Kashmir: न सुन सकती, न ही बोल और गठिया से भी जूझकर ताबिया ने रचा कमाल, 10वीं की वार्षिक परीक्षा में 90 फीसद अंक किए हासिल

इकबाल ने कहा, ताबिया न तो बोल सकती है और न ही सुन सकती है। सब कुछ समझ लेती है।

रौनक ने कहा मैं कोई पढ़ाकू किस्म की लड़की नहीं हूं। मैं जब भी कुछ पढ़ती हूं तो खूब मन लगाकर पढ़ती हूं। उम्मीद थी कि पूरे नंबर लाउंगी। आज बहुत खुश हूं। मैंने ईमानदारी से पढ़ाई की थी और आज उसका मुझे फल मिला है।

Rahul SharmaSat, 27 Feb 2021 08:41 AM (IST)

श्रीनगर, रजिया नूर: परिस्थितियां कैसी भी हों इंसान में अगर आगे बढऩे की अपनी ललक को जिंदा रखे तो उसे कोई रोक नहीं सकता। दक्षिणी कश्मीर के अनंतनाग के शांगस की 17 वर्षीय मूक-बधिर ताबिया इकबाल ने शुक्रवार को घोषित 10वीं की वार्षिक परीक्षा में कमाल कर दिखाया। गठिया बीमारी भी होने के कारण सात वर्षों से स्कूल नहीं जा सकी ताबिया ने 500 में से 452 अंक लिए।

ताबिया की मां मुनीरा अख्तर ने कहा कि बेटी ने हमारा सिर फख्र से ऊंचा कर दिया। जन्म से ही मूक-बधिर तबिया को चार साल की उम्र में गठिया की बीमारी ने चपेट में ले लिया। शुरू में चलने में तकलीफ होती थी। वह श्रीनगर के रामबाग में मूक-बधिर स्कूल भी जाती थी। तीसरी कक्षा में उसकी टांगों ने जवाब दे दिया। तब से वह व्हीलचेयर के सहारे जिंदगी काट रही है। हमने घर पर ही पढ़ाने का बंदोबस्त किया। एक स्पेशल एजुकेटर घर में ही पढ़ाने आता है।

शुक्र है कि मेरी बेटी ने दिन-रात मेहनत की। दिन में व्हील चेयर तो रात को बिस्तर पर आधी रात तक पढ़ती रहती। पेशे से किसान ताबिया के पिता मोहम्मद इकबाल ने कहा, ऐसे बच्चों के लिए सरकार ने कोई खास छूट नहीं दी है। उसे भी सामान्य बच्चों जैसा पाठ्यक्रम पढऩा पढ़ा। हम व्हीलचेयर पर उसे परीक्षा केंद्र ले जाते। हालांकि, हमने परीक्षा केंद्र में तैनात शिक्षकों से अनुरोध किया था कि उसे सहायक की जरूरत रहेगी। हमें इसकी इजाजत नहीं मिली। परीक्षा देने के दौरान दोनों सेंटर के बाहर इंतजार करते रहते। सुबह जब उसने वेबसाइट पर रिजल्ट देखा तो बेटी खुशी से फूली नहीं समाई।

डाक्टर बनने का शौक : इकबाल ने कहा, ताबिया न तो बोल सकती है और न ही सुन सकती है। सब कुछ समझ लेती है। हम उसके इशारों की जुबान समझते हैं। उसे डाक्टर बनने का शौक है। मुझे इशारों में समझाया कि उसे स्थेटस्कोप चाहिए। मुझे उसे लाकर देना पड़ा। पढ़ाई से जब भी उसे फुर्सत मिलती है तो स्थेटस्कोप कानों में डाल अपना शौक पूरा करती हूं। मैंने ठान ली है कि मैं उसका यह ख्वाब हकीकत में बदल दूंगा।

कश्मीर में 10वीं के परिणाम में तीन बच्चों के 100 फीसद अंक: कश्मीर में शुक्रवार को घोषित 10वी के वार्षिक परिणम में इस बार भी लड़कियों ने बाजी मारी। साधारण परिवार के तीन बच्चे तबस्सुम गुलजार, साकिब रहमान और रौनक दिलशाद ने 100 फीसद अंक लेकर मेरिट लिस्ट में टापर रहे। लाकडाउन के बीच 10वीं की परीक्षा में 75132 विद्यार्थी बैठे जिनमें 56386 विद्यार्थी सफल रहे। सफल विद्यार्थी की संख्या 75 फीसद रही।

तबस्सुम ने कामयाबी का श्रेय अध्यापकों व परिवार को दिया। उसने कहा, कोरोना से बचाव के लिए लाकडाउन में पढ़ाई करने भरपूर फायदा उठाया। कोरोना के कारण तनाव के बीच पढ़ाई पर ध्यान देना कठिन था। जब भी पढ़ाई में दिक्कत आती फौरन स्कूल शिक्षकों को फोन कर उनसे मदद लेती। डाक्टर बनने की इच्छुक तबस्सुम ने कहा कि अभी यह शुरुआत है। मुझे अभी बहुत आगे जाना है। मेरे पापा पुलिस में हेड कांस्टेबल हैं। हमारा भी फर्ज है कि हम उनके सपने पूरे करें। शोपियां जिले के इमा बसाहिब का साकिब गरीब किसान का बेटा है। साकिब ने कहा कि स्लो एंड स्टडी ङ्क्षवज द रेस। मैंने यही फार्मूला अपनाया।

मेरे पिता जी के पास उतने पैसे नहीं थे कि मुझे महंगी ट््यूशन करवाते। मैं एक स्थानीय स्कूल में पढ़ता हूं। मैंने खुद ही पढ़ता। लाकडाउन में तो स्कूल बंद थे। ऐसे में कभी जरूरत पड़ती तो मैं अपने टीचरों की मदद लेता। पढ़ाई का टाइम टेबल बनाया था। दिन में 5-6 घंटे पढ़ाई करता था। हफ्ते भर की पढ़ाई के बाद रिवाइज करता था और आगे बढ़ता। साकिब ने कहा कि वह कामर्स में पहले बीबीए और उसके बाद एमबीए करूंगा। बारामुला जिले के हर्दशिवा सोपोर की रौनक दिलशाद ने कहा कि लाकडाउन मेरे लिए शुभ रहा। इसमें मुझे एक तो पढ़ाई का और दूसरा परिवार वालों के साथ वक्त बिताने का मौका मिला।

पत्रकार बनने का शौक रखने वाली रौनक ने कहा, मैं कोई पढ़ाकू किस्म की लड़की नहीं हूं। मैं जब भी कुछ पढ़ती हूं तो खूब मन लगाकर पढ़ती हूं। उम्मीद थी कि पूरे नंबर लाउंगी। आज बहुत खुश हूं। मैंने ईमानदारी से पढ़ाई की थी और आज उसका मुझे फल मिला है। 

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