Jammu: राजू की हिंदी पुस्तक ‘झरोखा’ का विमोचन, इस पुस्तक में हैं 38 लेख

हमारी संस्कृति और विरासत का लेखा-जोखा देने वाले बहुत महत्व के लेख एक दिलचस्प तरीके से लिखे गए हैं जो न केवल पाठकों के साथ सहज ही जुड़ जाते हैं बल्कि विचारोत्तेजक भी हैं। वास्तव में हमें एहसास करवाते हैं कि संस्कृति और परंपराओं के प्रति हमारी कुछ जवाबदेही है।

Vikas AbrolTue, 19 Oct 2021 05:06 PM (IST)
हमारी संस्कृति और विरासत का लेखा-जोखा देने वाले बहुत महत्व के लेख एक दिलचस्प तरीके से लिखे गए हैं।

जम्मू, जागरण संवाददाता । राजेश्वर सिंह ‘राजू’ की हिंदी पुस्तक ‘झरोखा‘ को एक साथ नोशन प्रेस फ्लिपकार्ट और अमेजान पर जारी किया गया है। हमारी संस्कृति, हमारी विरासत का उपशीर्षक वाली इस पुस्तक में 38 लेख हैं, जो ऐतिहासिक महत्व और सांस्कृतिक विरासत के विभिन्न स्थानों जैसे उत्तर बैहनी, पुरमंडल, सुनाढ़ा बाबा, दाता रणपत, बाबा धनंसर झिड़ी, अंबारन, जिया पोता घाट, मानसर, सरूईंसर, झज्जर कोटली, सुकराला माता, कैलाश धाम, रघुनाथ मंदिर, अमरनाथ, सुद्ध महादेव, क्रीमची मंदिर, बावली तथा तवी, देविका जैसी नदियों और डुग्गर प्रदेश की विभिन्न लोक कलाओं जैसे गीतडू, जातर, कुड्ड, हरण, बारां, भाख, जागरना, बझारतां, कराक पर लेखों के अलावा हमारी संस्कृति जो हमारे लिए ही नहीं बल्कि सभी के लिए मानवीय मूल्य प्रचारित करती है। उस पर भी कुछ लेख सम्मिलित किए गए हैं।

हमारी संस्कृति और विरासत का लेखा-जोखा देने वाले बहुत महत्व के लेख एक दिलचस्प तरीके से लिखे गए हैं जो न केवल पाठकों के साथ सहज ही जुड़ जाते हैं बल्कि विचारोत्तेजक भी हैं। ये वास्तव में हमें यह एहसास करवाते हैं कि हमारी संस्कृति और परंपराओं के प्रति हमारी कुछ जवाबदेही है। अगर हम इन्हें संरक्षित करना और पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाना सुनिश्चित नहीं करेंगे, तो इसके लिए और कौन दर्द उठाएगा। बल्कि अपनी जड़ों से जुड़े रहना हमारे लिए गर्व की बात होनी चाहिए।

राजेश्वर सिंह राजू जो एक प्रसिद्ध अंग्रेजी, हिंदी और डोगरी लेखक हैं। पिछले कई वर्षों से विभिन्न प्रमुख समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के लिए योगदान दे रहे हैं। वह कहते हैं कि हमारी संस्कृति और भाषा के लिए काम करना हमारी नैतिक जिम्मेदारी बन जाती है। झरोखा पुस्तक हमारी डुग्गर संस्कृति, परंपराओं और विरासत की खोज के लिए बहुत जरूरी मिशन के लिए एक छोटा सा प्रयास है। यह वास्तव में हमारी समृद्ध संस्कृति और परंपराओं की एक झलक है और गर्व का अनुभव भी है । लेकिन इन परंपराओं को विलुप्त होने से बचाने के लिए जिम्मेदारी की भावना भी दिखनी चाहिए। उनका कहना है कि वह लोक कला के और विभिन्न रूपों को किताबों के रूप में संकलित करके योगदान देना जारी रखेंगे क्योंकि यहां बहुत बड़ा खजाना है और केवल जरूरत है कि हम अपनी सांस्कृतिक विरासत के लिए गर्व महसूस करें और इसे सभी प्लेटफार्मों पर बढ़ावा दें। मुखपृष्ठ जो प्रतीकात्मक और बहुत ही आकर्षक है। मृणालिनी सिंह द्वारा डिजाइन किया गया है। पुस्तक की कीमत 300 रुपये है और यह अमेज़न, फ्लिपकार्ट और नोंशन प्रेस पर उपलब्ध है।

यहां यह उल्लेख करना उचित है कि राजेश्वर की इससे पहले की 11 पुस्तकें हैं। जिनमें 5 हिन्दी निशब्द, हां-ना, भगवान मेरे नहीं हैं। तवी उदास थी, कविता संग्रह और कह दो, लघु कथाएं 5 मातृभाषा डोगरी में शामिल हैं। बच्चों का कहानी संग्रह सिक्ख मत्त, बच्चों की कहानियां और एक अंग्रेजी पुस्तक के अलावा विभिन्न समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में 800 से अधिक लेख प्रकाशित हैं। लगभग 15 रंगमंच नाटक, 50 रेडियो नाटक जिनका प्रसारण आकाशवाणी जम्मू से हुआ है। लगभग 30 धारावाहिक नाटक, 100 वृत्तचित्र दूरदर्शन केंद्र जम्मू, काशीर और श्रीनगर से प्रसारित हैं। 

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