जम्मू-कश्मीर: आतंकवाद के सफाए में इनकी भूमिका है अहम, वेतन छह हजार व ड्यूटी आतंकियों से भिड़ना

जम्मू, अवधेश चौहान। जम्मू वेतन मात्र छह हजार और ड्यूटी आतंकियों से लोहा लेने से लेकर कानून व्यवस्था संभालने की। जम्मू कश्मीर के युवाओं में स्पेशल पुलिस ऑफिसर (एसपीओ) बनने का जुनून है। इनके इसी जज्बे से ही आतंकवाद के खात्में की तरफ है। वे निडर होकर आतंक प्रभावित क्षेत्रों में स्थायी पुलिस जवानों के साथ आतंकियों से भिड़ पड़ते हैं। इनकी आतंकरोधी अभियानों में भूमिका कई बार राज्य प्रशासन से लेकर केंद्र सरकार भी सराह चुकी है।

अस्थायी होती है नौकरी :

एसपीओ की नौकरी अस्थायी होती है। पांच साल की सेवा तक एसपीओ को छह हजार और पांच साल से ज्यादा की सेवा पर नौ हजार मिलते हैं। 15 साल की सेवा पूरी करने पर 12 हजार का प्रावधान है। अगर कोई एसपीओ असाधारण कार्य करता है तो पदोन्नति भी मिलती है।

राज्य में 30 हजार एसपीओ :

जम्मू कश्मीर में मौजूदा समय में 35 हजार एसपीओ हैं, जिसमें महिला एसपीओ भी शामिल हैं। एसपीओ की कई बटालियनें हैं। कई जांबाज युवाओं को पुलिस के आतंकरोधी अभियानों का हिस्सा बनाया जाता है। मौजूदा समय में केंद्र के निर्देश पर पूरे राज्य में पांच हजार एसपीओ की भर्ती चल रही है। जम्मू में सीमांत क्षेत्रों के युवाओं की चल रही भर्ती में युवाओं के जुनून देखते ही बनता है। यह भर्ती केंद्रीय मंत्रालय के निर्देश पर अंतरराष्ट्रीय भारत-पाक सीमा से सटे 10 किमी क्षेत्र के दायरे के युवाओं के लिए है। जम्मू संभाग के दूरदराज पहाड़ी जिलों डोडा, किश्तवाड़, राजौरी, पुंछ, ऊधमपुर, रामबन व रियासी में एसपीओ की भर्ती प्रक्रिया जारी है। हर भर्ती प्रक्रिया हजारों युवा उमड़ पड़ते हैं। वे पाकिस्तान को संदेश दे रहे हैं कि गुमराह होने का वक्त गुजर गया गुमान करने का समय है।

1994-95 में किया गठन :

जम्मू कश्मीर की पुलिस ने साल 1994-95 में नए दस्ते गठन किया था। इसका का नाम स्पेशल पुलिस ऑफिसर्स रखा गया था। तब इनका मानदेय 1500 रुपये प्रति महीना तय किया था। आतंक प्रभावित क्षेत्र डोडा, किश्तवाड़, राजौरी और पुंछ के स्थानीय युवाओं को एसपीओ नियुक्त किया गया। क्योंकि ये युवा इलाके की वास्तविक स्थिति से वाकिफ होते थे। इसका नतीजा था कि 2005 में इन क्षेत्रों में आतंकवाद का खात्मा हुआ। देश की रक्षा में अभी तक 505 एसपीओ शहीद हुए हैं। इससे पहले भी केंद्र सरकार ने एसपीओ के परिजनों को उनकी शहादत के बाद मिलने वाली राशि को 30 लाख कर दिया। पहले 17.5 लाख मिलता था।

सोनू की जांबाजी कौन नहीं जानता :

डोडा जिले के शिवा गांव के रहने वाले शिव कुमार उर्फ सोनू वर्ष 1995 में एसपीओ भर्ती हुए। सोनू ने 1999 में डोडा जिले के ठाठरी में आतंकवादियों से अकेले लोहा लिया था जब विदेशी आतंकवादी गांव में नरसंहार को अंजाम दे रहे थे। उस समय कारगिल युद्ध में भारतीय सेना पाकिस्तान का मुकाबला कर रही थी। डोडा में सेना की सक्रियता कम थी। सोनू ने अकेले ही आतंकवादियों का मुकाबला किया। इसके बाद तत्कालीन गृहमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी डोडा के ठाठरी गांव आए थे। लोगों ने जब सोनू की बहादुरी का किस्सा सुनाया तो आडवाणी ने सोनू को राज्य पुलिस में अस्सिटेंट सब इंस्पेक्टर बनाने के आदेश जारी किए। सोनू इस समय राज्य पुलिस के एसओजी विंग डोडा में सब इंस्पेक्टर हैं। सोनू ने 100 आतंकवादियों का सफाया किया है।

केंद्र उठाती है खर्च

जम्मू कश्मीर के पुलिस महानिदेशक दिलबाग सिंह भी मानते है कि आतंकवाद के खात्में में एसपीओ की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इतनी खतरनाक नौकरी करने की एवज में उन्हें कम वेतन मिलता है। इनका खर्च केंद्र सरकार उठाती है।

युवाओं में जोश :

पुलिस मुख्यालय एआइजी राजेश्वर सिंह ने कहा कि पूरे राज्य में पांच हजार एसपीओ के पद निकाले गए हैं। युवाओं का खासा जोश है। 

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