Kashmir : लेफ्टिनेंट जनरल ढिल्लों ने कहा-कभी चुप न रहने वाली कश्मीर की जनता, इन हत्याओं पर चुप क्यों है

लेफ्टिनेंट जनरल केजेएस ढिल्लों ने कहा कि जब कभी किसी सुरक्षाकर्मी से गलती हो जाती है तो यह लोग बहुत हंगामा करते हैं लेकिन आतंकियों द्वारा मानवाधिकारों के हनन पर चुप रहते हैं। आखिर क्या कारण है कि यह लोग चुप रहते हैं। इन्हें आतंकियों के खिलाफ आवाज उठानी होगी।

Rahul SharmaThu, 21 Oct 2021 09:04 AM (IST)
आम कश्मीरी ही सबसे ज्यादा आतंकवाद की मार झेल रहा है।

श्रीनगर, राज्य ब्यूरो : घाटी में आतंकवादियों द्वारा नागरिक हत्याओं की बढ़ती घटनाओं पर रोष जताते हुए लेफ्टिनेंट जनरल केजेएस ढिल्लों ने कहा कि आखिर क्या बात है कि कभी चुप न रहने वाली कश्मीर की बहुसंख्यक आबादी आज इन हत्याओं पर चुप हैं, वह क्यों नहीं आतंकी घटनाओं की खुलकर निंदा करती है। सिर्फ कुछ खास ही घटनाओं की निंदा क्यों? उन्होंने कहा कि क्या कश्मीरियों को भी पाकी कहलाना है, विदेशों में तो पाकी शब्द एक गाली की तरह इस्तेमाल होता है।

बादामी बाग स्थित सैन्य छावनी में सेना की 15वीं कोर द्वारा आयोजित एक सेमिनार- आतंकियों द्वारा मानवाधिकारों का हनन व बीते 30 साल से कश्मीरियों पर इसका प्रभाव में उपस्थितजनों को संबोधित करते हुए लेफ्टिनेंट जनरल केजेएस ढिल्लों ने कई तीखे सवाल उठाए। वह भी सेना की 15वीं कोर के कमांडर रह चुके हैं और राजपूताना रेजिमेंट के कर्नल हैं।

लेफ्टिनेंट जनरल केजेएस ढिल्लों ने हाल ही में कश्मीर में हुई नागरिक हत्याओं में मानवाधिकारों के कथित झंडाबरदारों, स्थानीय व राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया घरानों की चुप्पी की निंदा की। उन्होंने कहा कि जब कभी किसी सुरक्षाकर्मी से गलती हो जाती है तो यह लोग बहुत हंगामा करते हैं, लेकिन आतंकियों द्वारा मानवाधिकारों के हनन पर चुप रहते हैं। आखिर, क्या बात है कि यह लोग चुप रहते हैं। इन्हें आतंकियों के खिलाफ आवाज उठानी होगी। उन्होंने कहा कि आखिर क्या वजह की कश्मीर की बहुसंख्यक आबादी अब शांत हैं।

आतंकवाद ने कश्मीर को तबाह कर दिया : उन्होंने कहा कि आतंकवाद ने कश्मीर को तबाह कर दिया है। आम कश्मीरी ही सबसे ज्यादा आतंकवाद की मार झेल रहा है। उन्होंने सेना में अपने शुरुआती करियर का जिक्र करते हुए बताया कि जनवरी 1990 के दौरान मैं बारामुला में बतौर कैप्टन तैनात था। मैने देखा है कि 19 जनवरी 1990 को क्या हुआ था। आज 31 साल बीत गए हैं। किसी भी विवाद में जहां वैचारिक मतभेद होता है, आबादी का कुछेक हिस्सा हमेशा खिलाफ होता है और आबादी के इस हिस्से के खिलाफ आबादी का एक अन्य हिस्सा होता है। लेकिन यह बहुत कम होते हैं, यह दहाई में नहीं इकाई में ही होता है और यही अत्याचार करती है। आखिर, यह 90-95 फीसद शांत आबादी है कहां।

