Corona Warriors: चुनौती के बीच जब बेटी ने आंखे खोली तो छू मंतर हो गई थकान

नीलम कहती है कि उनकी ड्यूटी अस्पताल के गाइनी वार्ड में है।

शिवांगी के अलावा सास-ससुर का भी ख्याल रखना पड़ता है कि कहीं मेरे से कही बुर्जुग संक्रमित न हो जाएं। बेटी छोटी होने के कारण उन्हें सुबह से शाम तक ड्यूटी देनी होती है।अस्पताल जाने से पहले और आने के बाद दिन में दो बार नहाना पड़ता है।

Rahul SharmaWed, 12 May 2021 08:22 AM (IST)

जम्मू, अवधेश चौहान: कोरोना काल में नर्सों की चुनौतियां बढ़ गई है।पहले तो अस्पताल में मरीजों की देखभाल करना फिर नन्ही बच्ची को दूध पिलाने और परिवार की देखभाल का जिम्मा।इन दोनों मोर्चों पर सिस्टर नीलम देवी पूरी तरह से सफल रही है।

सिस्टर नीलम कहती है कि उनकी 7 महीनें की बेटी है, उसे मां का दूध पिलाने के लिए दोपहर को एक बजे घर आना पड़ता है।उसे दिन में केवल एक टाइम ही मां का दूध मिल पाता है।बाकी का समय उन्हें अखनूर उप जिला अस्पताल में कोरोना मरीजों के बीच बिताना पड़ता है। नीलम कहती है कि उनकी ड्यूटी अस्पताल के गाइनी वार्ड में है। जहां अक्सर कोई न कोई कोविड-19 से ग्रस्ति महिला वार्ड में आ जाती हैं।

उनका इलाज मेरी पहली प्राथमिकता होती है। उस समय घर परिवार सबकुछ भुला कर मरीज का हौंसला बढ़ना मेरा फर्ज होता है।गर्भवती महिलाएं अक्सर सवाल करती है, सिस्टर मेरे बच्चे का क्या होगा? मैं 8 माह से गर्भवती हूं? क्या उसे मेरा संक्रमण ताे नही होगा? ऐसे सवाल दिलों दिमाग में हर समय कौंधते हैं। उन्हें जागरूक करती हूं कि बच्चे को कुछ नही होगा वो आपकी कोख में सुरक्षित है।

ऐसे में अपनी 7 साल की बेटी शिवांगी का भी ख्याल जाता है कि जब उसने वर्ष 2020,सितंबर माह दुनियां में आई, तो उस समय मैं ड्यूटी देकर अस्पताल में ही थी, जब लेबर पेन शुरू हो गए।बेटी ने जब आंखे खोली तो मेरी सारी थकान दूर हो गई।उन दिनों मुझे दिन रात काेरोना मरीजों के साथ रहना पड़ता था।जिससे थकावट के कारण शरीर टूटने लगता था।

फिर भी मैंने खुद और कोख में पल रहे बच्चे का ख्याल रखा।अब शिवांगी 7 महीनें की हो गई है,उसे दूध पिलाने के लिए दिन में एक बार ही छुट्टी मिलती है। शिवांगी के अलावा सास-ससुर का भी ख्याल रखना पड़ता है कि कहीं मेरे से कही बुर्जुग संक्रमित न हो जाएं। बेटी छोटी होने के कारण उन्हें सुबह से शाम तक ड्यूटी देनी होती है।अस्पताल जाने से पहले और आने के बाद दिन में दो बार नहाना पड़ता है।

आते ही बच्ची को दूध पिलाती हूं। वह बॉटल का दूध नही पीती।इसलिए उसकी चिंता रहती है। लेकिन उन मरीजों को लेकर भी चिंतित रहती हूं, जो कोरोना से लड़ाई लड़ रहे होते हैं। उनके कष्ट को देखकर मेरी थकान छूमंतर हो जाती है।

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