कश्मीर में तीन दशकों के बाद प्रतीकात्मक मुहर्रम जुलूस की इजाजत पर शिश समुदाय में विभाजन

Muharram procession in Kashmir कुछ दिन पहले ही आइजीपी कश्मीर ने लोगों को घरों में रहकर ही ईद मनाने को कहा था। जामा मस्जिद में पिछले 100 शुक्रवार से नमाज नहीं हो रही। अब अचानक तीस साल बाद मुहर्रम के जुलूस को इजाजत देना कई सवाल खड़े करता है।

Rahul SharmaMon, 02 Aug 2021 07:32 AM (IST)
अधिकारियों का कहना था कि धार्मिक सभा का इस्तेमाल अलगाववादी राजनीति के लिए किया जाता है।(FILE PHOTO)

जम्मू, राज्य ब्यूरो: तीन दशकों के अंतराल के बाद श्रीनगर के लाल चौक इलाके में प्रतीकात्मक मुहर्रम जुलूस की इजाजत देने के प्रशासन के कथित फैसले को लेकर कश्मीर में शिया समुदाय में विभाजन दिखाई दे रहा है।आल जम्मू और कश्मीर शिया एसोसिएशन ने दावा किया है कि प्रशासन ने 30 साल बाद जुलूस की इजाजत देने का फैसला किया है। उन्होंने इस कदम का स्वागत किया है, लेकिन प्रमुख शिया नेता और पूर्व मंत्री आगा सैयद रूहुल्लाह मेहदी ने कहा कि यह फैसला जवाब देने से ज्यादा सवाल उठाता है।

आल जम्मू और कश्मीर शिया एसोसिएशन के अध्यक्ष इमरान रजा अंसारी ने कहा कि वे तीन दशक के अंतराल के बाद कश्मीर में मुहर्रम के जुलूस की इजाजत देने के फैसले का स्वागत करते हैं।उन्होंने ट्विटर पर लिखा इंशाअल्लाह एजेके शिया एसोसिएशन इस साल पहले की तरह जुलूस का अगुवाई करेगा।अंसारी ने तीन दशकों से अलगाववादी राजनीति से जुड़े अंजुमन-ए-शरी के अध्यक्ष शिआन आगा सैयद हसन अल मूसावी को जुलूस में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया। पारंपरिक मुहर्रम जुलूस लाल चौक से डलगेट क्षेत्र सहित शहर के कई इलाकों से होकर गुजरता था, लेकिन 1990 में उग्रवाद के प्रकोप के बाद से इसे प्रतिबंधित कर दिया गया है। अधिकारियों का कहना था कि धार्मिक सभा का इस्तेमाल अलगाववादी राजनीति के लिए किया जाता है।

शिया नेता और पूर्व मंत्री आगा सैयद रूहुल्लाह मेहदी ने सरकार के फैसले पर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने कहा कि तीस साल बाद सरकार ने अबीगुजर से लाल चौक तक मुहर्रम का जुलूस निकालने की इजाजत दी है। टवीट कर उन्होंने कहा कि यह फैसला उस समय हुआ जब सरकार ने कोविड 1ृ9 के कारण वार्षिक अमरनाथ यात्रा को रद कर दिया। जामा मस्जिद में नमाज नहीं होने दी। कुछ दिन पहले ही आइजीपी कश्मीर ने लोगों को घरों में रहकर ही ईद मनाने को कहा था। जामा मस्जिद में पिछले 100 शुक्रवार से नमाज नहीं हो रही। ऐसे में अचानक तीस साल बाद मुहर्रम के जुलूस को इजाजत देना कई सवाल खड़े करता है।

उन्होंने कहा कि उन सवालों के जवाब देने के लिए और यह स्पष्ट करने के लिए कि इस फैसले के पीछे कोई नापाक मंशा नहीं है, मुहर्रम के जुलूस से पहले जामा मस्जिद में जुमे की नमाज़ हो। इस साल 10वें मुहर्रम से पहले जुमे की नमाज अदा करनी चाहिए।शिया नेता ने कहा कि अगर सभी धर्मों के कार्यक्रम और शुक्रवार की नमाज पर प्रतिबंध जारी रहता है और इस विशेष जुलूस को अचानक प्रोत्साहित किया जाता है तो उन्हें इसके पीछे नापाक मंसूबे दिखाई देते हैं।प्रशासन को इस मामले में अपनी स्थिति स्पष्अ करनी चाहिए।

हालांकि श्रीनगर के डिप्टी कमिश्नर मोहम्मद एजाज असद का कहना है कि उनकी ओर से ऐसा कोई भी आदेश जारी नहीं किया गया है।

 

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