Weekly Interview : इम्फा को शिखर पर ले जाना है मकसद : प्रो. शोहाब

जम्मू यूनिवर्सिटी में उर्दू के विभागाध्यक्ष प्रो. शोहाब इनायत मलिक

जम्मू यूनिवर्सिटी में उर्दू के विभागाध्यक्ष प्रो. शोहाब इनायत मलिक को इंस्टीट्यूट ऑफ म्यूजिक एंड फाइन आर्ट्स यानी इम्फा के प्रिंसिपल की जिम्मेवारी सौंपी गई है।इस संस्थान के उत्थान के लिए प्रो. शोहाब ने क्या योजना बनाई है। इस पर उनसे बातचीत की गई।

Lokesh Chandra MishraSun, 11 Apr 2021 06:54 PM (IST)

साप्ताहिक साक्षात्कार

मानव-प्रेम, सीधा स्पष्ट यथार्थ और इन सबसे अधिक दार्शनिक दृष्टिकोण से उर्दू साहित्य की सेवा में जुटे जम्मू यूनिवर्सिटी में उर्दू के विभागाध्यक्ष प्रो. शोहाब इनायत मलिक शहर की ऐसी शख्सियत हैं, जिन पर यह शे’र स्टीक बैठता है कि ‘कोई बतलाओ कि हम बतलाएं क्या...’। प्रो. शोहाब अब तक 50 के करीब पीएचडी करवा चुके हैं। 35 एमफिल करवा चुके हैं और दो दर्जन के करीब किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। ऑल इंडिया उर्दू टीचर एसोसिएशन के महासचिव हैं। सैकड़ों कार्यक्रम करवा चुके हैं। हाल ही में उन्हें इंस्टीट्यूट ऑफ म्यूजिक एंड फाइन आर्ट्स यानी इम्फा के प्रिंसिपल की जिम्मेवारी सौंपी गई है। पेश है दैनिक जागरण के वरिष्ठ संवाददाता अशोक शर्मा से प्रो. शोहाब की बातचीत का अंश -

प्र. : इम्फा के भविष्य को लेकर क्या सोच है?

इम्फा कश्मीर हो या इम्फा जम्मू यहां से सैकडाें नामी कलाकार निकले हुए हैं। इसका जो मुकाम होना चाहिए था। मुझे लगता है, वह नहीं मिल पाया है। इस प्रतिष्ठित संस्थान की खोयी हुई छवि को लौटाना है। इसे शिखर पर ले जाना है। हमारे विद्यार्थियों या फैकल्टी सदस्यों में कोई कमी नहीं है। जो मौके इन्हें मिलने चाहिए, वह नहीं मिल सका है। अब इम्फा के विद्यार्थियों को इतने मौके मिलेंगे कि दूसरे राज्यों से भी लोग इम्फा में दाखिला लेना चाहेंगे।

प्र. : किस तरह के मौके मिलने से इम्फा की विशेष पहचान स्थापित हो सकेगी?

जब राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रमों में हमारे विद्यार्थी, फैकल्टी सदस्यों को अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करने का मौका मिलेगा तो अपने आप ही इम्फा की छवि में सुधार होने लगेगा। जम्मू यूनिविर्सटी में भी कई कार्यक्रमों का आयोजन होता रहता है, लेकिन इम्फा के विद्यार्थियों की तरफ कभी किसी का ध्यान नहीं गया। मेरी कोशिश रहेगी कि यूनिवर्सिटी के कार्यक्रमों में भी इम्फा के विद्यार्थियों को अधिक से अधिक मौके मिलें।

प्र. : एमएफए, मास्टर्स इन म्यूजिक आदि के लिए विद्यार्थियों को बाहरी राज्यों में जाेेना पड़ता है। क्या जम्मू में मास्टर्स डिग्री नहीं करवाई जा सकती?

लंबे समय से जम्मू में एमएफए, मास्टर्स इन म्यूजिक, कत्थक आदि की मांग होती रही है। बच्चों की यह मांग जायज भी है। उच्च शिक्षा के लिए बाहर जाना सभी के लिए संभव नहीं होता। आज जब कि जम्मू शिक्षा का हब बनता जा रहा है तो कला के क्षेत्र में मास्टर्स डिग्री के लिए किसी को बाहर क्यों जाना पड़े? उनकी प्राथमिकता रहेगी कि जल्द जम्मू में एमएफए हो सके। अगर ऐसा होता है तो जम्मू यूनिवर्सिटी में कला का एक अच्छा माहौल बनेगा।

प्र. : इम्फा की बिल्डिंग को लेकर भी विद्यार्थियों में रोष रहता है?

उत्तर : इम्फा पुंछ हाउस स्थित ऐतिहासिक इमारत में है। बिल्डिंग थोड़ी छोटी है, लेकिन इस ऐतिहासिक इमारते से छेड़छाड़ संभव नहीं है। हां, रंग रोगन और थोड़ी बहुत मरम्मत का कार्य जल्द करवाया जाएगा। अगर संभव होगा तो एक बिल्डिंग बनवाने का प्रयास रहेगा। कई साल इम्फा किराए की इमारतों में चलता रहा, लेकिन इससे विद्यार्थियों की परेशानियां बहुत बड़ गई थी। अब ढांचागत सुविधाओं काे बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाएगी।

प्र. : इम्फा के कर्मचारियों की काफी परेशानियां हैं, उन्हें उम्मीद थी कि अकादमी से यूनिवर्सिटी में शिफ्ट होने से उन्हें यूनिवर्सिटी के लाभ मिलेंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ?

इंस्टीट्यूट पहले जम्मू-कश्मीर कला संस्कृति एवं भाषा अकादमी के पास था। बाद में इसे यूनिवर्सिटी ने टेकओवर किया है। सभी को यूजीसी ग्रेड मिलना संभव नहीं है। इसके पीछे कई तरह की अड़चने हैं। जल्द मैं इन कर्मचारियों की मांगों को यूनिवर्सिटी अथार्टी के पास ले जाऊंगा। कोशिश होगी कि कोई बीच का रास्ता निकाला जाए ताकि सभी की समय-समय पर पदोन्नति हो सके। अच्छे ग्रेड मिल सकें।

प्र. : आप शिक्षाविद और साहित्यकार हैं, कला का क्षेत्र आपके लिए नया है। किस तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है?

कला मेरे लिए कोई नया क्षेत्र नहीं है। कला, साहित्य को लेकर यूके, बंगलादेश, पाकिस्तान, माेरिशस आदि देशों में कई कार्यक्रमों में भाग लिया है। पेपर पढ़े हैं। एक साहित्यकार को कला किसी से सीखने से जरूरत नहीं रहती। फिर सूरज सिंह, दीपाली बातल जैसे कलाकारों के साथ काम करने का अपना ही अनुभव होगा। सभी फैक्लटी सदस्यों को पहले से जानता हूं। हां, इनके प्रोत्साहन में कोई कसर नहीं छोड़ी जाएगी। यह हीरे तराशने वाले लोग हैं। इन्हें सम्मान तो मिलना ही चाहिए।

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