कश्मीरी पंडितों के साथ चला गया था कश्मीर की आत्मा का एक हिस्सा : लेफ्टिनेंट जनरल केजेएस ढिल्लों ने कहा कि जब कश्मीरी पंडित कश्मीर से गए तो कश्मीर की आत्मा का एक हिस्सा भी उनके साथ चला गया। कश्मरी पंडितों को कश्मीर में शिक्षा व्यवस्था का एक बड़ा आधार माना जाता था। उनके पलायन से कश्मीर की शिक्षा व्यवस्था बर्बाद हुई, यहां की आने वाली नस्लों का भविष्य बर्बाद हुआ। 1990 में आतंकवाद की शुरुआत की मार सबसे पहले सकूलों पर पड़ी। उनहें जलाया गया,क्योंकि जो लोग यह सब कर रहे थे नहीं चाहते थे कि कश्मीरी समाज में शिक्षा का प्रसार हो, वह कश्मीर की आत्मा को, कश्मीरियत को पूरी तरह से मटियामेट कर देना चाहते थे।

आम कश्मीरी को समझनी होगी आतंकवाद की सही कहानी : बरसों से जारी आतंकवाद ने कश्मीरी अभिभावकों, बच्चों और नौजवानों को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है। यहां हालात ठीक न होने के कारण बुनियादी ढांचा भी प्रभावित हुआ। 1990 के दौरान ही भारत में उदार आर्थिक व्यवस्था का दौर शुरू हुआ। उस समय कश्मीर में आतंकवाद ने पांव पसारे। कश्मीर के हाथ से विकास की राह में आगे बढ़ने का एक अवसर निकल गया। उन्होंने कहा कि जम्मू कश्मीर की 62 फीसद आबादी की उम्र 32 साल या इससे कम है, मतलब यही कि यह सभी आतंकी हिंसा के दौर में पैदा हुए हैं और पले-बढ़े हैं। यह बम धमाकों, हत्याओं और हड़ताल एवं बंद के दौर में पैदा हुए और बड़े हुए हैं। यह लोग दुष्प्रचार और कट्टर धर्मांध मानसिकता के साथ जवान हुए हैं। उन्होंने कहा कि हम पर, हमारे समाज की बुनियाद पर हमला हुआ है। जो मेरे बच्चों का कत्ल कर रहा है, उन्हें मरने के लिए भेज रहा है, उन्हें बंदूक दे रहा है, वे उन्हें पढ़ाई करने देने के बजाय आतंकी बना रहा है, वह कभी भी मेरा दोस्त नहीं हो सकता। यह सच्चाई एक आम कश्मीरी को समझनी होगी।

समझना होगा कि आतंकवाद से नुकसान किसको हो रहा है : लेफ्टिनेंट जनरल ने कहा कि आखिर नुकसान किसका हो रहा है? हमारी कश्मीरी माताओं का, जिनके बच्चों को मदरसों में धकेला जाता है और फिर कुछ दिनों में मरने के लिए छोड़ दिया जाता है। उन्होंने कहा कि 1990 के बाद यहां जो माहौल बना है, वह एक मां से उसका बच्चा छीन रहा है। अगर आतंकवाद यूं ही रहा और लोगों ने हक व सच्चाई के लिए आवाज न उठाई तो समझ लो कि कश्मीरियों की पहचान भी पाकिस्तानियों की तरह एक गाली बनकर रह जाएगी। कश्मीरियों को अपनी पंरपरा पहचाननी होगी, पाकिस्तान के दुष्प्रचार से बचना होगा।जो लोग विदेश यात्रा करते हैं, उन्‍हें पता है कि पश्चिमी देशों में एयरपोर्ट पर चेकिंग के दौरान 'पाकी' (पाकिस्‍तानी) कहलाना एक गाली की तरह है। क्‍या आपको उनके जैसा समाज बनना है? क्‍या आप चाहते हैं कि कोई आपको कश्‍मीरी कहे तो वह आपको अपनी बेइज्‍जती लगे? उन्होंने कहा कि कश्मीर की समृद्ध परपंरा और सभ्यता हजारों साल पुरानी है। इसमें शांति, सहअस्तित्‍व, कश्‍मीरियत, इंसानियत, सूफीवादी का जिक्र है। लेकिन क्‍या हम आज उस दिशा मे नहीं बढ़ रहे, जहां कोई हमारा नाम ले और हमें वह गाली लगे।

इससे पूर्व सेमिनार का उदघाटन करते हुए चिनार कोर के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल डीपी पांडेय ने कहा कि कश्मीरी समाज को, मानवाधिकारों के तथाकथित झंडाबरदारों और मीडियाकर्मियों को खुलकर आतंकियों से सवाल करना होगा, उनके अत्याचारों पर आवाज उठानी होगी,तभी कश्मीर और कश्मीरियों का भला होगा। 

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