Jammu Kashmir: कलाकारों को जिस का था इंतजार, जिसके लिए थे बेकरार आखिर उपराज्यपाल ने की देने की घोषणा

अब तो हालत यह है कि कलाकारों को न कोई काम मिल रहा है न ही पिछले कार्यों का भुगतान हो रहा है। हालांकि वार्षिक कैलेंडर बनाने और उसके हिसाब से कार्यक्रमों के आयोजन की बात वर्षो से होती रही है लेकिन उस पर तरीके से काम कभी नहीं हुआ।

Rahul SharmaWed, 21 Jul 2021 11:06 AM (IST)
अब जब उपराज्यपाल ने घोषणा की है तो उम्मीद है कि इस दिशा में जल्द कोई काम होगा।

जम्मू, जागरण संवाददाता: वर्षो से कलाकार इस इंतजार में रहे हैं कि कला के प्रोत्साहन के लिए कोई योजना हो। कोई नीति बने। खासकर जब से जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश बना है। तभी से कलाकारों, साहित्यकारों को एक उम्मीद होने लगी थी कि अब किसी दूरदर्शी दृष्टिकोण के साथ कला का विकास होगा लेकिन इसका इंतजार बढ़ता ही जा रहा था।

गत सोमवार को उपराज्यपाल ने जम्मू, श्रीनगर, में फिल्मोत्सव के अलावा तीन मेगा सूफी महोत्सव के आयोजन का ऐलान कर कलाकारों में फैले रोष को पूरी तरह दूर कर दिया है।यहीं बस नहीं जम्मू-कश्मीर में एक नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा का केंद्र खोलने, इसके अलावा दुर्लभ कलाकृतियों की प्रदर्शनी, साहित्यिक महोत्सव का आयोजन और वार्षिक कैलेंडर जारी करने की घोषणा, उनका कला को सुचारू रूप से चलाने की दिशा में एक अच्छा प्रयास है।

जैसा की आप जानते हैं कि कोरोना के चलते सांस्कृतिक गतिविधियां ठप हो कर रह गई हैं। हालांकि उपराज्यपाल इस दौड़ में जरूर रहे हैं कि जम्मू-कश्मीर में फिल्म शूटिंग का सुनहरा दौर एक बार फिर से लौट सके।हाल ही में वेब सीरीज महारानी की शूटिंग के सचिवालय तक को शूटिंग के लिए खोल दिया गया। इस शूटिंग की सबसे बड़ी उपलब्धी यह रही कि इसमें जम्मू में 270 के करीब कलाकारों को छोटा मोटा काम करने का मौका मिला।

सामान्य हालात में जम्मू-कश्मीर कला संस्कृति एवं भाषा अकादमी की गतिविधयां पिछले वर्षो के मुकाबले काफी बढ़ी थी। कलाकारों को भी काफी मिलने लगे थे लेकिन कोरोना महामारी के चलते गाड़ी पटरी से उतर गई। अब तो हालत यह है कि कलाकारों को न कोई काम मिल रहा है और न ही पिछले कार्यों का भुगतान हो रहा है।  हालांकि वार्षिक कैलेंडर बनाने और उसके हिसाब से कार्यक्रमों के आयोजन की बात वर्षो से होती रही है लेकिन उस पर तरीके से काम कभी नहीं हुआ।

उपराज्यपाल ने राष्ट्रीय उत्सवों पर कार्यक्रमों के आयोजन की घोषणा की है। हालांकि ऐसा पहले भी होता रहा है लेकिन अब कार्यक्रमों को कौन सी दिशा दी जाती है, यह महत्वपूर्ण रहेगा। कलाकारों, साहित्यकाराें ने उपराज्यपाल की घोषणाओं का स्वागत करते हुए कहा कि घोषणाएं तो कई बार होती हैं लेकिन उन पर अमल हो तो ही कला का विकास संभव है।

