहीं चलेगा। उसकी शेल्फ लाइफ ज्यादा से ज्यादा चार-पांच दिन तक होती है और जल्द खराब हो जाता है। प्राकृतिक रूप से पका सेब 15-20 दिन तक सेहतमंद रहता है।

कैंसर का भी है खतरा : डा. जैनब

एसएमएचएस अस्पताल श्रीनगर में कार्यरत डा. जैनब नबी ने कहा कि कृत्रिम तरीके से लाल सेब पेट में अल्सर समेत आंत की कई बीमारियों के कारण बन रहे हैं। इसके अलावा रसायनों के इस्तेमाल से कैंसर का खतरा भी ज्यादा रहता है।

रसायनों पर है प्रतिबंध : बागवानी निदेशक

बागवानी निदेशक एजाज अहमद बट ने कहा कि कश्मीर में सेब को जल्द तैयार करने, सेबों का रंग निखारने के लिए इस्तेमाल होने वाली सभी दवाओं पर चार साल से रोक लगा रखी है। हमें जब कभी शिकायत मिलती है, हम तुरंत कार्रवाई करते हैं।

खाने से पहले कुछ देर पानी में छोड़ दें

विज्ञानियों के अनुसार ऐसे में सेब को खाने से पहले अच्छे से धोएं और कुछ समय के लिए पानी में छोड़ दें। इससे रसायनों का प्रभाव काफी कम हो जाएगा।

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