Jagran Impact : जम्मू-कश्मीर में अब महाजन, खत्री व सिख भी खरीद-बेच सकेंगे कृषि भूमि

अनुच्छेद 370 से पूर्व की व्यवस्था को अब तक ढोया जा रहा था। इसके तहत राज्य में कृषि भूमि खरीदने पर इन बिरादरियों पर रोक थी। इनके संगठन काफी समय से यह मुद्दा उठा रहे थे। दैनिक जागरण ने इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया था।

Rahul SharmaWed, 20 Oct 2021 07:40 AM (IST)
इससे जम्मू कश्मीर में कृषि क्षेत्र को फिर से जीवंत बनाने में मदद मिलने की उम्मीद है।

श्रीनगर, राज्य ब्यूरो : जम्मू कश्मीर में खेती कौन करेगा, अब यह जाति से तय नहीं होगा। उपराज्यपाल मनोज सिन्हा की अध्यक्षता में मंगलवार को प्रदेश प्रशासनिक परिषद की बैठक में एक अहम फैसला लेते हुए महाजन और खत्री बिरादरी के साथ सिख समुदाय को कृषि भूमि खरीदने और खेती करने की छूट दे दी।

इससे पूर्व अनुच्छेद 370 से पूर्व की व्यवस्था को अब तक ढोया जा रहा था। इसके तहत राज्य में कृषि भूमि खरीदने पर इन बिरादरियों पर रोक थी। इनके संगठन काफी समय से यह मुद्दा उठा रहे थे। दैनिक जागरण ने इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया था। प्रशासनिक परिषद के फैसले से अब महाजन, खत्री और सिख समुदाय बिना किसी दिक्कत के कृषि भूमि को खरीदने के अलावा कृषि गतिविधियों में निवेश की अनुमति मिल गई। इससे जम्मू कश्मीर में कृषि क्षेत्र को फिर से जीवंत बनाने में मदद मिलने की उम्मीद है।

इससे रोजगार के नए अवसर पैदा होने और आर्थिक विकास को भी बल मिलने की संभावना है। फैसले के मुताबिक, जिला उपायुक्त अब कृषि व संबंधित गतिविधियों के लिए 20 कनाल (2.5 एकड़) तक और बागवानी से जुड़े कार्यों के लिए 80 कनाल (10 एकड़) तक जमीन खरीदने की अनुमति दे सकते हैं। उन्हें यह प्रक्रिया आवेदन प्राप्त होने के 30 दिन के भीतर पूरी करनी होगी। प्रदेश सरकार के इस फैसले से जम्मू कश्मीर का गैर कृषक समुदाय भी कृषि, बागवानी और पशुपालन जैसी गतिविधियों में निवेश करते हुए इसे बतौर पेशा अपनाने को प्रोत्साहित होगा।

महाराजा के समय के कृषि कानून थे लागू : महाराजा हरि सिंह के समय के भू राजस्व कानून में यह साफ था कि केवल कृषि कार्यों से जुड़े वर्ग ही खेती की जमीन खरीद सकते थे। चूंकि सिख, खत्री और महाजन बिरादरी का परंपरागत व्यवसाय कृषि नहीं था, इसीलिए उन पर खेती योग्य जमीन खरीदने पर रोक थी। जम्मू कश्मीर के पुनर्गठन से पूर्व यही कानून चलता रहा। पुनर्गठन के बाद बने भू स्वामित्व कानून में इस पर साफ नहीं था। उसमें केवल यही लिखा था कि खेती से जुड़ी जमीन का उपयोग केवल कृषि कार्य के लिए ही होगा लेकिन स्पष्ट उल्लेख के अभाव में अधिकारी पुराने कानून को ही चलाए जा रहे थे। 

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