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Happy Nurse Day 2021: नर्स रत्ना देवी ने आखिरी सांस तक मरीजों की सेवा को ही धर्म माना

15 दिन ही अस्पताल में रही। उनकी जिंदगी वही थी जहां पर उन्होंने अंतिम सांस ली।

संक्रमण को मात देने के बाद जब वह फिर से डयूटी पर गईं तो ज्यादा दिन नहीं रही। अक्टूबर महीने के शुरू में फिर से समस्या होने लगी। सांस लेने में दिक्कत आई। पहले आइसाेलेशन वार्ड और फिर आइसीयू में उन्हें रखा गया। 21 अक्टूबर को उन्होंने अंतिम सांस ली।

Rahul SharmaWed, 12 May 2021 01:26 PM (IST)

जम्मू, रोहित जंडियाल। उनके लिए उम्र कोई मायने नहीं रखती थी। मरीजों की सेवा के लिए जुनून था। व्यवहार ऐसा था कि कभी किसी ने कोई शिकायत नहीं की। मरीज जब बात करते थे तो लगता था कि सच में अपने परिवार के किसी सदस्य से ही बात कर रहे हों। काम के प्रति लगन और समर्पण ऐसा रहा कि मरीजों की सेवा को ही आखिरी सांस तक धर्म की तरह निभाया। यही कारण है कि आज भी वह मरीजों और सहयोगियों के दिलों में बसती है। हम बात कर रहे हैं पिछले साल कोरोना संक्रमण के कारण अपनी जान गंवाने वाली राजकीय मेडिकल कालेज जम्मू की असिस्टेंट मैट्रन रत्ना देवी की। 

तीस साल से भी अधिक समय तक राजकीय मेडिकल कालेज व सहायक अस्पतालों में अपनी सेवाएं देने वाली रतना देवी अपने काम करने के तरीके और व्यवहार से हर दिल अजीज थी। पिछले साल जब जम्मू में कोरोना संक्रमण का पहला मामला आया तो वह असिस्टेंट मैट्रन बन चुकी थी। उस समय बहुत से स्टाफ सदस्यों में कोरोना को लेकर भय था लेकिन रतना देवी पर इसका कोई ,खौफ नजर नहीं आता था। उनके बेटे मुनीश कुमार ने बताया कि वह दिनों दिल्ली में थे।

कोरोना के बाद वापिस घर लौटे थे। वह घर में आकर उन्हें और छोटे भाई मानिक को भी कोरोना से बचाव के लिए एसओपी का पालन करने को कहती थी। उन्होंने घर के ग्राउंड फ्लोर पर अपने लिए पूरी व्यवस्था की थी और बाकी सभी को पहली मंजिल पर भेज दिया था। सुबह सभी के लिए खाना बनाना और डयूटी के लिए निकल जाना। सुबह दस बजे जाने के बाद घर आने का कोई समय नहीं होता था।सुबह से लेकर रात तक उन्हें जब भी फोन आते थे, उन्हें उठाकर हर मरीज के साथ बात करना। कभी गुस्सा नहीं होती थी।

कोरोना के मरीजों की चिंता रहती थी। सितंबर महीने में जब कोरोना के मामले बहुत अाए तो उन्हें भी बुखार हुआ। एक दिन छुट्टी ली और दूसरे दिन फिर डयूटी। अस्पताल और मरीज ही उनके लिए प्राथमिकता होते थे। सितंबर महीने में ही उनमें संक्रमण की पुष्टि हुई। सात दिन ही घर पर रहे। आठवें दिन फिर से डयूटी पर चले गए। घर में किसी को पास नहीं आने देते थे। हम सभी की चिंता भी थी और मरीजों की। उनका डयूटी के प्रति यही जुनून उन्हें हमसे दूर ले गया।

संक्रमण को मात देने के बाद जब वह फिर से डयूटी पर गईं तो ज्यादा दिन नहीं रही। अक्टूबर महीने के शुरू में फिर से समस्या होने लगी। सांस लेने में दिक्कत आई। पहले आइसाेलेशन वार्ड और फिर आइसीयू में उन्हें रखा गया। 21 अक्टूबर को उन्होंने अंतिम सांस ली। यह दुखद समाचार सुनना आसान नहीं था। पंदह दिन ही अस्पताल में रही। उनकी जिंदगी वही थी जहां पर उन्होंने अंतिम सांस ली।

इस साल मई में होना था सेवानिवृत्त: सिस्टर रतना ने इसी साल मई महीने में सेवानिवृत्त हो जाना था। जिस समय वह कोरोना से जंग लड़ रही थी, उस समय उनकी उम्र 59 साल हो चुकी थी। लेकिन उनके परिजन और सहयोगी कहते हैं कि उन्हें इसकी जरा भी परवाह नहीं थी। उनकी बहन संतोष भी श्री महाराजा गुलाब सिंह अस्पताल में नर्स हैं। यही नहीं उनके साथ कई साल तक काम कर चुकी सिस्टर पवनजीत कहती हैं कि रतना देवी जैसा व्यवहार और जुनून सभी में नहीं होता। वह तो सभी के लिए आदर्श थी।

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