कला के संरक्षण के लिए गंभीरता से काम करने की जरूरत: कलाकारों, साहित्यकारों का कहना है कि जब तक कला, सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए गंभीरता से नीति के तहत कार्य नहीं होता सकारात्मक परिणाम संभव नहीं हैं। डोगरा सदर सभा के अध्यक्ष पूर्व मंत्री गुलचैन सिंह चाढ़क ने कहा कि जब तक कला का और कलाकारों का प्रोत्साहन नहीं होगा विरासत का संरक्षण संभव नहीं है। हमारे लोग कलाकारों की हालत बहुत दयनीय है। जब तक उन्हें प्रोत्साहित नहीं किया जाएगा लोक कला का संरक्षण संभव नहीं है। प्रोत्साहन न होने के कारण्पा आज बहुत सी संगीत और नृत्य शैलियां लुप्त होने की कगार पर है। लोक नाट्य परंपराओं के प्रोत्साहन के लिए जरूरी है कि लोक कला महोत्सवों का आयोजन हो। जिस तरह से पहले जम्मू महोत्सव होता रहा और हजारों कलाकारों को एक साथ काम करने का मौका मिलता रहा है। वह बहुत जरूरी है। जिला ब्लाक स्तर पर कार्यक्रम आयोजित कर वहां से श्रेष्ठ कलकाारों को राष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रमों के लिए तैयार किया जाना चाहिए।

युवा नाट्य निर्देशक अभिषेक भारती ने कहा कि आज प्रोफेशन डिग्रियां कर लेने के बावजूद उन्हें न तो नौकरियां मिल रही है और न ही काम करने के मौके मिल रहे हैं। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय का कए केंद्र जम्मू-कश्मीर में बनाने की घेाषणाएं कई बार हुई हैं लेकिन इस दिशा में आज तक कुछ भी ठोस होता दिखा नहीं है। अगर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की इकाई जम्मू में खुलती है तो कलाकारों के लिए काफी अच्छे मौके रहेंगे। बहुत से विद्यार्थी, जिन्हें दिल्ली में दाखिला नहीं मिल पाता। उनके लिए संभावनाएं बढ़ेगी। अब जब उपराज्यपाल ने घोषणा की है तो उम्मीद है कि इस दिशा में जल्द कोई काम होगा।

भारतीय कला संगम के निदेशक रमेश चिब का कहना है कि पिछले दो वर्षो से कलाकारों को बहुत कम मौके मिले हैं। जिन कलाकारों ने काम किया हुआ है। उनका भी भुगतान नहीं हो रहा। कलाकारों को काम पूरा होते ही पेमेंट होनी चाहिए। कलाकारों को एक काम कर लेने के बाद महीनों पेमेंट के लिए अकादमी के चक्कर काटने पड़ते हैं। दूरदर्शन और रेडियो के काम भी पहले की तरह शुरू होने चाहिए ताकि बच्चों को अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करने का मौका मिले। जब मंच ही नहीं मिलेगा तो प्रतिभा का विकास कैसे संभव है।

राष्ट्रीय भाषा प्रचार समिति के महासचिव डा. भारत भूषण ने पत्नीटाप में साहित्यिक महोत्सव के आयोजन का स्वागत करते हुए कहा कि साहित्यिक कार्यक्रम नियमित होते रहने चाहिए। अगर गतिविधियों का एक निर्धारित कैलेंडर हो तो दूसरे राज्यों में रहने वाले भी अपने कार्यक्रम कैलेंडर के अनुरूप तैयार कर सकते हैं।

हास्य कलाकार बसंत वियोगी ने कहा कि आज तक कला को लेकर कोई नीति नहीं बन सकी। कलाकारों का प्रशिक्षण कैसे हो इस दिशा में कभी कोई नीति नहीं बनी। किस कलाकार को किस कार्यक्रम में मौका मिलना चाहिए। किस कलाकार को कितने कार्यक्रम मिलने चाहिए। किसी को कोई पता नहीं। लोक कलाकारों की सुध लेने वाला ही कोई नहीं है। जब तक कलाकारों को मौके नहीं मिलेंगे तो सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण कैसे संभव है।

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